Astro Alok Ranjan Upadhyay

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ज्योतिष एक छद्म विज्ञान है जिसमें सूर्य, चंद्रमा और ग्रहों की स्थिति के आधार पर मानव घटनाओं की भविष्यवाणी या व्याख्या की जाती है ।

28/06/2026

🏡 गृह प्रवेश की पूजा क्यों की जाती है? इसका ज्योतिषीय महत्व और लाभ

"घर केवल ईंट, पत्थर और सीमेंट से नहीं बनता, बल्कि उसमें रहने वाले लोगों की सकारात्मक ऊर्जा, सुख, शांति और ईश्वर की कृपा से वह सच्चा 'गृह' बनता है।"

आजकल कई लोग नया घर बनाते या खरीदते ही सीधे उसमें रहने लगते हैं, लेकिन सनातन परंपरा में गृह प्रवेश (गृह-प्रवेश संस्कार) का विशेष महत्व बताया गया है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि वैदिक ज्योतिष, वास्तुशास्त्र और आध्यात्मिक विज्ञान का सुंदर समन्वय है।

🪔 गृह प्रवेश पूजा क्यों की जाती है?

शास्त्रों के अनुसार किसी भी नए भवन में प्रवेश करने से पहले वहाँ की ऊर्जा को शुद्ध एवं मंगलमय बनाना आवश्यक माना गया है। निर्माण के दौरान अनेक प्रकार की ऊर्जाएँ उस स्थान से जुड़ती हैं। गृह प्रवेश पूजा का उद्देश्य उन नकारात्मक प्रभावों को दूर कर घर में देवताओं का आशीर्वाद, सकारात्मक ऊर्जा और सुख-समृद्धि का स्वागत करना है।

पूजा के दौरान भगवान गणेश, कुलदेवता, वास्तुदेव, पंचदेव, नवग्रह तथा अग्निदेव का पूजन कर घर को आध्यात्मिक रूप से पवित्र किया जाता है।

🔯 ज्योतिषीय दृष्टि से गृह प्रवेश का महत्व

वैदिक ज्योतिष में प्रत्येक कार्य के लिए शुभ समय (मुहूर्त) का विशेष महत्व बताया गया है। यदि गृह प्रवेश शुभ मुहूर्त में किया जाए, तो इसके अनेक सकारात्मक फल बताए गए हैं—

✨ 1. नवग्रहों की शुभता प्राप्त होती है

गृह प्रवेश में नवग्रह पूजन करने से ग्रहों की अशुभता कम होती है और शुभ ग्रहों का प्रभाव बढ़ता है। इससे परिवार में सुख, स्वास्थ्य और आर्थिक उन्नति के योग मजबूत होते हैं।

✨ 2. वास्तु दोषों का शमन

यदि घर में छोटे-मोटे वास्तु दोष हों और उन्हें तुरंत ठीक करना संभव न हो, तो विधिवत गृह प्रवेश एवं वास्तु शांति पूजा से उनके दुष्प्रभाव को काफी हद तक कम करने का प्रयास किया जाता है।

✨ 3. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

हवन, मंत्रोच्चार और वैदिक अनुष्ठान से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इससे घर में मानसिक शांति, प्रेम और सौहार्द का वातावरण बनता है।

✨ 4. धन एवं समृद्धि के योग

माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर का पूजन आर्थिक स्थिरता और समृद्धि की मंगलकामना के साथ किया जाता है। शुभ मुहूर्त में प्रवेश को धन-वृद्धि के लिए शुभ माना गया है।

✨ 5. रोग एवं बाधाओं से रक्षा

वैदिक मान्यता के अनुसार गृह प्रवेश के समय किए गए हवन और मंत्र वातावरण की शुद्धि तथा मानसिक संतुलन का प्रतीक हैं। धार्मिक दृष्टि से इन्हें परिवार की रक्षा और मंगल की कामना से जोड़ा जाता है।

📅 गृह प्रवेश कब करना चाहिए?

ज्योतिष के अनुसार गृह प्रवेश हमेशा शुभ मुहूर्त में करना चाहिए। इसके लिए तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण, लग्न तथा परिवार के मुखिया की जन्मकुंडली का भी विचार किया जाता है।

सामान्यतः शुभ माने जाने वाले नक्षत्रों में— 🌸 रोहिणी
🌸 मृगशिरा
🌸 उत्तराफाल्गुनी
🌸 हस्त
🌸 अनुराधा
🌸 उत्तराषाढ़ा
🌸 उत्तराभाद्रपदा
🌸 रेवती

(अंतिम मुहूर्त हमेशा योग्य ज्योतिषी से व्यक्तिगत कुंडली के अनुसार ही निर्धारित कराना उचित रहता है।)

⚠️ किन बातों का ध्यान रखें?

✅ गृह प्रवेश से पहले घर की अच्छी तरह सफाई करें।
✅ पूजा से पहले कलश स्थापना एवं हवन कराएँ।
✅ प्रथम प्रवेश दाहिने पैर से करें।
✅ घर में दीपक अवश्य जलाएँ।
✅ परिवार के सभी सदस्य पूजा में सम्मिलित हों।
✅ गृह प्रवेश के बाद पहली रसोई बनाकर भगवान को भोग अर्पित करें।

🌺 निष्कर्ष

गृह प्रवेश केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि आस्था, ज्योतिष, वास्तु और सकारात्मक जीवन-दृष्टि का संगम है। इसका उद्देश्य घर को ईश्वर की कृपा, शुभ संकल्प और मंगलमय वातावरण से जोड़ना है। जब नया जीवन नए घर से शुरू होता है, तो शुभ भाव, प्रार्थना और परिवार का साथ उस शुरुआत को और भी विशेष बना देता है।

🙏 आप जब भी नया घर बनवाएँ या खरीदें, तो योग्य विद्वान से शुभ मुहूर्त निकलवाकर विधि-विधान से गृह प्रवेश अवश्य करें।

📿 ज्योतिषाचार्य आलोक रंजन उपाध्याय (स्वर्ण पदक प्राप्त)
✨ ज्योतिष | वास्तु | धार्मिक मार्गदर्शन ✨
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24/06/2026

🔱 मांगलिक दोष – डर नहीं, सही समझ जरूरी है 🔱

आज के समय में विवाह से पहले सबसे अधिक चर्चा जिस विषय की होती है, वह है मांगलिक दोष (मंगल दोष)। कई बार केवल “मांगलिक” शब्द सुनते ही लोगों के मन में भय, चिंता और अनिश्चितता पैदा हो जाती है। लेकिन क्या वास्तव में मांगलिक दोष इतना भयावह है? क्या हर मांगलिक व्यक्ति का वैवाहिक जीवन कठिन होता है? आइए, इस विषय को ज्योतिषीय दृष्टि से सरल भाषा में समझते हैं।

🌺 मांगलिक दोष क्या है?

वैदिक ज्योतिष के अनुसार यदि जन्म कुंडली में मंगल ग्रह प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में स्थित हो, तो मांगलिक दोष माना जाता है।

मंगल ग्रह ऊर्जा, साहस, क्रोध, आत्मविश्वास, संघर्ष और नेतृत्व का कारक है। जब यह विवाह और पारिवारिक सुख से जुड़े भावों को प्रभावित करता है, तब व्यक्ति के स्वभाव और वैवाहिक जीवन में कुछ चुनौतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

🔥 मंगल किस भाव में क्या प्रभाव देता है?

1️⃣ प्रथम भाव में मंगल

व्यक्ति स्वभाव से तेज, स्पष्टवादी और कभी-कभी क्रोधी हो सकता है। वैवाहिक जीवन में अहंकार या छोटी-छोटी बातों पर मतभेद की संभावना बढ़ सकती है।

2️⃣ चतुर्थ भाव में मंगल

घर-परिवार के वातावरण में तनाव, गृहकलह या मानसिक अशांति की स्थिति बन सकती है। ससुराल पक्ष से भी मतभेद संभव हैं।

3️⃣ सप्तम भाव में मंगल

यह विवाह भाव है। यहाँ मंगल होने पर पति-पत्नी के बीच विचारों का टकराव, विवाद या संबंधों में तनाव देखने को मिल सकता है।

4️⃣ अष्टम भाव में मंगल

यह भाव जीवनसाथी की आयु, स्वास्थ्य और ससुराल पक्ष से जुड़ा होता है। इस स्थिति में वैवाहिक जीवन में उतार-चढ़ाव या स्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ बढ़ सकती हैं।

5️⃣ द्वादश भाव में मंगल

अनावश्यक खर्च, मानसिक तनाव, अस्पताल या कानूनी मामलों पर खर्च जैसी स्थितियाँ बन सकती हैं।

🌟 क्या हर मांगलिक व्यक्ति का विवाह असफल होता है?

बिल्कुल नहीं । यह सबसे बड़ी गलतफहमी है कि मांगलिक होने का अर्थ तलाक, दुःख या असफल विवाह है। ज्योतिष में केवल एक ग्रह देखकर निष्कर्ष नहीं निकाला जाता। संपूर्ण कुंडली, सप्तम भाव, सप्तमेश, शुक्र, गुरु, नवांश कुंडली तथा ग्रहों की दृष्टियों का भी अध्ययन आवश्यक होता है। कई मांगलिक जातकों का वैवाहिक जीवन अत्यंत सुखी और सफल देखा गया है।

✨ मांगलिक दोष कब कम या समाप्त हो जाता है ?

कई परिस्थितियों में मांगलिक दोष का प्रभाव स्वतः कम हो जाता है—

🔹 वर-वधू दोनों मांगलिक हों।
🔹 मंगल अपनी स्वराशि (मेष, वृश्चिक) या उच्च राशि (मकर) में हो।
🔹 मंगल पर गुरु की शुभ दृष्टि हो।
🔹 कुंडली में शुभ ग्रहों का बल अधिक हो।
🔹 विवाह उचित आयु में किया जाए।
🔹 नवांश एवं अन्य योग दोष को संतुलित कर रहे हों।
💎 मांगलिक दोष के सकारात्मक पक्ष

मंगल केवल संघर्ष नहीं देता, बल्कि—

✅ साहस देता है
✅ नेतृत्व क्षमता देता है
✅ निर्णय लेने की शक्ति देता है
✅ प्रशासनिक और तकनीकी क्षेत्रों में सफलता देता है
✅ व्यक्ति को मेहनती और कर्मशील बनाता है

यदि मंगल शुभ हो तो व्यक्ति जीवन में बड़ी उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकता है।

🕉️ मांगलिक दोष के लिए पारंपरिक उपाय

🔸 भगवान हनुमान जी की उपासना
🔸 मंगल मंत्र का जाप
🔸 मंगलवार का व्रत
🔸 सुंदरकाण्ड का पाठ
🔸 मंगल शांति पूजन
🔸 योग्य ज्योतिषी से परामर्श लेकर उचित उपाय

🌹 निष्कर्ष

मांगलिक दोष कोई अभिशाप नहीं है और न ही यह विवाह टूटने की गारंटी देता है। ज्योतिष का उद्देश्य भय पैदा करना नहीं, बल्कि जीवन की संभावित परिस्थितियों को समझकर सही दिशा देना है।

इसलिए केवल “मांगलिक” शब्द सुनकर घबराने की आवश्यकता नहीं है। विवाह का निर्णय हमेशा संपूर्ण कुंडली विश्लेषण, गुण मिलान, ग्रह योग और आपसी समझ को ध्यान में रखकर ही लेना चाहिए।

🌼 याद रखिए – ग्रह संकेत देते हैं, भाग्य का निर्माण आपके कर्म, संस्कार और समझदारी से होता है। 🌼

📿 ज्योतिषाचार्य आलोक रंजन उपाध्याय (स्वर्ण पदक प्राप्त)
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21/06/2026

🌺 कब होगी शादी आपकी शादी ? 🌺

विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों, दो संस्कारों और दो जीवन यात्राओं का पवित्र मिलन है। हर व्यक्ति के मन में कभी न कभी यह प्रश्न अवश्य उठता है कि मेरी शादी कब होगी? क्या विवाह समय पर होगा या देरी से? जीवनसाथी कैसा मिलेगा?

वैदिक ज्योतिष में विवाह का समय जानने के लिए केवल एक ग्रह या एक भाव नहीं देखा जाता, बल्कि कई महत्वपूर्ण योगों और ग्रह स्थितियों का गहन अध्ययन किया जाता है।

🔱 1. सप्तम भाव (7वां घर) – विवाह का मुख्य आधार जन्मकुंडली का 7वां भाव विवाह, जीवनसाथी और वैवाहिक सुख का प्रतिनिधित्व करता है।

✅ 7वें भाव में स्थित ग्रह
✅ 7वें भाव का स्वामी
✅ 7वें भाव पर पड़ने वाली दृष्टियाँ

इन तीनों का संयुक्त अध्ययन विवाह की आयु, जीवनसाथी के स्वभाव और वैवाहिक जीवन की गुणवत्ता को दर्शाता है।

💎 2. शुक्र ग्रह – विवाह का कारक

शुक्र को प्रेम, आकर्षण, सौंदर्य और वैवाहिक सुख का प्रमुख कारक माना गया है।

✔ मजबूत शुक्र शीघ्र विवाह और सुखी दांपत्य का संकेत देता है।
✔ नीच, अस्त या पाप ग्रहों से पीड़ित शुक्र विवाह में देरी या वैवाहिक चुनौतियाँ दे सकता है।

महिलाओं की कुंडली में गुरु पति का कारक माना जाता है, जबकि पुरुषों की कुंडली में शुक्र पत्नी सुख का प्रमुख कारक होता है।

⏳ 3. विवाह की संभावित आयु

ज्योतिषीय अनुभव के अनुसार—

🌸 बुध, चंद्र या शुक्र का प्रभाव – कम आयु में विवाह।
🌸 सूर्य या गुरु का प्रभाव – उचित समय पर विवाह।
🌸 शनि या मंगल का प्रभाव – विवाह में विलंब।
🌸 राहु-केतु का प्रभाव – अचानक, अंतरजातीय या असामान्य परिस्थितियों में विवाह।

ध्यान रखें कि यह केवल सामान्य संकेत हैं, अंतिम निर्णय संपूर्ण कुंडली के अध्ययन से ही संभव है।

📿 4. दशा का महत्व

कई बार अच्छे योग होने के बावजूद विवाह नहीं होता क्योंकि उचित ग्रह दशा नहीं चल रही होती।

जब 7वें भाव, उसके स्वामी, शुक्र या विवाह से संबंधित ग्रहों की महादशा-अंतरदशा चलती है, तब विवाह के प्रबल योग बनते हैं।

ज्योतिष में कहा जाता है—

"योग तभी फलित होते हैं जब समय साथ देता है।"

🌟 5. गोचर (Transit) से मिलता है सही समय

गोचर में गुरु और शनि की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

🔹 गुरु जब विवाह भाव या उसके स्वामी को प्रभावित करता है तो विवाह प्रस्ताव आने लगते हैं।
🔹 शनि स्थायित्व और जिम्मेदारी प्रदान करता है, इसलिए उसके अनुकूल प्रभाव में विवाह संपन्न हो सकता है।

🕉️ 6. नवांश कुंडली (D-9)

नवांश कुंडली को विवाह का दर्पण कहा गया है।

यदि जन्मकुंडली में विवाह के योग कमजोर हों लेकिन नवांश मजबूत हो तो विवाह अवश्य होता है और वैवाहिक जीवन बेहतर हो सकता है।

🔥 7. मंगल दोष का प्रभाव

1, 4, 7, 8 और 12वें भाव में मंगल होने पर मंगल दोष माना जाता है।

लेकिन केवल मंगल दोष देखकर डरने की आवश्यकता नहीं है। कई स्थितियों में इसका परिहार भी हो जाता है। अनुभवी ज्योतिषीय विश्लेषण के बाद ही सही निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए।

🌺 विवाह में देरी क्यों होती है?

निम्न स्थितियाँ विवाह में विलंब करा सकती हैं—

🔸 शनि का 7वें भाव से संबंध
🔸 7वें भाव के स्वामी का 6, 8 या 12वें भाव में होना
🔸 शुक्र का पीड़ित होना
🔸 राहु-केतु का प्रभाव
🔸 शनि-चंद्र योग

लेकिन देरी का अर्थ विवाह न होना नहीं है। कई बार देर से होने वाला विवाह अधिक स्थिर और सफल सिद्ध होता है।

✨ निष्कर्ष

विवाह का समय केवल उम्र से नहीं, बल्कि भाग्य, कर्म और ग्रहों के अनुकूल समय से निर्धारित होता है। इसलिए दूसरों से तुलना करने के बजाय अपने जीवन की यात्रा पर विश्वास रखें। जब सही समय आता है, तो ईश्वर उचित जीवनसाथी से मिलन अवश्य कराते हैं।

"हर रिश्ता अपने निर्धारित समय पर ही जीवन में प्रवेश करता है। धैर्य रखें, विश्वास रखें और सकारात्मक रहें।" 🙏

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19/06/2026

तिलक का महत्व, प्रकार, उपयोग और विशेषताएँ

सनातन धर्म में तिलक केवल माथे पर लगाया जाने वाला चिह्न नहीं है, बल्कि यह हमारी आस्था, आध्यात्मिक पहचान, साधना और संस्कारों का प्रतीक है। प्राचीन काल से ऋषि-मुनि, संत-महात्मा तथा गृहस्थ जन तिलक धारण करते आए हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि तिलक धारण करने से मन में पवित्रता, आत्मविश्वास और ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना जागृत होती है , माथे के मध्य भाग को आज्ञा चक्र का स्थान माना गया है। तिलक इसी स्थान पर लगाया जाता है, जिससे मानसिक एकाग्रता, सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक चेतना को बल मिलता है।

तिलक क्यों लगाया जाता है ?

🔸 ईश्वर के प्रति श्रद्धा और समर्पण व्यक्त करने के लिए।

🔸 मन और बुद्धि को एकाग्र करने के लिए।

🔸 धार्मिक पहचान एवं संप्रदाय का संकेत देने के लिए।

🔸 शुभ कार्यों में मंगल और सफलता की कामना हेतु।

🔸 नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा तथा सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने के लिए।

तिलक के प्रमुख प्रकार :

1. ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक (वैष्णव तिलक)

यह तिलक दो खड़ी रेखाओं के रूप में लगाया जाता है जो भगवान विष्णु के चरणों का प्रतीक माना जाता है।

विशेषता:

भगवान विष्णु, श्रीराम और श्रीकृष्ण के उपासक धारण करते हैं ।
सात्विकता, भक्ति और शांति का प्रतीक ।
मन में करुणा एवं धर्मपालन की भावना बढ़ाता है।

उपयोग:

विष्णु पूजा, एकादशी व्रत, धार्मिक अनुष्ठान एवं वैष्णव परंपरा में।

2. त्रिपुण्ड्र तिलक

भस्म या विभूति से बनाई गई तीन क्षैतिज रेखाओं वाला तिलक।

विशेषता:

भगवान शिव का प्रतीक।
अहंकार, अज्ञान और कर्म बंधनों के नाश का संदेश ।
वैराग्य और आत्मज्ञान की प्रेरणा देता है।

उपयोग:

शिव पूजा, रुद्राभिषेक, महाशिवरात्रि तथा शैव साधना में।

3. ऊर्ध्वपुण्ड्र-त्रिपुण्ड्र मिश्रित तिलक

यह वैष्णव और शैव परंपराओं का संयुक्त स्वरूप है।

विशेषता:

शिव और विष्णु की अभिन्नता का प्रतीक ।
समन्वय और एकता का संदेश।

उपयोग:

ऐसे साधकों द्वारा जो हरि और हर दोनों की उपासना करते हैं।

4. शैव तिलक

सामान्यतः भस्म या चंदन से लगाया जाता है।

विशेषता:

त्याग, तपस्या और आत्मसंयम का प्रतीक।
शिवत्व की भावना जागृत करता है।

उपयोग:

शिव भक्तों एवं संन्यासियों द्वारा।

5. वैष्णव तिलक

चंदन, गोपीचंदन अथवा मिट्टी से निर्मित।

विशेषता:

भक्ति, विनम्रता और धर्मनिष्ठा का प्रतीक।

भगवान विष्णु के चरणचिह्न का प्रतिनिधित्व।

उपयोग:

विष्णु, राम और कृष्ण भक्तों द्वारा।

6. शाक्त तिलक

आमतौर पर लाल कुमकुम या सिंदूर का गोल बिंदु।

विशेषता:

शक्ति, ऊर्जा और देवी उपासना का प्रतीक।

देवी दुर्गा, काली और लक्ष्मी की कृपा का संकेत।

उपयोग:

नवरात्रि, देवी पूजा और शक्ति साधना में।

7. रामानुज संप्रदाय तिलक

श्रीवैष्णव परंपरा में प्रचलित विशेष U आकार का तिलक।

विशेषता:

भगवान नारायण और माता लक्ष्मी की संयुक्त कृपा का प्रतीक।

शरणागति और भक्ति का संदेश।

उपयोग:

श्रीरामानुजाचार्य की परंपरा के अनुयायियों द्वारा।

8. माध्व संप्रदाय तिलक

मध्वाचार्य की द्वैत परंपरा में प्रचलित तिलक।

विशेषता:

विष्णु भक्ति एवं वेदांत सिद्धांत का प्रतीक।

ईश्वर और जीव के भेद का दार्शनिक संकेत।

उपयोग:

माध्व संप्रदाय के अनुयायियों द्वारा।

9. गौड़ीय वैष्णव तिलक

श्री चैतन्य महाप्रभु की परंपरा का तिलक।

विशेषता:

राधा-कृष्ण प्रेम और भक्ति का प्रतीक।

भक्ति योग का संदेश देता है।

उपयोग:

इस्कॉन तथा गौड़ीय वैष्णव परंपरा के साधकों द्वारा।

तिलक लगाने के लिए प्रयुक्त सामग्री :

✅ चंदन
✅ गोपी चंदन
✅ कुमकुम
✅ सिंदूर
✅ भस्म (विभूति)
✅ केसर
✅ अष्टगंध

हर सामग्री का अपना आध्यात्मिक और आयुर्वेदिक महत्व माना गया है।

तिलक का वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक पक्ष

माथे के बीच स्थित स्थान को योगशास्त्र में आज्ञा चक्र कहा गया है। यह मानसिक शक्ति, स्मरण शक्ति और निर्णय क्षमता से जुड़ा माना जाता है।

तिलक लगाने से :

🔹 मन को शांति मिलती है।
🔹 एकाग्रता बढ़ती है।
🔹 आध्यात्मिक चेतना जागृत होती है।
🔹 सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है।
🔹 धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान बनी रहती है।

निष्कर्ष

तिलक केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिक विरासत है। यह हमें अपने आराध्य, अपने संस्कारों और अपने धर्म से जोड़ता है। चाहे वह शिव का त्रिपुण्ड्र हो, विष्णु का ऊर्ध्वपुण्ड्र हो या देवी का कुमकुम बिंदु—हर तिलक अपने भीतर एक गहरा आध्यात्मिक संदेश समेटे हुए है।

माथे पर लगाया गया तिलक केवल शरीर को नहीं, बल्कि आत्मा को भी ईश्वर से जोड़ने का माध्यम है।

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