Pradeep Kumar
ब्रजप्रेम, मुरारी, ब्रजबाला, मोहन, राधा
27/06/2026
. *श्री राधा लीलामृतम् भाग २*
मैं द्वारकेश श्रीकृष्ण का प्रपौत्र वज्रनाभ !
और मैं पाण्डवों का पौत्र परीक्षित !
ओह ! मैं महर्षि शाण्डिल्य तुम दोनों को देखकर आज अतिप्रसन्न हुआ ......... ऋषि नें प्रसन्नता व्यक्त की ।
*महर्षि शाण्डिल्य ? वज्रनाभ चौंके...........आप ही हैं महर्षि ! पूज्य चरण श्रीनन्दबाबा के कुल पुरोहित ?*
*_ऋषि मुस्कुराये ......... नन्दनन्दन श्रीकृष्ण का पुरोहित......... ऊपर की ओर देखते हुए उन्होंने लम्बी साँस ली . .......हाँ मैं श्रीमान् नन्द राय और स्नेह मूर्ति मैया यशोदा का पुरोहित हूँ ।_*
नेत्रों से झरझर आँसू बह चले थे, वज्रनाभ और परीक्षित के ....।
पर आज बृज की ये स्थिति ?
ऐसा वीरान क्यों हो गया ये बृज मण्डल ?
उठे महर्षि शाण्डिल्य ............ कुटिया से बाहर आये ............ वज्रनाभ और परीक्षित ने भी उनका अनुसरण किया ।
*श्रीकृष्ण .............. पूर्णब्रह्म .......... पूर्ण परात्पर परब्रह्म ..........।*
इतना बोलकर मौन हो गए थे महर्षि ..............
फिर कुछ समय बाद ही मौन को तोड़ा था उन्होंने ............
*दो प्रकार की लीलाएं होती हैं भगवान की* महर्षि नें समझाया ।
_एक लीला होती है .*"व्यवहारिकी"*, और दूसरी लीला होती है *"नित्य"* ।_
*व्यवहारिकी लीला में विरह दिखाई देता है .........महर्षि प्रेमसे "लीला रहस्य" को समझा रहे थे ।*
*व्यवहारिकी लीला में वियोग दिखाई देता है* ............मिलना दिखाई देता है और बिछुड़ना दिखाई देता है ........लीला का प्राकट्य दिखाई देता है .....और लीला का संवरण दिखाई देता है ............
पर *एक लीला चल रही है ...........नित्य निरन्तर चल रही है ...... .प्रलय में भी उस लीला का विराम नही होता ........... ये नित्य लीला ब्रह्म और उसकी आल्हादिनी के साथ चलती ही रहती है*।
*आल्हादिनी* ? वज्रनाभ नें पूछना चाहा।
महर्षि के नेत्र सजल हो उठे .............. भावातिरेक से उनकी वाणी अवरुद्ध हो गयी .........वो काफी देर तक कुछ बोल नही पाये ।
*राधा ! राधा ! राधा ! यही नाम गूंजनें लगा महर्षि के रोम रोम से .......आश्चर्य ! पृथ्वी का कण कण बोलने लगा था - राधा ! राधा ! राधा ! .....आकाश भी गुँजित हो उठा .......राधा राधा राधा !*
घड़ी दो घड़ी बीतनें पर जब महर्षि को होश आया तब ........
*राधा कौन है ? हस्तिनापुर नरेश परीक्षित नें ये प्रश्न किया था ।*
*_राधा ! आहा ! महर्षि आनन्दसिंधु में डूब रहे थे ।_*
क्या तुम लोगों नें ब्रह्म का ये नाम "आत्माराम" नही सुना ?
क्या तुम नही जानते कि *ब्रह्म को "आत्माराम" कहा जाता है* ?
सिर हिलाकर वज्रनाभ नें महर्षि की बात का अनुमोदन किया ।
_वत्स ! पता है तुम्हे वो ब्रह्म अपनी ही आत्मा से रमण करता है इसलिये उसे "*आत्माराम*" कहा गया है ।_
_महर्षि शाण्डिल्य गाम्भीर्य चर्चा करनें जा रहे थे । वत्स ! *ब्रह्म की आत्मा का नाम ही है राधा*.......महर्षि नें बताया ।_
*प्रेम है ब्रह्म की राधा ...... ब्रह्म के प्रेम नें ही आकार ले लिया है राधा के रूप में........कृष्ण ब्रह्म हैं......और उनकी आत्मा ही राधा हैं ।*
लम्बी साँस ली महर्षि नें ............... फिर बोले ..............
जिस भूमि में मैं बैठा हूँ ..........ये भूमि उन्हीं ब्रजेश्वरी श्रीराधा रानी की है .......ये उन्हीं की जन्म भूमि है ............।
हाँ ..........इसी का नाम है बरसाना ( प्राचीन शास्त्र में इसका नाम "वृहत्सानुपुर" बताया गया है )
*इसी बरसानें में उस दिव्य भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को मध्यान्ह के समय श्रीराधारानी का प्राकट्य हुआ था ..........आहा ! क्या दिन था वो ..........मुझे जब जब स्मरण होता है मैं भाव में डूब जाता हूँ ।*
*_यहाँ बरसा था वो प्रेम रस ...........पर नित्य लीला रुकी नही है ............ये व्यवहारिकी लीला ही रुक गयी है .......... बाकी नित्य लीला तो अभी भी चल ही रही है ।_*
महर्षि की बातों से वज्रनाभ आनन्दित हुए ............रात्रि होनें जा रही थी ..........परीक्षित को लौटना था हस्तिनापुर ........क्यों की उनको तो प्रजा भी देखनी थी !
परीक्षित नें फिर आनें की बात कहकर ......सौ, दो सौ सैनिक व्यवस्था में छोड़कर ..... चले गए ।
*पर वज्रनाभ को तो महर्षि शाण्डिल्य से "श्रीराधा लीलामृतम्" सुनना था ......और सम्पूर्ण सुनना था ........जिन श्रीराधा के पीछे कृष्ण अपनें आपको मिटाकर दौड़ पड़ता था ........जिन श्रीराधा के चरणों में अपनें आपको चढ़ा देता था ............उस "श्रीराधा लीलामृतम्" को सुनना चाहता है ये श्रीकृष्ण का पड़पोता वज्रनाभ .................. प्रार्थना की महर्षि शाण्डिल्य के चरणों में ।*
*क्या ! श्रीराधा लीलामृतम्?*
हाँ ...............आप ही मुझे सुना सकते हैं महर्षि ! मना न करें । वज्रनाभ नें प्रार्थना की।
राधे तू बड़ भागिनी कौन तपस्या किन !
तीन लोक तारन तरन सो तेरे आधीन !!
क्रमशः......
*श्री राधे राधे*
. *पैदल पुराण :-पैदल चलें :पैदल चलते रहें*
१--पैदल चलनें से मानसिक संतुलन ठीक रहता है।
२-- पैदल चलनें से नींद अच्छी आती है।
३-- पैदल चलने से शुगर कंट्रोल होती है।
४-- पैदल चलनें से चिड़चिड़ापन कम होता है।
५-- पैदल चलनें से मोटापा नियंत्रित रहता है।
६-- पैदल चलनें से फेफडे मजबूत होते हैं।
७-- पैदल चलनें से हार्ट सही कार्य करता है।
८-- पैदल चलनें से भोजन पचता है।
९-- पैदल चलनें से गैस नहीं बनती।
१०-- पैदल चलनें से थकान दूर होती है।
११-- पैदल चलनें से खून शुद्ध होता है।
१२-- पैदल चलनें से बुद्धि तेज होती है।
१३-- पैदल चलनें से हड्डियां मजबूत होती है।
१४-- पैदल चलनें से आत्मविश्वास बढता है।
१५-- पैदल चलनें से बल बढता है।
१६-- पैदल चलनें से त्वचा रोग नहीं होते।
१७-- पैदल चलनें से वात - पित- कफ नियंत्रण में रहते हैं।
१८-- भोजन के पश्चात् नित्य ३०० कदम पैदल चलने से पेट के रोग नहीं होते और मनुष्य की आयु बढ़ती है!
१९-- पैदल पत्थरों पर नंगे पांव चलने से शरीर में रक्त सुचारू रूप से संतुलित होता है!
२०-- पैरों के तलवे में रक्त को परिसंचरण करने के लिए सूक्ष्म पम्प होते हैं जिससे रक्त शरीर के हर अंग में जाता है!
२१-- सूर्य के प्रकाश में नित्य एक घंटा पैदल चलने से डाइबिटीज नहीं होती!
२२-- ऋषि- मुनियों का सबसे बड़ा योग था पैदल चलना!
२३-- श्रीराम १४ वर्ष लक्ष्मण के साथ वनों में पैदल घूमें!
२४-- पांडव जीवन पर्यन्त पैदल चलकर अनेक सिद्धियां प्राप्त करते रहे!
२५-- पैदल चलें खूब चलें और रात्रि को पैरों की मालिश अवश्य करें!
२६-- पैदल चलने वालों की इच्छा शक्ति बलवती होती है!
२७-- पैर ईश्वर ने पैदल चलने के लिए ही दिए हैं!
२८-- पैदल चलते रहने से सभी जंगली जीव अनेक रोगों से बचे रहते हैं!
२९-- पक्षियों के पूरे शरीर में जो महत्व पंखों का है, वहीं पैरों का महत्व शरीर के लिए है!
३०-- पैदल चलने से शरीर गर्म रहता है!
३१-- पैदल चलते रहने से बहुत से लोग बड़े बड़े विचारक और दार्शनिक बन गये!
३२-- पैदल चलना ही जीवन है!
पैदल चलें चलते रहें और सबको चलाते रहें।
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