NationFirst
Our Agenda:
1. Against Caste Based Reservation
2. Review SC/ST Act
3. Demand Savarn Aayog
4. Environmental Awareness
5. Fight Against Corruption. etc
आज रात भारत देश के सभी लोग रात 8:30 बजे अपनी टी वी को बन्द रखें क्योंकि जातिवादी चुनावी महाराज, महिला आरक्षण के मुद्दे को चुनावी हथियार बनाने के लिए घडिय़ाली आंसू बहाने आयेंगे।
राम कृष्ण ,और ब्रह्म विष्णु को मानने वाला मेरा अनुयाई नहीं हो सकता!
ऐसा उल्लेख महामानव डॉ भीम राव आंबेडकर द्वारा ली गई 22 प्रतिज्ञाओं में से एक प्रतिज्ञा है जो नागपुर में एक शिलालेख पर अंकित हैं
भारत में किसी भी व्यक्ति को अपना धर्म मानने की पूरी स्वतंत्रता है ,किसी धर्म को अपना या छोड़ सकता है बाबा ने यह भी कहा था कि में हिंदू पैदा जरूर हुआ हूं हिंदू मरुंगा नहीं।
मगर दुविधा उन लोगों की है जो श्री राम के भक्त भी हैं बाबा साहब के भक्त बने हुए हैं
मतलब या तो वे श्री राम कृष्ण को नहीं मानते या फिर बाबा साहब का कहा नहीं मानते
हकीकत तो ये कि ये किसी को नहीं मानते ,मात्र राजनीति के लिए अपने कुछ आकाओं को खुश करने के लिए समय समय पर दोनों के भक्त बनते रहते हैं
बात बड़ी स्पष्ट है राजनीति में उसूल नहीं अवसर बाद चलता है
आज दलित तुष्टिकरण के लिए यह खेल दिखाई दे रहा है जो राजनीतिक पार्टियों के एजेंडे जैसा ही कुछ हैं राना ठाकुर
13/04/2026
अभी तक के मोदी शाह के रिकॉर्ड को देखते हुए लगता नहीं है सम्राट चौधरी को सीएम नहीं बनाया जायेगा क्यूंकि अभी तक मोदी शाह ने किसी भी नेता का कद एक सीमा तक ही बढ़ाया है और सम्राट चौधरी उस सीमा तक पहुंच गए हैं। मुख्यमंत्री बनने से सम्राट चौधरी का कद उस सीमा से ज्यादा बढ़ जायेगा जो मोदी शाह के रणनीति के विरुद्ध होगा।
राजीव प्रताप रूढ़ि, रवि शंकर प्रसाद, शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा, रमन सिंह, नरेंद्र सिंह तोमर जिसने भी उस सीमा को पार किया उसका कद छांट दिया गया। केवल योगी आदित्यनाथ और कुछ हद तक देवेंद्र फडणवीस इस सीमा को पार करके भी टिके हुए हैं।
बिहार में मोदी शाह चाहेंगे कि किसी बिल्कुल नए फेस को सामने लाया जाये जैसे भजन लाल शर्मा, मोहन यादव, रेखा गुप्ता को लाया गया।
अब यहाँ एक तर्क ये दिया जा सकता है कि उत्तर प्रदेश चुनाव में कोइरी वोट के लिए सम्राट चौधरी को सीएम बनाया जा सकता है। लेकिन इसका मतलब होगा केशव प्रसाद मौर्या की अपने ही प्रदेश के अपने जातीय समाज के वोटों पर पकड़ नहीं है । अगर ऐसा है तो फिर सम्राट चौधरी के सीएम बनने पर केशव प्रसाद मौर्या की अगली सरकार में छुट्टी तय है।
मैं बाहर प्रवास पर एक होटल में रुका था। सुबह दस बजे मैं नाश्ता करने गया। क्योंकि नाश्ता का समय साढ़े दस बजे तक ही होता है, इसलिए होटल वालों ने बताया कि जिसे जो कुछ लेना है, वो साढ़े दस बजे तक ले ले। इसके बाद बुफे बंद कर दिया जाएगा।
कोई भी आदमी नाश्ते में क्या और कितना खा सकता है? पर क्योंकि नाश्ताबंदी का फरमान आ चुका था इसलिए मैंने देखा कि लोग फटाफट अपनी कुर्सी से उठे और कोई पूरी प्लेट फल भर कर ला रहा है, कोई चार छोले भटुरे का ऑर्डर कर रहा है। कोई इडली, डोसा उठा लाया तो एक आदमी दो-तीन गिलास जूस के उठा लाया। कोई बहुत से टोस्ट प्लेट में भर लाया और साथ में शहद, मक्खन और सरसो की सॉस भी।
मैं चुपचाप अपनी जगह पर बैठ कर ये सब देखता रहा।
एक-दो मांएं अपने बच्चों के मुंह में खाना ठूंस रही थीं। कह रही थीं कि फटाफट खा लो, अब ये रेस्त्रां बंद हो जाएगा।
जो लोग होटल में ठहरते हैं, आमतौर पर उनके लिए नाश्ता मुफ्त होता है।
मतलब होटल के किराए में सुबह का नाश्ता शामिल होता है।
मैंने बहुत बार बहुत से लोगों को देखा है कि वो कोशिश करते हैं कि सुबह देर से नाश्ता करने पहुंचें और थोड़ा अधिक खा लें ताकि दोपहर के खाने का काम भी इसी से चल जाए।
कई लोग इसलिए भी अधिक खा लेते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि मुफ्त का है, तो अधिक ले लेने में कोई बुराई नहीं है।
कई लोग तो जानते हैं कि वो इतना नहीं खा सकते, लेकिन वो सिर्फ इसलिए जुटा लेते हैं कि कहीं कम न पड़ जाए। दरअसल हर व्यक्ति अपनी खुराक पहचानता है। वो जानता है कि वो इतना ही खा सकता है। पर वो लालच में फंस कर ज़रूरत से अधिक जुटा लेता है। मैं चुपचाप अपनी कुर्सी से सब देखता रहा।
साढ़े दस बज गए थे। रेस्त्रां बंद हो चुका था। लोग बैठे थे। टेबल पर खूब सारी चीजें उन्होंने जमा कर ली थीं। पर अब उनसे खाया नहीं जा रहा था। कोई भला दो-तीन गिलास जूस कैसे पी सकता है? बहुत सारे टोस्ट। कई बच्चे मां से झगड़ रहे थे कि उन्हें अब नहीं खाना। मांएं भी खा कर और खिला कर थक चुकी थीं। और अंत में एक-एक कर सभी लोग टेबल पर जमा नाश्ता छोड़ कर धीरे-धीरे बाहर निकलते चले गए। मतलब इतना सारा जूस, फल, ब्रेड सब बेकार हो गया।
"यही है ज़िंदगी"
हम सब अपनी भूख से अधिक जुटाने में लगे हैं। हम सभी जानते हैं कि हम इसका इस्तेमाल नही कर पाएंगे। हम जानते हैं कि हमारे बच्चे भी इसे नहीं भोग पाएंगे। पर हम अपनी-अपनी टेबल पर ज़रूरत से अधिक जुटाते हैं।
जब हम जुटाते हैं तो हम इतने अज्ञानी नहीं होते कि हम नहीं जानते कि हम इन्हें पूरी तरह नहीं खा पाएंगे। हम जानते हैं कि हम इन्हें छोड़ कर दबे पांव शर्माते हुए रेस्त्रां से बाहर निकल जाएंगे, सब कुछ टेबल पर छोड़ कर। उतना ही जमा कीजिए, जितने की आपको सचमुच ज़रुरत है।
ये दुनिया एक रेस्त्रां है। कोई इस रेस्त्रां में सदा के लिए नहीं बैठ सकता। कोई इस रेस्त्रां में लगातार नहीं खा सकता। सबके खाने की सीमा होती है। रेस्त्रां में सबके रहने की भी अवधि तय होती है।
उतना ही लीजिए, जिसमें आपको आनंद आए। उतना ही जुटाइए जितने से आपकी ज़रूरत पूरी हो सके। बाकी सब यहीं छूट जाता है। चाहे नाश्ता हो या कुछ और।
हम में से बहुत से लोग संसार रूपी रेस्त्रां से बहुत से लोगों को टेबल पर ढेर सारी चीज़ें छोड़ कर जाते हुए देखते हैं। पर फिर भी नहीं समझते कि हमें कितने की ज़रूरत है।
हम जानते हैं कि हम भी सब छोड़ जाएंगे, लेकिन जुटाने के चक्कर में, जो है, हम उसका स्वाद लेना भी छोड़ देते हैं।
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