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09/05/2026
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बिना लाइसेंस धड़ल्ले से बिक रहा खाद्य सामान, विभाग बेखबर!”
यह केवल मथुरा की समस्या नहीं है। यह पूरे Uttar Pradesh की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर खड़ा होता एक बड़ा और असहज प्रश्न है।
सड़क,नाली किनारे बिकता ज़हर, और विभागों की बंद आँखें!”
लाइसेंस होटल वालों को… लेकिन फुटपाथ पर सड़क किनारे खोमचे, ठेला,ढकेल व गलियों में खुलेआम परोसा जा रहा मौत का नाश्ता?“
एक शहर, दो कानून? — बड़े दुकानदारों के लिए नियम, ठेलों पर खुली छूट!”
मथुरा की सड़कों पर बिना Food License बिक रहा खाना — आखिर कानून गरीब पर लागू नहीं होता या जनता की जान सस्ती है?
Mathura में खाद्य सुरक्षा विभाग द्वारा बड़े होटल, रेस्टोरेंट, मिठाई प्रतिष्ठानों और नामी दुकानों से खाद्य पदार्थों के सैंपल लिए जा रहे हैं। कार्रवाई होनी भी चाहिए, क्योंकि जनता की सेहत से बड़ा कोई विषय नहीं। लेकिन इसी शहर की गलियों, तिराहों, चौराहों और नालों के किनारे खुलेआम बिक रहे खाद्य पदार्थों पर आखिर विभाग की नजर क्यों नहीं पड़ती?
सुबह का नाश्ता हो, चाट-पकौड़ी, मोमोज, चाइनीज फूड, टिक्की, समोसे या खुले तेल में तले जा रहे खाद्य पदार्थ — शहर के हर मोहल्ले में बिना किसी खाद्य सुरक्षा मानक, बिना स्वच्छता और बिना लाइसेंस के धकेलों पर खुलेआम बेचे जा रहे हैं। धूल, मक्खियाँ, दूषित पानी, सड़े तेल और बदबूदार नालों के बीच तैयार हो रहा यह भोजन आखिर किस कानून के दायरे में आता है?
प्रश्न यह नहीं कि कोई गरीब व्यक्ति अपना रोजगार क्यों कर रहा है। भारत का संविधान हर नागरिक को सम्मानपूर्वक जीविका कमाने का अधिकार देता है। प्रश्न यह है कि जब होटल संचालकों, रेस्टोरेंट मालिकों और मिठाई विक्रेताओं के लिए Food Safety License अनिवार्य है, तो सड़क किनारे खाद्य पदार्थ बेचने वालों के लिए यह नियम मौन क्यों हो जाता है?
क्या सड़क पर बिकने वाला भोजन भोजन नहीं होता?
क्या उन ग्राहकों का जीवन मूल्यहीन है जो रोज़ाना इन धकेलों से खाना खरीदते हैं?
क्या खाद्य सुरक्षा कानून केवल बड़ी दुकानों तक सीमित है?
या फिर विभाग केवल वहीं कार्रवाई करता है जहाँ कागज़ी प्रक्रिया आसान हो?
भीषण गर्मी शुरू हो चुकी है। ऐसे मौसम में दूषित खाद्य पदार्थों से फूड पॉइज़निंग, उल्टी-दस्त, संक्रमण और गंभीर बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। डॉक्टर लगातार चेतावनी देते हैं कि खुले में रखा भोजन जानलेवा हो सकता है। इसके बावजूद शहर में बिना जांच, बिना लाइसेंस और बिना स्वच्छता मानकों के खाद्य सामग्री खुलेआम बिक रही है।
सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जिन प्रतिष्ठानों के पास स्थायी दुकानें हैं, जिनका रिकॉर्ड मौजूद है, उन्हीं पर बार-बार कार्रवाई दिखाई देती है। जबकि अस्थायी धकेलों और ठेलों पर बिक रहे खाद्य पदार्थों की न तो नियमित जांच होती दिखाई देती है, न लाइसेंस की अनिवार्यता, न hygiene की निगरानी।
यदि कानून सबके लिए समान है, तो फिर खाद्य सुरक्षा के नियम भी सब पर समान रूप से लागू होने चाहिए। चाहे पाँच सितारा होटल हो या सड़क किनारे चाट का ठेला — ग्राहक का पेट और उसकी जिंदगी दोनों समान महत्व रखते हैं।
आज आवश्यकता केवल सैंपलिंग की नहीं, बल्कि व्यापक और निष्पक्ष खाद्य सुरक्षा अभियान की है।
हर खाद्य विक्रेता का पंजीकरण हो।
धकेल और ठेला संचालकों को hygiene training दी जाए।समय आ गया है कि पूरा Uttar Pradesh एक समान खाद्य सुरक्षा नीति लागू करे —
जहाँ होटल हो या ठेला,
रेस्टोरेंट हो या धकेल,
मिठाई की दुकान हो या चाट का स्टॉल —
हर किसी के लिए hygiene, registration और नियमित sampling अनिवार्य हो।
क्योंकि बीमारी यह नहीं देखती कि खाना पाँच सितारा होटल से आया है या सड़क किनारे ठेले से।
ज़हर, ज़हर होता है।
खुले नालों के पास खाद्य बिक्री पर रोक लगे।
लाइसेंस अनिवार्य किया जाए।
और नियमित सैंपलिंग हर स्तर पर हो।
क्योंकि सवाल केवल व्यापार का नहीं…
सवाल जनता की सेहत, बच्चों के भविष्य और प्रशासन की जवाबदेही का है।
“अगर होटल का खाना जांच के दायरे में है, तो सड़क पर बिक रहा भोजन कानून से बाहर क्यों?”
मथुरा पूछ रहा है — खाद्य सुरक्षा केवल कागज़ों तक सीमित है या जनता की थाली तक भी पहुँचेगी?”
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