Nafees Ahmad
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"मैं दिया हूं मेरी दुश्मनी तो अंधेरे से है!
हवा तो बेवजह मेरे ख़िलाफ़ है....!"
" सौ बार हुई कोशिश मुझको इसी मिट्टी में मिलाने की,
मगर बीज हूं मैं तो,आदत है हर बार निकल जाने की!"
"किस ज़रूरत को दबाऊँ किसे पूरा कर लूँ..?
अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने !!"
- जगदीप सिंह
शेख हसीना लगातार चुनाव जीत रही थीं। हर तरफ़ धाँधली करने का आरोप था, लेकिन कुछ मानने को तैयार नहीं थीं..! वहाँ के चुनाव आयोग की ज़िम्मेदारी थी कि जनता में पल रहे शक़ को दूर करे....लेकिन वह सरकार का जी हुज़ूर बना रहा...और फिर जो हुआ उसे सबने देखा। प्रचंड जीत का तमगा लटकाये शेख हसीना को देश छोड़कर भागना पड़ा...!
किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए यह सबक़ है। लोकतंत्र दरअसल, अलोकप्रिय हो गये शासकों की गर्दन बचाता है क्योंकि वे जनमत के आगे सर झुका देते हैं।
हो सकता है हरियाणा में बीजेपी सचमुच जीती हो। धाँधली के तमाम आरोप ग़लत हों। लेकिन चुनाव आयोग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि तमाम ज़िलों में दूसरे राउंड के बाद आयीं ईवीएम में बैटरी 99 फ़ीसदी तक चार्ज कैसे थी? पोस्टल बैलट से लेकर दो राउंड तक जो ग़िनती मे कांग्रेस सत्तर सीटों तक पहुँच गयी थी, अचानक वह लुढ़कती चली गयी। क्या ऐसा हो सकता है कि शुरुआत में कांग्रेस के पक्ष में वोट करने वाली जनता, मतदान के दिन दो घंटे बाद बीजेपी के लिए वोट डालने लगी?
यह पहली बार हुआ कि समाचार माध्यमों ने अपने स्रोतों से रुझान देना बंद कर दिया। आख़िर क्यों दो घंटे तक इलेक्शन कमीशन की वेबसाइट पर आँकड़े स्थिर रहे? इसका कारण क्या था? और इस बीच सारे समाचार माध्यम उसकी ही वेबसाइट के आँकड़े दिखाते रहे, उनकी क्या मजबूरी थी?
कांग्रेस की तुलना में महज़ .06 (दशमलव शून्य छह )फ़ीसदी वोट ज़्यादा होने से बीजेपी की तीस फ़ीसदी सीटें बढ़ जायें, यह किसी सैफ़ोलाजिस्ट के गले नहीं उतरेगा।
बलात्कारी बाबा राम-रहीम को बार-बार पैरोल देने पर अदालत तक सवाल उठा चुकी है, फिर भी आयोग ने चुनाव के समय उसे जेल से बाहर जाने पर नहीं रोका। यह कौन नहीं जानता कि बाबा एक डेरा चलाता है जिससे जु़ड़े उसके अनुयायी भी वोटर हैं। बीजेपी तो बलात्कारी के सामने नतमस्तक है, चुनाव आयोग क्यों? चुनाव प्रचार से दूर रखने की आयोग की नसीहत को उसने बत्ती बनाकर कहाँ खोंसी, कोई भी जान सकता है।
संविधान चुनाव आयोग को पूरी स्वतंत्रता देता है। फिर पीएम मोदी ने आयुक्त की नियुक्ति का अधिकार अपने पास क्यों रखा? सुप्रीम कोर्ट का निर्देश था कि चयन समिति में चीफ़ जस्टिस भी रहेंगे, लेकिन कानून बनाकर उन्हें बाहर कर दिया गया। पीएम और उनके एक मंत्री को जगह दे दी गयी। ऐसे में चयन समिति में नेता प्रतिपक्ष के होने का कोई मतलब नहीं रह गया। आख़िर मोदी जी किस लिए चुनाव आयोग को अपने नियंत्रण में रखना चाहते हैं अगर बेईमानी नहीं करनी है तो?
सरकार और चुनाव आयोग को इन सारे संदेहों को दूर करना चाहिए। यह जवाब नहीं हो सकता कि ईवीएम कोई हैक करके दिखाये। जो लोग हैकिंग के शिकार होते हैं, वे हैक करने की तकनीक नहीं जानते। इससे हैकिंग और हैकर का अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता।
लोकतंत्र पर लोगों का भरोसा बना रहना चाहिए। बांग्लादेश से हसीना तो भाग निकलीं, चुनाव आयोग के लोगों का क्या हुआ, कोई जानता है क्या?
भारत बांग्लादेश नहीं है। इसे होने भी नहीं देंगे। अफ़सोस यह संकल्प सरकार में नहीं दिखता!....साभार
Pankaj Srivastava
रसूल अल्लाह ﷺ ने फरमाया:
इंसान कहता है मेरा माल, मेरा माल। फ़रमाया आदम के बेटे! तेरे माल में से तेरे लिये सिर्फ़ वही है जो आपने खा कर फ़ना कर दिया, या पहन कर पुराना कर दिया, या सदक़ा करके आगे भेज दिया।
(सहीह मुस्लिम हदीस न. 7420 )
Dr मेजर हिमांशु जी को योंमें पैदाइस की बहुत बहुत बधाई,
"इन पत्थरों के शहर में जीना मुहाल है..
हर शख़्स कह रहा है, मुझे देवता कहो!"
- अज्ञात
अगर किसी के मरने पर कुत्ते नाच रहे हों तो जान लो मरने वाला शेर था !!
"उड़ने दो इसे मिट्टी ही तो है, आख़िर कहां तक जाएगी?
थमने तो दो हवा को ज़रा फिर ज़मी पर ही आएगी!"
एक अखबार बाँटने वाले लड़के ने एक क़िस्सा सुनायाः-
“जिन घरों में मैं अखबार बाँटा करता था, उनमें से एक ने एक बार अपने दरवाज़े पर लटके अख़बार डालने वाले डिब्बे को कुछ इस तरह से अवरुद्ध कर दिया था कि मैं उसमें अख़बार डाल ही नहीं सकता था।”
“तब उनका मैंने दरवाजा खटखटाया। अस्थिर कदमों वाले एक बुजुर्ग व्यक्ति, जो बनर्जी सा’ब थे, ने धीरे से दरवाजा खोला। मैंने पूछा, ‘सर, आपने बॉक्स के छेद को क्यों अवरुद्ध कर दिया है?’ तो उन्होंने जवाब दिया, ‘मैंने जानबूझकर ऐसा किया है।’ वे मुस्कुराए फिर बोले, ‘मैं चाहता हूँ कि आप हर दिन मुझे अखबार दें... पर कृपा करके पहले दरवाजा खटखटाएँ या घंटी बजाएँ और फिर मुझे व्यक्तिगत रूप से अख़बार दें!’”
अख़बार वाला बताए जा रहा था, “मैं हैरान हो गया, पर पूछा, ‘ज़रूर सर, लेकिन क्या यह हम दोनों के लिए असुविधाजनक और समय की बर्बादी वाला मामला नहीं होगा?’”
“वो बोले, ‘नहीं, ऐसा नहीं होगा। जो बोला, वही करना… और हाँ, मैं तुम्हें इसके लिए हर महीने 500/- रुपये अतिरिक्त दूँगा।’”
“विनती भरी अभिव्यक्ति के साथ उन्होंने कहा, ‘अगर कभी ऐसा दिन आए, जब आप दरवाज़ा खटखटाए और मैं न खोलूँ, तो कृपया पुलिस को बुला लेना!’”
“मैं चौंक गया, मैंने पूछा, ‘क्यों?’”
“उन्होंने उत्तर दिया, ‘मेरी पत्नी का निधन हो चुका है, मेरा बेटा विदेश में रहता है… और मैं यहाँ अकेला रहता हूँ, कौन जानता है कि कब मेरा समय आ जाए?’ उस पल, मैंने उस बूढ़े आदमी की धुंधली आँखों को नम होते देखा।”
“उन्होंने आगे कहा, ‘मैंने कभी तुम्हारा अखबार नहीं पढ़ा... मैं सिर्फ़ दरवाज़ा खटखटाने या दरवाजे की घंटी बजने की आवाज सुनने के लिए तुमसे अख़बार लेता हूँ, एक परिचित-चेहरा देखने और कुछ शब्दों और खुशियों का आदान-प्रदान करने के लिए!’”
“उसने हाथ जोड़कर कहा, ‘बेटे, कृपया मुझ पर एक एहसान करना! यह मेरे बेटे का विदेशी फोन नंबर है। यदि किसी दिन तुम दरवाजा खटखटाओ और मैं जवाब न दूँ, तो कृपा करके मेरे बेटे को फोन करके सूचित कर देना..!!’”
हाल के दशकों में आई तरक़्क़ी की बाढ़ के बीच, कई लोग कुछ अलग ही क़िस्म की समस्याओं का सामना कर रहे हैं। ऐसे में अपने परिचित अकेले रह रहे इस तरह के बुजुर्गों के साथ व्हाट्सअप पर अभिवादन का आदान-प्रदान करना भी, उनके घर के दरवाज़े पर घंटी बजाने से कम नहीं होगा!
Shanker Lal Chhatri
- इंद्रजीत अहलूवालिया
एक राजा था ।.. उसने एक सर्वे करनेका सोचा कि
मेरे राज्य के लोगों की घर गृहस्थि पति से चलती है या पत्नि से..।
उसने एक ईनाम रखा कि " जिसके घर में पतिका हुकम चलता हो उसे मनपसंद घोडा़ ईनाम में मिलेगा और जिसके घर में पत्नि की सरकार हो वह एक सेब ले जाए.. ।
एक के बाद एक सभी नगरजन सेब उठाकर जाने लगे । राजाको चिंता होने लगी.. क्या मेरे राज्य में सभी सेब ही हैं ?
इतने में एक लम्बी लम्बी मुछों वाला, मोटा तगडा़ और लाल लाल आखोंवाला जवान आया और बोला
" राजा जी मेरे घर में मेरा ही हुकम चलता है .. ला ओ घोडा़ मुझे दिजीए .."
राजा खुश हो गए और कहा जा अपना मनपसंद घोडा़ ले जा ..। जवान काला घोडा़ लेकर रवाना हो गया ।
घर गया और फिर थोडी़ देरमें दरबार में वापिस लौट आया।
राजा: " क्या हुआ जवामर्द ? वापिस क्यों आया !
जवान : " महाराज, घरवाली कहती है काला रंग अशुभ होता है, सफेद रंग शांति का प्रतिक होता है तो आप मुझे सफेद रंग का घोडा़ दिजिए
राजा: " घोडा़ रख ..और सेब लेकर चलती पकड़ ।
इसी तरह रात हो गई .. दरबार खाली हो गया लोग सेब लेकर चले गए ।
आधी रात को महामंत्री ने दरवाजा खटखटाया..
राजा : " बोलो महामंत्री कैसे आना हुआ ?
महामंत्री : " महाराज आपने सेब और घोडा़ ईनाम में रखा ,इसकी जगह एक मण अनाज या सोना महोर रखा होता तो लोग लोग कुछ दिन खा सकते या जेवर बना सकते ।
राजा :" मुझे तो ईनाम में यही रखना था लेकिन महारानी ने कहा कि सेब और घोडा़ ही ठीक है इसलिए वही रखा ।
महामंत्री : " महाराज आपके लिए सेब काट दूं.!!
राजा को हँसी आ गई । और पूछा यह सवाल तुम दरबारमें या कल सुबह भी पूछ सकते थे । तो आधी रात को क्यों आये ??
महामंत्री : " मेरी धर्मपत्नि ने कहा अभी जाओ और पूछ के आओ सच्ची घटना का पता चले ..।
राजा ( बात काटकर ) : " महामंत्री जी , सेब आप खुद ले लोगे या घर भेज दिया जाए ।"
Moral of the story..
समाज चाहे पुरुषप्रधान हो लेकिन संसार स्त्रीप्रधान है!
-देशबन्धु आचार्य
😀😀
अगर इल्तिजाएं रद होती तो,
अल्लाह यह कभी नहीं कहता कि मुझ से मांगो मै तुम्हें दूंगा..!!
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