High Talks VG

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स्वतंत्र विचार आजाद ख्याल ॥

30/06/2026

श्रेयस अय्यर के हिसाब से वैभव सूर्यवंशी को इसलिए नहीं खेलाया क्यूंकि टी-20 वर्ल्ड कप में अच्छा खेलने वालों को कैसे बाहर बैठाते ? तो भाई पहले तो ख़ुद को बाहर बैठा दो क्यूँकि तुम तो उस टीम में थे भी नहीं। संजू एक मैच अच्छा खेलता है दस में फुस्स हो जाता है..अभिषेक शर्मा ने कौन सा पहाड़ ऊखाड दिया.. और सूर्या भाऊ का क्या वो वर्ल्डकप विनर कैप्टन था फिर भी उसे बाहर निकाल दिया.. वैभव के खेल देखकर इनकी फटी पड़ी है
सीधा बोलो कि सब हड़क गए हैं वैभव की पॉपुलैरिटी से..इसको पता है अगर सूर्यवंशी अगर पहले ही मैच में ऐसा कुछ कर गए, तो ऊपर के लोग तो विश्व विजेता टीम के खिलाड़ी है, खुद उनकी जगह टीम में नहीं बनेगी ? पूरी टीम में इकलौता प्लेयर ऐसा नहीं है जो लगातार फार्म में हो। एक मैच में पचासा मारकर 5-10 मैचों में फिर 0,5,12,16 रन बनाकर केवल गंभीर आगरकर को लुलूआते रहते हैं।

30/06/2026

भाजपा और कांग्रेस दोनो के रणनीतिकारों ने क्षेत्रीय पार्टियों को खत्म करने का बीड़ा उठाया है जिनकी दरसल कोई आइडियोलॉजी ही नही है बस समाजिक समीकरण साध कर राजनीति करती आयी है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति अगले कुछ वर्षों में एक बड़े पुनर्गठन की तरफ बढ़ सकती है। एक सम्भावना यह भी बन सकती है कि बसपा और कांग्रेस के बीच किसी स्तर पर समझौता या गठबंधन बने। कारण साफ है — मुख्य लड़ाई में जगह बनाना। राजनीति में जो दल तीसरे या चौथे स्थान पर चले जाते हैं, वे अक्सर नए समीकरण तलाशते हैं।
कांग्रेस बसपा के सहारे पुराने अपने दलित वोटरों को रिझाने का प्रयास करेगी और ब्राह्मण और मुस्लिम वोटरों को अपने पाले में लाने का हर सम्भव जतन करेगी।

स्ट्रेटजी यही है कि सत्ता परिवर्तन लोकतंत्र का मूल स्वभाव हैं। जब भी भाजपा के खिलाफ असन्तोष जनता में पनपे तो कांग्रेस मजबूत विकल्प बनकर उभरेगी।

भाजपा के मझोले वोटरों का बंटवारा जो शुरू से भाजपा और सोशलिस्ट पार्टियों में होता आया है, वो टंटा ही खत्म हो जाये। इससे एकमुश्त ओबीसी वोट भाजपा के पाले में जायेगा और मुस्लिम वोट जो क्षेत्रीय दलों में जाता है, वो पहले की तरह फिर लौटकर कांग्रेस के पास ही जायेगा।

फिर लड़ाई दलित-आदिवासी और सवर्ण वोटरों की होगी। जिसकी तरफ इनका झुकाव ज्यादे होगा, उनकी सरकार बनेगी।

जहाँ-जहाँ लड़ाई भाजपा और कांग्रेस के बीच होता है, वहाँ ऐसा ही होता आया है। जो लोग ये कहते हैं कि कांग्रेस वापसी नही कर पाती हैं तो 2009 लोकसभा चुनाव इसका उदाहरण है जब जयराम रमेश की स्ट्रेटजी से कांग्रेस ने 200 से ऊपर सीट पाई थी और जिनको ये लगता है कि भाजपा सोशल जस्टिस के पिच पर कमजोर हैं तो वो भाजपा का इतिहास उठाकर देख ले। हर हाल में फायदा भाजपा और कांग्रेस का होना है।

ये दोनों राष्ट्रीय पार्टी हैं। इनके पास एक आइडियोलॉजी हैं। अतीत में भी ऐसा हो चुका है। अतीत में जब जनसंघ कमजोर पड़ा था और सोशलिस्ट उभर रहे थे तो कांग्रेस ने जानबूझकर सारे राजनीतिक हमले जनसंघ पर कर उसको मजबूत किया था। यही कार्य भाजपा ने भी किया था। जब कांग्रेस उत्तर प्रदेश में शून्य सीट पाई थी और केंद्र में कमजोर हो गया था तो अटल बिहारी वाजपेयी ने सारे हमले कांग्रेस पर कर उसको मजबूत किया था।

उत्तर प्रदेश में भाजपा ने दो पार्टियों के बीच मुख्य लड़ाई हो इसलिए जानबूझकर सारे हमले समाजवादी पार्टी पर कर उसको मजबूत किया था। हॉ पर अब पिछले लोकसभा चुनाव के बाद स्ट्रेटजी चेंज किया गया है। अब राहुल गांधी समाजिक न्याय की पिच पर कमजोर पड़ते दिखेंगे। राम लहर के बाद छिटके ब्राह्मण वोटरों को एकमुश्त भाजपा के पाले में जाने का अड़चन डालेंगे । समाजवादी पार्टी कमजोर होते भरभराकर टूट जायेगा। अखिलेश यादव फिर अजित सिंह की तरह कभी इधर और कभी उधर करते दिखेंगे। अगली पीढ़ी तक जाते उनकी पार्टी भी जयंत चौधरी की तरह एक-दो जिलों में सिमटकर रह जायेगा।
संभावित तस्वीर कुछ इस प्रकार हो सकती है —
भाजपा: सवर्ण + गैर-यादव ओबीसी + लाभार्थी वर्ग
कांग्रेस: दलित + मुस्लिम + शहरी उदारवादी + ब्राह्मण वर्ग का एक हिस्सा
समाजवादी पार्टी: PDA मॉडल (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक)
बसपा: पारंपरिक दलित वोट बैंक की वापसी की चुनौती
फिलहाल उत्तर प्रदेश की राजनीति जाति से आगे बढ़कर लाभार्थी राजनीति, संगठन क्षमता, स्थानीय नेतृत्व और नैरेटिव की लड़ाई भी बन चुकी है। आने वाले वर्षों में सवाल केवल यह नहीं होगा कि किसके पास कितने वोट हैं, बल्कि यह होगा कि कौन उन वोटों को एक साथ बाँधकर सीटों में बदल पाता है।

30/06/2026

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