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14/04/2026
वो आखिरी गवाह, जिसने भगत सिंह को पनाह दी थी और उनकी आँखों में आज़ादी का जुनून देख था..
रात का तीसरा पहर था। पुरानी दिल्ली के पहाड़ी इमली इलाके की एक चौखट पर हल्की सी दस्तक हुई। दरवाज़ा खुला और सामने खड़ा था एक ऊँचा-पूरा नौजवान, जिसकी आँखों में आग थी और माथे पर देश को आज़ाद कराने का जुनून। वो नौजवान कोई और नहीं, **सरदार भगत सिंह** थे।
दरवाज़ा खोलने वाला शख्स था **नसीम बेग चंगेजी**।
उस रात नसीम साहब ने सिर्फ एक दोस्त को पनाह नहीं दी थी, बल्कि हिंदुस्तान के भविष्य को अपनी छत के नीचे छुपाया था। जब अंग्रेज सिपाही बाहर गश्त लगा रहे होते, तब नसीम साहब अपनी जान हथेली पर रखकर गलियों के अंधेरे में गायब हो जाते ताकि आज़ादी के मतवालों तक खाना और जरूरी खबरें पहुँचा सकें।
वक्त की सबसे बेरहम तस्वीर देखिए..
आज़ादी आई, सूरज उगा, और फिर धीरे-धीरे वो सारे चेहरे धुंधले पड़ गए जिन्होंने इस सूरज के लिए अपनी रातें काली की थीं। नसीम साहब ने दशकों तक उसी एक कमरे में गुज़ार दिए। उन्होंने देखा कि कैसे उनके साथी एक-एक कर विदा होते गए। वे उस दौर की आखिरी ज़िंदा कड़ी थे।
जब वे 100 साल के हुए, तो अक्सर चुपचाप खिड़की से बाहर देखते रहते। शायद उन गलियों में आज भी उन्हें भगत सिंह के कदमों की आहट सुनाई देती थी। उनकी रुला देने वाली विडंबना यह थी कि जिस शख्स ने इतिहास को बनते देखा, वो खुद इतिहास के पन्नों में एक कोने में सिमट कर रह गया।
2018 में जब नसीम साहब ने आखिरी सांस ली, तो सिर्फ एक इंसान नहीं मरा, बल्कि 'इंकलाब' का वो आखिरी चश्मदीद गवाह भी सो गया था जिसने आज़ादी की कीमत अपनी आँखों से चुकते हुए देखी थी।
आज हम आज़ाद हैं, लेकिन क्या हमें याद है कि उस पुरानी दिल्ली की एक छोटी सी कोठरी में एक ऐसा 'क्रांतिकारी' भी था, जिसने कभी अपनी बहादुरी का ढिंढोरा नहीं पीटा? जिसने कभी नहीं कहा कि "मैंने भी इस मुल्क के लिए खून पसीना एक किया है।"
उनकी खामोश विदाई हमें एक सवाल दे गई— **क्या हम वाकई उन गुमनाम नायकों द्वारा दी गई आजादी के लायक हैं?** 💔🇮🇳
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