SIDS
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21/05/2024
लो भईया हम भी कर दिहिन उंगली दिखाए की रसम पूरी।
बदलाव खातिर वोट दे आए
बा नी।
काउनो लिखी नाही तो हम
सोचीं हमाहु लिख देत बा...
मुंह मा जबान होई खातिर
बोलना पड़त बा। नहीं तो
लोग मुर्दा समझ लेइत हैं...
जब पहली बार कर्ण को पता चला कि शस्त्र उठाना सूतों का अधिकार नही है।
ये गीत कैसा बना? आप सब की प्रतिक्रियाएं निवेदित हैं....
जीती स्पर्धा किन्तु कर्ण को, टीस मिली थी, प्यार नही।
तब समझा शस्त्र उठाने का, है सूतों को अधिकार नही।
शौर्य देख उस बालक का, था वीरों का धीरज डोला।
जब भेद दिया था लक्ष्य कर्ण ने, जन समूह मिलकर बोला।
है कौन भला नन्हा बालक, जिसने करतब दिखलाया है।
किसका सुत है ये लाल भला, जो धरा जीतने आया है।
है कौन भला जो चुपके से, आया है ठानी रार नही।
तब समझा शस्त्र उठाने का, है सूतों को अधिकार नही।
तब कोई बोला कर्ण है ये, ये तो अधिरथ का बेटा है।
हाँ तनिक विलक्षण बालक है, निज मित्रों बीच चहेता है।
इतना सुनते खुशिया भूले, हर ओर क्रोध का ज्वार उठा।
आक्रोश चरम पर था सब का, गुस्से का पारावार उठा।
सूतों के हाथों उठे धनुष की, सहन हमें टंकार नही।
तब समझा शस्त्र उठाने का, है सूतों को अधिकार नही।
उस जन समूह में ज्यादातर, जन गुस्सा आगबबूले थे।
क्रोधित होकर अपशब्द कहें, सारी मर्यादा भूले थे।
कहते बालक ने पाप किया, हर लिया क्षत्रियो के हक को।
कोई कहता दो हाथ काट, या मृत्युदण्ड दो बालक को।
कर सकता सूतपुत्र होकर, वीरों जैसा व्यवहार नही।
तब समझा शस्त्र उठाने का, है सूतों को अधिकार नही।
कुछ जन बोले उस जनसमूह में, भूल हुई अबकी छोड़ो।
देकर कुछ चेतावनी इसे, अब शस्त्रों से नाता तोड़ो।
है समय आज धनु पूजन का, पूजन अपनाया जायेगा।
है ये पूजन की जगह यहाँ, ना रक्त बहाया जायेगा।
हे सूतपुत्र धनुहा पूजन, तुम सब का है त्योहार नही।
तब समझा शस्त्र उठाने का, है सूतों को अधिकार नही।
देकर के चेतावनी कर्ण को, जन समूह ने समझाया।
अब कभी दोबारा ना करना, रथ हाको उससे बतलाया।
वीरता दिखाई बालक ने, ना वीरोचित सम्मान हुआ।
स्पर्धा जीता वीर कर्ण, फिर भी उसका अपमान हुआ।
फिर सारे जीवन वीर कर्ण, भूला ऐसा प्रतिकार नही।
तब समझा शस्त्र उठाने का, है सूतों को अधिकार नही।
डॉ. गोविन्द 'गजब'
रायबरेली 7388489558
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