Imran Ghazi
◆ Muslim ◆ Social Activist ◆ Law Student ◆ Speaker ◆ Political Observer ◆
16/02/2026
वो कुरैश का बाज़ू था जिसपर मक्का फ़ख्र करता था वो जब पैदा हुआ तो उसके कानों में लोरिया नहीं घोड़ों के टापो की आवाज़ गूंजती थी फिर मेरे नबी सल्लल्लाहों अलैहि वसल्लम की ज़ुबान से एक जुमला निकला ये तो सैफुल्लाह अल्लाह की तलवार है
हज़रत खालिद बिन वलीद बा ज़ुबान कहते है मै खालिद हु वलीद बिन मुगीरा का बेटा जिसपर मक्का नाज़ करता था मै तलवारों के साय में जवान हुआ मै जब पैदा हुआ मेरे कानो में लोरिया नहीं घोड़ों के टापो की आवाज़ गूंजा करती थी जब आंख खुलती थी सामने तीर नेज़े तलवारे लटकी हुआ करती थी
मेरे बाप कहा करता था के खालिद जंग तुम्हारी पहचान है और अरब की इज़्ज़त तुम्हारी तलवार के दम पर है मैने जंग को फन बनाया और मौत को महबूब बनाया मै उन्नीस बरस की उम्र तक कुफ्र में रहा मेरे अल्लाह ने मुझे जिंदा रखा क्योंकि मैं इस्लाम लाकर कैसर और किसरा के एवान हिलाने वाला था
मुझे गज़वा ए ओहद याद है क्योंकि वो मेरी जिंदगी का सबसे बोझ और पछतावे का दिन है मेरी जंगी हिक्मत ए अमली की वजह से मेरे नबी का चेहरा मुबारक लहू लुहान हुआ
फिर मेरे नबी के लबों से वो जुमला निकला जिसने आसमान हिला दिया अल्लाह उस क़ौम को हिदायत कैसे देगा जिसने अपने नबी का चेहरा लहू से रंग दिया
फिर रब की रहमत नाज़िल हुई अल्लाह ताला ने सूरह आले इमरान की आयत नंबर 128 नाजिल की और फरमाया "ए नबी इस मामले में आपको कोई अख्तियार नहीं अल्लाह जिसे चाहे तौबा की तौफीक दे और जिसे चाहे अज़ाब दे"
ये आयात मेरे लिए सबसे बड़ी उम्मीद बन गई मेरा रब मुझे पुकार रहा था वो मुझे हिदायत देकर मुझे माफ करना चाहता था जब मैं मुसलमान हुआ तो मक्का के सरदारों ने ताने दिए खालिद तुमने वो दीन कुबूल कर लिया जिसकी किताब में तुम्हारे बाप के बारे में सख्त आयात नाजिल हुई अब तुम उन आयात को कैसे पढ़ोगे
लेकिन मेरे रब ने मुझे मुशरिकिन ए मक्का से उठाया और रूमी और ईरानियों के एवानो पर दे मारा गज़वा ए मौत में मेरे हाथों से नौ तलवारे टूटी लेकिन मेरा हौसला नहीं टूटा
मेरे नबी ने मुझे सैफुल्लाह का खिताब अता कर दिया दमिश्क की यार्मुक और हिम्स की जमीनें गवाह है मैने कभी पीठ नहीं दिखाई जब सैयदना उमर फारूक रज़ीo ने मुझे माजूल कर दिया तो लोगों ने कहा खालिद अब बगावत करेगा मैने कहा मै उमर के लिए नहीं उमर के रब के लिए लड़ता हु
मैने सिपाह सालारी की कबह उतरी और एक आम सिपाही बनकर लड़ने लगा आज मैं हिम्स में बिस्तर ए मर्ज पर हु मेरी सांसे उखाड़ रही है मेरे जिस्म पर देखो कोई एक बालिस्त जगह ऐसी नहीं जहां तीर नेज़े और तलवारों के ज़ख्म के निशान ना हो
मैने हर मैदान ए जंग में शहादत मांगी मगर अल्लाह की तलवार मैदान ए जंग में ना टूट सकी आज मैं बिस्तर पर मौत का इंतजार कर रहा हु मगर मेरी रूह मुतमइन आज खालिद अपने आका ए नामदार जनाब ए मुहम्मदुर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहों अलैहि वसल्लम से मिलने जा रहा है
मैने गज़वा ए ओहद का दाग मिटा दिया मैने बाप की मोहब्बत पर अल्लाह के कलाम और ईमान को तरजीह दी ए लोगों याद रखना इज़्ज़त ओहदों में नहीं अल्लाह और अल्लाह के रसूल की इताआत में है
अल्लाह हु अकबर
30/12/2025
UK 🇬🇧 की एक हाईवे पर हमारे प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ पर भेजा गया सलाम ❤️
नॉर्थ बाउंड M6, जंक्शन 15 के बाद लगा यह बिलबोर्ड ईमान को ताज़ा कर देता है ✨
“निस्संदेह अल्लाह अपने नबी पर रहमतें नाज़िल करता है और उसके फ़रिश्ते उनके लिए दुआ करते हैं।
ऐ ईमान वालों! तुम भी उन पर दरूद भेजो और उन्हें पूरा सलाम पेश करो।”
📖 [सूरह अल-अहज़ाब, आयत 56]
🌙🤍🕋
ﷺ
07/12/2025
मेडिकल कॉलेज के बदले 'बाबरी' का सौदा?
'मजलिस' पर बेबुनियाद इल्ज़ाम लगाने वाली गैंग के एक सरगना, चमन इलाहबादी (काला सुअर) ने एक और ग़लीज़ इल्ज़ाम Asaduddin Owaisi के मरहूम वालिद #सुल्तान_सलाहुद्दीन_ओवैसी पर ये लगाया है कि उन्होंने #बाबरी_मस्जिद विध्वंस पर चुप रहने के बदले सरकार से सौदेबाज़ी की और उसके बदले में डेक्कन मेडिकल कॉलेज पाया! लेकिन, ये साफ़ झूठ है बल्कि बोहतान है...!
दरअसल, मेडिकल कॉलेज जैसी संस्था खोलने के लिए तमाम औपचारिकताएं पूरी होने के बाद भी राजनीतिक रसूख और सरकार का साथ ज़रूरी होता है, वरना ऐसे बड़े संस्थान को मंजूरी मिलना बहुत ही मुश्किल काम होता है- नामुमकिन के बराबर। ओवैसी के मेडिकल कॉलेज के लिए भी इन दोनों चीज़ों की ज़रूरत पड़ी होगी ही।
दरअसल, १९८३ में आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम पार्टी (TDP) पहली बार सत्ता में आई। जनवरी १९८३ में एन.टी. रामाराव (NTR) भारी बहुमत से जीते। यह कांग्रेस के लंबे शासन के बाद अचानक आया राजनीतिक परिवर्तन था।
✔ लेकिन १९८४ में बड़ी राजनीतिक अस्थिरता पैदा हुई। अगस्त 1984 में राज्य में एक तरह का political coup हुआ। तत्कालीन राज्यपाल ने NTR को हटाकर एन. भास्कर राव को मुख्यमंत्री बना दिया। यह सरकार लगभग एक महीने तक चली। इस पूरी अवधि में राज्य प्रशासन अस्थिर था, निर्णय तेजी और दबाव में लिए जा रहे थे।
राजनीतिक उठापठक के उस दौर में मुख्यमंत्री एन. भास्कर राव के पास 'नंबर' कम थे, यानी कि एक- एक।विधायक क़ीमती था। उस समय 'मजलिस' के पास कोई ४-५ विधायक थे जो आधिकारिक रूप से निर्दलीय जीते थे। जैसा कि मजलिस का इतिहास बताता है कि वह आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में सत्ताधारी दल को बाहरी समर्थन देती आयी है, उस वक़्त भी 'मजलिस' के नेतृत्व ने मुख्यमंत्री एन. भास्कर राव के साथ कोई 'कमिटमेंट' की जिसके चलते ७ अगस्त १९८४ को ओवैसी के 'डेक्कन कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंस' DCMS को मंजूरी मिली।
१९८० के दशक में सुल्तान सलाहुद्दीन ओवैसी Aimim- All India Majlis-E-Ittehadul Muslimeen के प्रमुख नेता थे। वे हैदराबाद के सबसे प्रभावशाली मुस्लिम नेता माने जाते थे। उनकी पार्टी AIMIM शहर-स्तर पर बहुत मज़बूत थी और कांग्रेस व अन्य दलों पर राजनीतिक दबाव रखने की स्थिति में थी।
१९८४ के सत्ता-परिवर्तन के दौरान निर्णय लेने वाला तंत्र कमजोर था, नई सरकार वैधता साबित करने के दबाव में थी और ऐसे समय में प्रभावशाली क्षेत्रीय नेताओं के अनुरोधों को जल्दी स्वीकार किया जाता था। इसलिए यह माना जाता है कि मजलिस की राजनीतिक पहुँच+उस समय की अस्थिर सरकार = DCMS को तेज़ी से मंजूरी मिलना संभव बना।
मुख्यमंत्री एन. भास्कर राव की सरकार ने G.O. No. MS ५७५ जारी कर इस मेडिकल कॉलेज को शुरू करने की अनुमति दी थी। बाद में, ५ दिसंबर १९८५ को, ऐतिहासिक उस्मानिया यूनिवर्सिटी ने इसे शैक्षणिक रूप से मान्यता दी। २६ जनवरी १९८५ (गणतंत्र दिवस) को, DCMS का औपचारिक उद्घाटन हुआ। यानी कि ओवैसी के मेडिकल कॉलेज- DCMS की मंजूरी, मान्यता और उद्घाटन- सभी १९९२ में हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस से पहले के हैं।
बाबरी मस्जिद विवाद;मुख्य रूप से तीव्र हुआ १९८९ के बाद से, और विध्वंस हुआ ६ दिसंबर १९९२ को ओवैसी परिवार/ AIMIM के बयान दिखाते हैं कि उन्होंने १९९२ और उसके बाद लगातार बाबरी मस्जिद गिराने की घटना की निंदा की है, आज भी करते हैं... इसके बावजूद कुछ मुसलमान ओवैसी परिवार पर बाबरी मस्जिद का सौदा करने जैसा घिनौना इल्ज़ाम लगाते हैं, ये बहुत बड़ा बोहतान है...
- जावेद पटेल
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