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14/05/2026
NOVE GRAHA LABH HANI
14/05/2026
सांख्य दर्शन (कपिल मुनि)
योग दर्शन (महर्षि पतंजलि)
न्याय दर्शन (महर्षि गौतम)
वैशेषिक दर्शन (महर्षि कणाद)
मीमांसा (पूर्व मीमांसा) (महर्षि जैमिनी)
वेदांत (उत्तर मीमांसा) (महर्षि बादरायण/व्यास)
भारतीय दर्शन की परंपरा में इन छह दर्शनों को 'षड्दर्शन' कहा जाता है। ये सभी 'आस्तिक' दर्शन माने जाते हैं क्योंकि ये वेदों की प्रमाणिकता को स्वीकार करते हैं।
यहाँ इन छह दर्शनों का संक्षिप्त परिचय और उनके मुख्य सिद्धांत दिए गए हैं:
१. सांख्य दर्शन (कपिल मुनि)
यह सबसे प्राचीन दर्शन माना जाता है। यह 'द्वैतवादी' है, जो सृष्टि की उत्पत्ति के दो मुख्य तत्व मानता है: प्रकृति और पुरुष।
मुख्य सिद्धांत: सत्कार्यवाद (कार्य अपनी उत्पत्ति से पूर्व कारण में विद्यमान रहता है)।
लक्ष्य: प्रकृति और पुरुष के भेद को समझकर दुखों से मुक्ति पाना।
२. योग दर्शन (महर्षि पतंजलि)
योग दर्शन, सांख्य के सैद्धांतिक पक्ष का व्यावहारिक रूप है। इसे 'सेश्वर सांख्य' भी कहा जाता है क्योंकि यह ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करता है।
मुख्य ग्रंथ: योगसूत्र।
मुख्य मार्ग: अष्टांग योग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि)।
३. न्याय दर्शन (महर्षि गौतम)
यह तर्क और प्रमाण पर आधारित दर्शन है। इसे 'तर्कशास्त्र' या 'प्रमाणशास्त्र' भी कहा जाता है।
मुख्य सिद्धांत: ज्ञान प्राप्त करने के चार प्रमाण— प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द।
लक्ष्य: तार्किक विश्लेषण के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति।
४. वैशेषिक दर्शन (महर्षि कणाद)
यह दर्शन भौतिक जगत के वैज्ञानिक विश्लेषण पर बल देता है। महर्षि कणाद को 'परमाणुवाद' का जनक माना जाता है।
मुख्य सिद्धांत: सृष्टि का निर्माण सूक्ष्म परमाणुओं से हुआ है।
विशेषता: यह सात 'पदार्थों' (द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, अभाव) के माध्यम से तत्व मीमांसा करता है।
५. मीमांसा / पूर्व मीमांसा (महर्षि जैमिनी)
यह दर्शन वेदों के 'कर्मकाण्ड' भाग पर आधारित है। इसका मुख्य उद्देश्य धर्म की व्याख्या करना और यज्ञों के महत्व को बताना है।
मुख्य सिद्धांत: वेदों को 'अपौरुषेय' (किसी पुरुष द्वारा न रचा गया) और नित्य मानना।
लक्ष्य: वेदोक्त कर्मों के माध्यम से स्वर्ग और धर्म की प्राप्ति।
६. वेदांत / उत्तर मीमांसा (महर्षि बादरायण)
वेदांत का अर्थ है 'वेदों का अंत' या निष्कर्ष। यह वेदों के 'ज्ञानकाण्ड' (उपनिषद) पर आधारित है।
मुख्य ग्रंथ: ब्रह्मसूत्र।
मुख्य विचार: 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या' (ब्रह्म ही सत्य है)। इसके बाद में कई संप्रदाय हुए जैसे अद्वैत (शंकराचार्य), विशिष्टाद्वैत (रामानुजाचार्य) आदि।
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