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08/04/2019

शैवागम अनुसार रुद्र के अन्य ग्यारह रूप

शम्भू- भगवान शम्भू से ब्रह्मा, विष्णु, महेश, देव, दानव, राक्षस आदि उत्पन्न हुए शम्भू, शिवस ईश्वर और महेश्वर आदि कई नाम उन्हीं के हैं। भगवान रुद्र ही इस सृष्टि के सृजन, पालन और संहारकर्ता हैं।

पिनाकी- शैवागम में दूसरे रुद्र का नाम पिनाकी है। क्षमारूपी रथ पर विराजित, ब्रह्मा सूत्र से समन्वित, चारों वेदों को धारण करने वाले भगवान पिनाकी हैं। श्री ब्रह्मा जी नारद जी से कहते हैं- जब हमने एवं भगवान विष्णु ने शब्दमय शरीरधारी भगवान रुद्र को प्रणाम किया, तब हम लोगो को ऊंकार जनित मंत्र का साक्षात्कार हुआ। तत्पश्चत् ऊंतत्त्वमसि यह महावाक्य दृष्टिगोचर हुआ, चारों वेद पिनाकी रुद्र के ही स्वरूप हैं।

गिरीश- भगवान शिव के निवास का वर्णन तीन स्थानों पर मिलता है। प्रथम भद्रवट-स्थान जो कैलाश के पूर्व की ओर लौहित्यगिरि के ऊपर है। दूसरा स्थान कैलाश पर्वत पर और तीसरा मूंजवान पर्वत पर है। वैसे तो भगवान शंकर वैराग्य और संयम की प्रतिमूर्ति हैं, किंतु उनकी संपूर्ण लीलाएं कैलाश पर संपन्न होने के कारण कैलाश पर्वत उन्हें विशेष प्रिय है। कैलाश पर्वत नर भगवान रुद्र अपने तीसरे स्वरूप गिरिश के नाम से प्रसिद्ध हैं। कैलाश पर्वत पर भगवान रुद्र के निवास के दो कारण हैं। पहला कारण अपने भक्त तथा मित्र कुबेर को उनके अलकापुरी के सन्निकट रहने का दिया गया वरदान है और दूसरा कारण रुद्र की प्राणवल्लभा उमा का गिरिराज हिमवान के यहां अवतार है।

स्थाणु- शैवागम में भगवान रुद्र के चौथे स्वरूप को स्थाणु बताया गया है। अपने वामांग में पार्वती को सन्निविष्ट करके उन्हें सुख प्रदान करने वाले तथा संपूर्ण देवमंडल के प्राणम्य भगवान स्थाणु रुद्र हैं। वह समाधिमग्न, आत्माराम तथा पूर्ण निष्काम हैं।

भर्ग- पांचवें रुद्र भगवान भर्ग को भयविनाशक कहा गया है। चंद्रभूषण, जटाधारी, त्रिनेत्र, भस्मोज्ज्वल, भयनाशक भर्ग सदा हमारे हृदय में निवास करें। दुख पीडि़त संसार को शीघ्रातिशीघ्र दुख और भय से मुक्ति करने वाले केवल महादेव भगवान भर्ग रुद्र ही हैं।

सदाशिव- शैवागम में रुद्र के छठे स्वरूप को सदाशिव कहा गया है। जो ब्रह्मा होकर समस्त लोकों की सृष्टि करते हैं, विष्णु होकर सबका पालन करते हैं और अंत में रुद्र रूप से सबका संहार करते हैं, वह सदाशिव हैं। शिव पुराण के अनुसार सर्वप्रथम निराकार परब्रह्मा रुद्र ने अपनी लीला शक्ति से अपने लिए मूर्ति की कल्पना की। वह मूर्ति संपूर्ण ऐश्वर्य-गुणों से संपन्न, सबकी एकमात्र वंदनीया, शुभ-स्वरूपा, सर्वरूपा तथा संपूर्ण संस्कृतियों का केंद्र थी। उस मूर्ति की कल्पना करके वह अद्वितीय ब्रह्मï अंतर्हित हो गया, इस प्रकार जो मूर्तिरहित परब्रह्मा रुद्र हैं, उन्हीं का चिन्मय आकार सदाशिव है।

शिव- शैवागम में रुद्र के सातवें स्वरूप को शिव कहा गया है। गायत्री जिनका प्रतिपादन करती है, ओंकार ही जिनका भवन है, ऐसे समस्त कल्याण और गुणों के धाम शिव हैं। शिव शब्द नित्य विज्ञानानन्दघन परमात्मा का वाचक है। शिव शब्द की उत्पत्ति वश कान्तौ धातु से हुई है, जिसका तात्पर्य यह है कि जिसको सब चाहते हैं, उसका नाम शिव है।

हर- शैवागम के अनुसार भगवान रुद्र के आठवें स्वरूप का नाम हर है, जो भुजंग-भूषण धारण करते हैं, देवता जिनके चरणों में विनीत होते हैं। भगवान हर को सर्पभूषण कहा गया है। इसका अभिप्राय यह है कि मंगल और अमंगल सब कुछ ईश्वर-शरीर में है। समय पर सृष्टि का सृजन और समय पर उसका संहार दोनों भगवान रुद्र के कार्य हैं। सर्प से बढ़कर संहारकारक तमोगुणी कोई हो नहीं सकता क्योंकि अपने बच्चों को भी खा जाने की वृत्ति सर्प जाति में ही देखी जाती है। इसलिए भगवान हर अपने गले में सर्पों की माला धारण करते हैं। काल को अपने भूषण रूप में धारण करने के बाद भी भगवान हर कालातीत हैं।

शर्व- भगवान रुद्र के नौवें स्वरूप का नाम शर्व है। त्रिपुरहंता, यमराज के मद का भंजन करने वाले, खंगपाणि एवं तीक्ष्मंदष्ट शर्व हमारे लिए आनंददायक हैं। सर्वदेवमय रथ पर सवार होकर त्रिपुर का संहार करने के कारण भी इन्हें शर्व रुद्र कहा जाता है। शर्व का एक तात्पर्य सर्वव्यापी, सर्वात्मा और त्रिलोकी का अधिपति भी होता है।

कपाली- शैवागम के अनुसार दसवें रुद्र का नाम कपाली है। दक्ष-यज्ञ का विध्वंस करने वाले तथा क्रोधित मुख-कमल वाले शूलपाण कपाली हमें रात-दिन सुख प्रदान करें। पद्यपुराण (सृष्टिखंड-17) के अनुसार इसी रूप में भगवान रुद्र ने क्रोधित होकर दक्ष-यज्ञ को विध्वंस किया था।

भव- भगवान रुद्र के ग्यारहवें स्वरूप का नाम भव है। योगीन्द्र जिनके चरण-कमलों की वंदना करते हैं, जो द्वंद्वों से अतीत तथा भक्तों के आश्रय हैं और जिनसे वेदांत का प्रादुर्भाव हुआ है। इसी रूप में वह संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त हैं तथा जगतगुरु के रूप में वेदांत और योग का उपदेश देकर आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं। लिंगपुराण के सातवें अध्याय और शिवपुराण के पूर्व भाग के बाइसवें अध्याय में भगवान भव रुद्र के योगाचार्य स्वरूप और उनके शिष्य-प्रशिष्यों का विशेष वर्णन है। प्रत्येक युग में भगवान भव रुद्र योगाचार्य के रूप में अवतीर्ण होकर अपने शिष्यों (उनके नाम रुरु, दधीचि, अगस्त्य और उपमन्यु हैं) को योगमार्ग का उपदेश प्रदान करते हैं।

हर हर महादेव। 🔱💀🔱

07/04/2019

ॐ नमः शिवाय

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