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27/10/2025
#जयछठमैया 🙏
*JayChhathiMaiya* *जयछठमैया*
आयुरोग्य मैस्वैर्यं देहि देवः जगत्पते।। ॐ भास्कराय विद्महे महादुत्याधिकराय धीमहि तन्मो आदित्य प्रचोदयात्।। ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः।। जयवाहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्।।
रक्तांबुजासनमशेषगुणैकसिन्धुं
भानुं समस्तजगतामधिपं भजामि।
पद्मद्वयाभयवरान् दधतं कराब्जैः
माणिक्यमौलिमरुणाङ्गरुचिं त्रिनेत्रम्॥
2. एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते।
अनुकम्पय मां देवी गृहाणार्घ्यं दिवाकर।।
3. ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी,भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च ।
गुरुश्च शुक्रः शनिराहुकेतवः,कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ॥
4. आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर ।
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तुते ॥
5. ऊँ आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यण्च ।
हिरण्य़येन सविता रथेन देवो याति भुवनानि पश्यन ।।
6. ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥
7. ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ !!
8. करचरणकृतं वाक् कायजं कर्मजं श्रावण वाणंजं वा मानसंवापराधं ।
विहितं विहितं वा सर्व मेतत् क्षमस्व जय जय करुणाब्धे श्री महादेव शम्भो ॥
9. शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥
10.जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम ।
तमोsरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोsस्मि दिवाकरम ।।
प्रियंवद और मालिनी की कहानी
पुराणों के अनुसार, राजा प्रियंवद नामक राजा हुआ करते थे जिनकी कोई संतान नहीं थी। तब महर्षि कश्यप ने पुत्र प्राप्ति के लिए राजा के यहां यज्ञ का आयोजन किया। महर्षि ने यज्ञ आहुति के लिए बनाई गई गई खीर को प्रियंवद की पत्नी मालिनी को खाने के लिए कहा। खीर के प्रभाव से रजा और रानी को पुत्र तो हुआ किन्तु वह मृत था। प्रियंवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी समय भगवान की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं। उन्होंने राजा से कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं। माता ने राजा को अपने पूजन का आदेश दिया और दूसरों को भी यह पूजन करने के लिए प्रेरित करने को कहा। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें शीघ्र ही पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। जिस दिन राजा ने यह व्रत किया था उस दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि थी। तभी से छठी मैय्या के पूजे जाने की परंपरा आरंभ हुई।
महाभारत काल में कुंती पुत्र कर्ण को दानवीर माना जाता था। कर्ण सिर्फ माता कुंती के ही नहीं अपितु सूर्य देव के भी पुत्र थे। सूर्य देव की कर्ण पर विशेष कृपा थी। कर्ण नियमित रूप से प्रातः काल उठकर सूर्य देव को अर्घ्य दिया करते थे। तभी से एक पर्व के रूप में सूर्य अर्घ्य की परंपरा का आरंभ हुआ।
इसके अलावा, कुंती और द्रौपदी के भी व्रत रखने का उल्लेख ग्रंथों में मिलता है। ऐसा कहा जाता है कि द्रौपदी के छठ पूजा करने के बाद ही पांडवों को उनका हारा हुआ सारा राजपाट वापस मिल गया था।
श्री राम और माता सीता ने भी रखा था व्रत
रामायण में भी छठ पूजा का वर्णन मिलता है। दरअसल, भगवान राम सूर्यवंशी कुल के राजा थे और उनके आराध्य एवं कुलदेवता सूर्य देव ही थे। इसी कारण से राम राज्य की स्थापना से पूर्व भगवान राम ने माता सीता के साथ कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन छठ पर्व मनाते हुए भगवान सूर्य की पूजा विधि विधान से की थी।
महीपाल की कहानी
हिंदू मान्यता के अनुसार बिन्दुसर तीर्थ में एक महीपाल नाम का वैश्य रहता था, जिसका धर्म और देवी-देवता आदि पर जरा भी विश्वास नहीं था। कहते हैं कि हर समय धर्म का विरोध करने वाले वैश्य ने एक बार सूर्य देवता की मूर्ति के ऐसा घृणित कार्य किया सूर्य देवता ने उस अंधा हो जाने का श्राप दे दिया। आंखों की ज्योति खो देने के बाद उस वैश्य ने इतने दुख झेले कि उसने अंतत: अपना जीवन समाप्त करने की ठान लिया। मान्यता जब वह गंगा नदी में अपने प्राणों का अंत करने जा रहा तभी नारद मुनि ने उन्हें रोकते हुए बताया कि यह कष्ट तुम्हे सूर्य देवता का अपमान करने के कारण मिला है, इसलिए तुम उनकी उपासना करो। मान्यता है कि इसके बाद वैश्य द्वारा विधि-विधान से उनकी पूजा और व्रत रखने के बाद उसके आंखों की दृष्टि लौ आई और उसके सारे कष्ट दूर हो गये।
पांडव की कहानी
लोक आस्था के छठ पर्व को महाभारतकाल से भी जोड़कर देखा जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार जब पांडव जुएं में अपना सारा राजपाट हार कर वन में भटक रहे थे तब उन्हें तमाम तरह के कष्टों से मुक्ति पाने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने द्रौपदी को सूर्य साधना से जुड़ा छठ व्रत करने को कहा था। मान्यता है कि इस व्रत को विधि-विधान करने के बाद पांडवों को अपना खोया वैभव बाद में प्राप्त हुआ।
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