Divya vats

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मेरी रचना..... अपने व्यक्तिगत अनुभव और आसपास से सीखते हुए लोगों को प्रेरित करना ही उद्देश्य है।

06/08/2025

"टूटना ज़रूरी नहीं..."

कितनी बार टूटा दिल,
कितनी बार छलका दर्द,
ये गिनती किसी ने नहीं की।

किसी ने नहीं देखा
वो चुपचाप बहते आंसू,
वो अधूरी रातें,
वो थक चुकी साँसे।

पर तुम रुके नहीं,
तुम गिरे भी सही,
मगर उठे भी खुद ही।

तो बस...
कितनी बार टूटकर रोए,
ये जरूरी नहीं है,
तुमने खुद को सम्भाला,
बस इतना ही काफी है...
#मेरी_कविता
#दिव्या_वत्स

07/11/2024

छठ महापर्व
नाम ही एक पहचान है, दुनिया पर्व मनाती है और हम महापर्व छठ मनाते हैं।
सूर्य सृष्टि का आधार है, ये वैज्ञानिक भी मानते हैं, तो इस लिहाज से ये पर्व पूरी तरह से वैज्ञानिक आधार पर आध्यात्मिक रुप से पुरातन काल से जुड़ा है ।
छठ पूजा का महत्व बहुत ज्यादा है। यह व्रत सूर्य भगवान, उषा, प्रकृति, जल, वायु आदि को समर्पित है। इस त्यौहार को मुख्यत: बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में मनाया जाता है। लेकिन बदलते वक्त के साथ ये पर्व अब दुनिया के अन्य हिस्सों में भी मनाया जाने लगा है।इस व्रत को करने से नि:संतान दंपत्तियों को संतान सुख प्राप्त होता है, ऐसी मान्यता है।
पौराणिक कथा के अनुसार, एक राजा था जिसका नाम प्रियंवद था। राजा की कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति के लिए राजा ने यज्ञ करवाया। यह यज्ञ महर्षि कश्यप ने संपन्न कराया और यज्ञ करने के बाद महर्षि ने प्रियंवद की पत्नी मालिनी को आहुति के लिए बनाई गई खीर प्रसाद के रुप में ग्रहण करने के लिए दी। यह खीर खाने से उन्हें पुत्र प्राप्ति हुई लेकिन उनका पुत्र मरा हुआ पैदा हुआ। यह देख राजा बेहद व्याकुल और दुखी हो गए। राजा प्रियंवद अपने मरे हुए पुत्र को लेकर शमशान गए और पुत्र वियोग में अपने प्राण त्यागने लगे।
इस समय ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं। देवसेना ने राजा से कहा कि वो उनकी पूजा करें। ये देवी सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं। यही कारण है कि ये छठी मईया कही जाती हैं। जैसा माता ने कहा था ठीक वैसे ही राजा ने पुत्र इच्छा की कामना से देवी षष्ठी का व्रत किया। यह व्रत करने से राजा प्रियंवद को पुत्र की प्राप्ति हुई। कहा जाता है कि छठ पूजा संतान प्राप्ति और संतान के सुखी जीवन के लिए किया जाता है। अन्य स्रोत कहते हैं, सूर्य देव को छठ और उनकी बहन का नाम छठी था, जिनके नाम से ही हम जय छठी मैया बोलते हैं।
हिंदू धर्म का एकमात्र पूजा जिसमें साक्षात सूर्य की उपासना की जाती है। यह प्रकृति की आराधना का त्योहार है।
4 दिन तक चलने वाला ये त्योहार दीवाली के ठीक 5 दिन बाद शुरू हो जाता है। पहला दिन नहाय खाय से आरंभ होता है, जिसका मतलब होता है कि उस दिन व्रती शुद्ध मन से , शुद्ध तन से, भक्ति मे लीन हो जाती है। शुद्धता का मतलब सात्विक भोजन से होता है, पुरी निष्ठा और नियम का पालन किया जाता है। भोजन में, लौकी की सब्जी, चना दाल और चावल/रोटी जरूर बनता है और वह भी शुद्ध देसी घी में। मैं इसकी खुशबू और इसका स्वाद का विश्लेषण नहीं कर सकती हूं क्यों कि मेरे पास शब्द कम हो जाएंगे। आज के दिन का स्वाद पुरे वर्ष में आपको दुबारा नहीं मिलेगा।

दूसरे दिन होता है खरना, जिसको बहुत जगह पर लोहंडा भी कहा जाता है। उस दिन व्रती पूरा दिन उपवास रखती हैं और शाम को भोजन मे शुद्ध रुप से बना हुआ खीर और रोटी खाती हैं। और उस एक समय के उपरांत व्रती जल भी ग्रहण नहीं करती हैं अगले 36 घंटों तक।
इसी लिए इस पर्व को महापर्व कहा जाता है। इस पर्व में शुद्धता का विशेष महत्व होता है।
फिर अगले दिन सुबह से ही, पकवान बनाए जाते हैं.... जो प्रसाद के रूप में भगवान को अर्पण किया जाता है। तरह तरह के पकवान के साथ हर तरह का फल जो प्रकृति के द्वारा प्राप्त हो, उसे भी भगवान को भोग लगाया जाता है। शाम के समय डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर प्रणाम किया जाता है।
व्रती जो व्रत करती हैं उन्हें नदी, या तालाब के पानी में खड़े होकर भगवान सूर्य को अर्घ्य देना होता है।
अगले दिन सुबह उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर, व्रत को पूर्ण किया जाता है।
तत्पश्चात, व्रती अपना व्रत खोलती है, और जल ग्रहण करती हैं।
बदलते परिवेश में छठ पर्व की धूम तो खूब बढ़ी है, लेकिन अब लोग इसे अपनी सहूलियत के हिसाब से भी करने लगे हैं। नियम और निष्टा भी अब अपनी सहूलियत से ही तय किया जाने लगा है।
पहले के समय में छठ का प्रसाद लकड़ी वाले चूल्हे पर बनाया जाता था, लेकिन अब बहुत लोग गैस चूल्हा पर भी बनाने लगे हैं। पहले के समय में गेहूं, चक्की ( जांतां) पर पीस कर आटा तैयार किया जाता था लेकिन अब मशीन वाली चक्की में पीस लिया जाता है।
जिस प्रकार से किसी भी प्रांत में एक निश्चित दूरी पर भाषा, खानपान और रहन सहन बदल जाते हैं, ठीक उसी प्रकार ये पर्व मनाने का तरीका भी, अलग अलग स्थानों पर अलग अलग वर्गों द्वारा अलग तरीके से मनाया जाता है। लेकिन सब मे एक बात पक्की होती है और वो है विश्वास । विश्वास इस परंपरा में, विश्वास अपनी भक्ति में, विश्वास ईश्वर से प्रार्थना करने और अपनी मन्नत मांगने में।
भले ही कोई व्यक्ति बहुत प्रतिभावान हो, लेकिन उनकी मां, उनकी पत्नी, या फिर उनकी बहन को उनकी प्रतिभा के साथ अपनी भक्ति में विश्वास होता है और इसके लिए वो छठ मे जरुर मन्नत मांगती है, और ईश्वर का वरदान कह लीजिए या उनकी महिमा.... उन सभी की मन्नत पूरी भी होती है। कहते हैं कि, भगवान भास्कर काया (body) के भगवान हैं, इसलिए किसी भी रोग से बचाव के लिए सूर्य की उपासना और आराधना जरूर करनी चाहिए।
छठ समाज के हर वर्ग के लोगों के बीच समन्वय और सहभागिता सुनिश्चित करता है। अमीर हो या गरीब हो ये पर्व सब के लिए उत्सव होता है।
लोक आस्था का प्रतीक छठ महापर्व की आप सबों को हार्दिक शुभकामनाएं।

Note... पाठकगण से विशेष आग्रह कृप्या 7th Nov के शाम ( सूर्यास्त) से पहले सूर्य देव को प्रणाम और 8th nov के सुबह (सूर्योदय) के समय भगवान सूर्य को अर्घ्य जरूर दें।
विश्वास करिए, साल भर तक आपमें ऊर्जा और विश्वास बना रहेगा।
धन्यवाद
दिव्या वत्स

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