Badlav

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Badlav established on 15th September 2015 is registered under the Societies Registration Act, 1860 having 12A and 80G certificates.

30/05/2026

वर्ष 2016 में बदलाव ने एक ऐतिहासिक पहल करते हुए भीख मांगने का काम छोड़कर सम्मानजनक आजीविका की ओर बढ़े 9 व्यक्तियों का पहला सम्मान समारोह आयोजित किया था। यही आयोजन आगे चलकर पिछले साल हुए "बदलावोत्सव" के रूप में एक प्रेरणा बन गया।
आज, उस छोटे से प्रयास से शुरू हुई यात्रा ने एक बड़ा स्वरूप ले लिया है। अब तक बदलाव ने 592+ से अधिक व्यक्तियों को भीख मांगने की परिस्थितियों से बाहर निकालकर पुनर्वास, पुनर्स्थापन और सम्मानजनक जीवन की मुख्यधारा से जोड़ा जा चुका है।
यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि 592 से अधिक नई आशाओं, नए अवसरों और आत्मसम्मान से भरे जीवन की कहानियाँ हैं। हर बदली हुई ज़िंदगी हमें यह विश्वास दिलाती है कि सही सहयोग, संवेदनशीलता और अवसर मिलें तो परिवर्तन संभव है।

21/05/2026

आज में मिलिए आसिफा (बदला हुआ नाम) से। 58 वर्षीय आसिफा, लखनऊ के दुबग्गा क्षेत्र की निवासी हैं। अशिक्षा, आर्थिक तंगी और बड़े परिवार की जिम्मेदारी के कारण उनका जीवन लंबे समय तक भीख मांगने और छोटे-मोटे घरेलू कामों पर निर्भर रहा। रोज़मर्रा की जरूरतें पूरी करना भी उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी।
लेकिन कठिन परिस्थितियों के बावजूद, आसिफा ने कभी हार नहीं मानी। उनके भीतर हमेशा यह इच्छा रही कि वे सम्मान के साथ जीवन जिएं और भीख पर निर्भरता खत्म कर सकें।
इसी दौरान उनका संपर्क बदलाव से हुआ। काउंसलिंग और मार्गदर्शन के माध्यम से उनके आत्मविश्वास को मजबूत किया गया और उनकी क्षमता के अनुसार आजीविका के विकल्प तलाशे गए।
उनकी उम्र, परिस्थिति और रुचि को ध्यान में रखते हुए उन्हें फल और जूस से जुड़े छोटे व्यवसाय के लिए प्रेरित किया गया। बदलाव के सहयोग से उन्होंने दुबग्गा चौराहा और आसपास के अस्पतालों के पास फल और जूस का ठेला शुरू किया।
आज आसिफा सफलतापूर्वक अपना स्टॉल चला रही हैं। इस काम से उन्हें नियमित आय मिलने लगी है, जिससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है और भीख पर उनकी निर्भरता समाप्त हो गई है।
आज आसिफा न केवल अपने परिवार का सहारा बनी हैं, बल्कि अपने समुदाय के लिए भी एक प्रेरणा हैं।
उनकी कहानी यह संदेश देती है कि बदलाव की शुरुआत किसी भी उम्र में हो सकती है—अगर साथ हो सही अवसर, सहयोग और हौसला।



GOONJ Azim Premji Foundation LivingMyPromise PRAVAH Lucknow Municipal Corporation Ministry of Social Justice and Empowerment, Government of India

18/05/2026

आज में मिलिए रमेश कुमार गुप्ता (नाम बदला हुआ) से। उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के 46 वर्षीय रमेश कुमार गुप्ता कभी एक स्थिर और सम्मानजनक जीवन जीते थे। उन्होंने लगभग 25 वर्षों तक इंजन फैक्ट्री और होटलों में काम किया और खाना बनाने व हॉस्पिटैलिटी का अच्छा अनुभव हासिल किया।
माता-पिता के निधन और परिवार के बंटवारे के बाद उन्होंने अपनी जमीन बेचकर एक छोटा होटल शुरू किया। लेकिन वैवाहिक विवाद और तलाक ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया। इसके बाद रोज़गार की तलाश उन्हें शहर ले आई।
उन्होंने कई बार जीवन को दोबारा खड़ा करने की कोशिश की, लेकिन एक गंभीर सड़क दुर्घटना में पैर टूट गया और लंबे इलाज में उनकी सारी जमा पूंजी खत्म हो गई। फिर कोविड-19 महामारी ने उनका छोटा व्यवसाय भी बंद करवा दिया।
धीरे-धीरे स्वास्थ्य समस्याएँ बढ़ती गईं—डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट की बीमारी और पैर का लगातार दर्द। परिवार का सहारा न होने के कारण मजबूरी में उन्हें मंदिरों के बाहर बैठकर भीख मांगनी पड़ी।
इसी कठिन दौर में उनका संपर्क बदलाव से हुआ और वे पुनर्वास केंद्र पहुँचे। काउंसलिंग के दौरान उन्होंने अपने दर्द, डर और असफलताओं को साझा किया। धीरे-धीरे उनके भीतर फिर से उम्मीद जागने लगी।
उन्होंने साझेदारी में फूड कार्ट शुरू करने की कोशिश की, लेकिन एक और दुर्घटना में उनका पैर फिर टूट गया। यह उनके लिए बहुत बड़ा झटका था। लेकिन इस बार उन्होंने हार नहीं मानी।काउंसलिंग और सहयोग ने उन्हें यह समझाया कि रुकावटें असफलता नहीं होतीं। स्वास्थ्य में सुधार के बाद उन्होंने अपनी क्षमता के अनुसार एक शाकाहारी फूड कार्ट शुरू किया।
आज रमेश कुमार गुप्ता नियमित रूप से अपना वेज फूड कार्ट चला रहे हैं, आत्मनिर्भर हैं और सम्मान के साथ जीवन जी रहे हैं।
उनकी कहानी हमें यह सिखाती है— “पैर भले ही टूट जाए, लेकिन अगर हिम्मत कायम रहे, तो ज़िंदगी फिर से खड़ी की जा सकती है।”



GOONJ ComMutiny - The Youth Collective Azim Premji Foundation LivingMyPromise PRAVAH Lucknow Municipal Corporation National Institute of Social Defence - NISD

14/05/2026

आज में मिलिए डिम्पल (बदला हुआ नाम) से। 25 वर्षीय डिम्पल, लखनऊ की निवासी हैं और नट समुदाय से आती हैं, जहाँ पीढ़ियों से “मांगकर खाने” की परंपरा चली आ रही है। आज भी वे अपने बच्चों के साथ शहर के किनारे एक झोपड़ी में बिना मूलभूत सुविधाओं के जीवन जीने को मजबूर हैं।
शिक्षा, पोषण और स्थायी रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी ने उनके जीवन को बेहद कठिन बना दिया था। बरसात के दिनों में झोपड़ी में पानी भर जाता, भोजन का संकट खड़ा हो जाता और बीमारी के समय उचित इलाज भी नहीं मिल पाता।
इन परिस्थितियों ने डिम्पल को भीतर से तोड़ दिया था। वे खुद को असहाय महसूस करती थीं, लेकिन उनके मन में एक सपना था—अपने बच्चों को बेहतर जीवन देना।
जब उनका संपर्क बदलाव से हुआ तब काउंसलिंग के माध्यम से उनकी भावनाओं और संघर्ष को समझा गया। धीरे-धीरे उनके आत्मविश्वास को मजबूत किया गया और उन्हें यह एहसास दिलाया गया कि परिस्थितियाँ स्थायी नहीं होतीं।
उनकी स्थिति और क्षमता को ध्यान में रखते हुए उन्हें बकरी पालन से जोड़ा गया। शुरुआत भले छोटी थी, लेकिन धीरे-धीरे यह उनके लिए स्थायी आय का माध्यम बनने लगा।
आज डिम्पल अपने परिवार की जरूरतों को बेहतर तरीके से पूरा कर पा रही हैं। उनकी भीख पर निर्भरता कम हो रही है और वे सम्मानजनक व आत्मनिर्भर जीवन की ओर बढ़ रही हैं। डिम्पल की कहानी यह बताती है कि सही समय पर मिला सहयोग और अवसर किसी भी जीवन में नई आशा जगा सकता है।



Azim Premji Foundation GOONJ Lucknow Municipal Corporation ComMutiny - The Youth Collective PRAVAH National Institute of Social Defence - NISD Ministry of Social Justice and Empowerment, Government of India LivingMyPromise

13/05/2026

में आज मिलिए गुड़िया (बदला हुआ नाम) से। 22 वर्षीय गुड़िया, लखनऊ के घैला गाँव की निवासी हैं और नट समुदाय से आती हैं। यह समुदाय आज भी गांव के किनारों पर झोपड़ियों में सीमित संसाधनों के साथ जीवन जीने को मजबूर है। पक्का घर, बिजली और स्वच्छता जैसी मूलभूत सुविधाएँ आज भी उनके लिए एक सपना हैं।
बचपन से ही गुड़िया चौराहों और शहरों में भीख मांगकर परिवार का खर्च चलाने में लगी रहीं। उनके समुदाय में शिक्षा और जागरूकता की कमी इतनी गहरी है कि कई लोगों ने इसे अपनी नियति मान लिया है।
शादी के बाद उनके पति फूल, गजरा और रेडियम पट्टी बेचने का काम करने लगे, लेकिन सीमित पूंजी के कारण आमदनी स्थिर नहीं हो पाती थी। जब कमाई कम पड़ती, तो गुड़िया को फिर से सड़कों पर जाकर भीख मांगनी पड़ती।
वह कहती हैं— “हमें ऐसा जीवन अच्छा नहीं लगता, लेकिन मजबूरी में करना पड़ता है।”
इसी दौरान जब उनका संपर्क बदलाव से हुआ तब बदलाव न उनके आत्मविश्वास को बढ़ाने और उन्हें बेहतर जीवन की दिशा दिखाने का प्रयास किया ।
उनकी मौजूदा आजीविका को ध्यान में रखते हुए फूल, गजरा और सजावट के काम को व्यवस्थित करने में सहयोग दिया गया। धीरे-धीरे उन्होंने अपने पति के साथ इस काम को मजबूती से आगे बढ़ाना शुरू किया।
आज गुड़िया अपने परिवार के साथ सम्मानजनक जीवन की ओर कदम बढ़ा रही हैं। उनकी आय में सुधार हुआ है, भीख पर निर्भरता कम हो रही है और आत्मनिर्भरता की राह मजबूत हो रही है।
गुड़िया की कहानी यह दिखाती है कि सही सहयोग, मार्गदर्शन और अवसर मिल जाएँ, तो पीढ़ियों से चली आ रही मजबूरियों को भी बदला जा सकता है।



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12/05/2026

आज में जानिए जमुना (बदला हुआ नाम) को। 35 वर्षीय जमुना, लखनऊ के घैला क्षेत्र की निवासी हैं और नट समुदाय से आती हैं, जहाँ पीढ़ियों से “मांगकर खाने” और पशुपालन की परंपरा चली आ रही है। शिक्षा और जागरूकता की कमी के कारण उनका समुदाय आज भी सामाजिक रूप से पिछड़ा हुआ है।
जमुना बताती हैं कि उनके समुदाय में बच्चों को सही अवसर नहीं मिल पाते और वे कम उम्र से ही पारंपरिक कामों में लग जाते हैं।
वह कहती हैं—
“कभी-कभी लगता है कि हम इंसान ही नहीं हैं… कोई हमें काम नहीं देता।”
इन कठिन परिस्थितियों के बीच भी जमुना के मन में एक सपना था—अपने बच्चों को वह जीवन देना, जो उन्हें कभी नहीं मिला।
बदलाव से जुड़ने के बाद काउंसलिंग के माध्यम से उनकी भावनाओं, संघर्षों और सपनों को समझा गया। उनकी मेहनत और अपने बच्चों के लिए बेहतर भविष्य बनाने की इच्छा को नई दिशा दी गई।
उनकी रुचि और अनुभव को ध्यान में रखते हुए उन्हें बकरी पालन से जोड़ा गया। बदलाव के सहयोग से उन्होंने यह काम शुरू किया, जिससे उन्हें सम्मानजनक और स्थायी आय मिलने लगी।
आज जमुना न केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं, बल्कि “बदलावशाला” में बच्चों को पढ़ाने का काम भी कर रही हैं।
वह अपने समुदाय के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने का प्रयास कर रही हैं ताकि आने वाली पीढ़ियाँ उसी संघर्ष में न फँसे रहें।
आज जमुना की पहचान सिर्फ संघर्षरत महिला की नहीं, बल्कि एक शिक्षिका, आत्मनिर्भर महिला और अपने समुदाय की प्रेरणा के रूप में बन चुकी है।



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