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10. हमारा विनाश उस दिन शुरू हुआ था, जिस दिन लोगों ने घरों में एलुमिनियम के बर्तन व घर में फ्रिज लाया था।
*दधीचि ऋषि ने देश के हित में अपनी हड्डियों का दान कर दिया था !*
* उनकी हड्डियों से तीन धनुष बने- १. गांडीव, २. पिनाक और ३. सारंग !*
जिसमे से गांडीव अर्जुन को मिला था जिसके बल पर अर्जुन ने महाभारत का युद्ध जीता !
सारंग से भगवान राम ने युद्ध किया था और रावण के अत्याचारी राज्य को ध्वस्त किया था !
और, पिनाक भगवान शिव जी के पास था जिसे तपस्या के माध्यम से खुश रावण ने शिव जी से मांग लिया था ! परन्तु , वह उसका भार लम्बे समय तक नहीं उठा पाने के कारण बीच रास्ते में जनकपुरी में छोड़ आया था !
इसी पिनाक की नित्य सेवा सीताजी किया करती थी ! पिनाक का भंजन करके ही भगवान राम ने सीता जी का वरण किया था !
ब्रह्मर्षि दधिची की हड्डियों से ही "एकघ्नी नामक वज्र" भी बना था , जो भगवान इन्द्र को प्राप्त हुआ था !
इस एकघ्नी वज्र को इन्द्र ने कर्ण की तपस्या से खुश होकर उन्होंने कर्ण को दे दिया था! इसी एकघ्नी से महाभारत के युद्ध में भीम का महाप्रतापी पुत्र घतोत्कक्ष कर्ण के हाथों मारा गया था ! और भी कई अश्त्र-शस्त्रों का निर्माण हुआ था उनकी हड्डियों से !
लेकिन दधिची के इस अस्थि-दान का उद्देश्य क्या था...??
क्या उनका सन्देश यही था कि उनकी आने वाली पीढ़ी नपुंसकों और कायरों की भांति मुंह छुपा कर घर में बैठ जाए और शत्रु की खुशामद करे....?? नहीं..
कोई ऐसा काल नहीं है जब मनुष्य शस्त्रों से दूर रहा हो..
हिन्दुओं के धर्मग्रन्थ से ले कर ऋषि-मुनियों तक का एक दम स्पष्ट सन्देश और आह्वान रहा है कि....
''हे सनातनी वीरो.शस्त्र उठाओ और अन्याय तथा अत्याचार के विरुद्ध युद्ध करो !''
बस आज भी सबके लिए यही एक मात्र सन्देश है !
राष्ट्र और धर्म रक्षा के लिए अंततः बस एक ही मार्ग है !
सशक्त बनो..!
मित्रों,आपको भीष्म पितामह
के अंतिम समय में भगवान श्री कृष्ण के साथ हुए उनके संवाद
को सुनाते है आपको उपर कही बात सत्य प्रतीत होगी।
भीष्म: केशव क्या आपको नहीं लगता कि महाभारत का यह युद्ध अनैतिक हो गया,परंपराओं का निर्वहन नहीं हुआ।
अगर आप सत्य ही सुनना चाहते है,तो सुनिए पितामह ....!
कुछ बुरा नहीं हुआ , कुछ अनैतिक नहीं हुआ ....!
वही हुआ जो होना चाहिए ....!"
"यह तुम कह रहे हो केशव ....?
मर्यादा पुरुषोत्तम राम का अवतार कृष्ण कह रहा है ....? यह छल तो किसी युग में हमारे सनातन संस्कारों का अंग नहीं रहा, फिर यह उचित कैसे हो गया .....? "
*"इतिहास से शिक्षा ली जाती है पितामह , पर निर्णय वर्तमान की परिस्थितियों के आधार पर लेना पड़ता है ....!*
हर युग अपने तर्कों और अपनी आवश्यकता के आधार पर अपना नायक चुनता है ....!!
राम त्रेता युग के नायक थे , मेरे भाग में द्वापर आया था ....!
हम दोनों का निर्णय एक सा नहीं हो सकता पितामह ....!!"
" नहीं समझ पाया कृष्ण ! तनिक समझाओ तो ....!"
" राम और कृष्ण की परिस्थितियों में बहुत अंतर है पितामह ....!
राम के युग में खलनायक भी ' रावण ' जैसा शिवभक्त होता था ....!!
तब रावण जैसी नकारात्मक शक्ति के परिवार में भी विभीषण जैसे सन्त हुआ करते थे .....! तब बाली जैसे खलनायक के परिवार में भी तारा जैसी विदुषी स्त्रियाँ और अंगद जैसे सज्जन पुत्र होते थे ....! उस युग में खलनायक भी धर्म का ज्ञान रखता था ....!
इसलिए राम ने उनके साथ कहीं छल नहीं किया ....! किंतु मेरे युग के भाग में कंस , जरासन्ध , दुर्योधन , दुःशासन , शकुनी , जयद्रथ जैसे घोर पापी आये हैं ....! उनकी समाप्ति के लिए हर छल उचित है पितामह ....! पाप का अंत आवश्यक है पितामह , वह चाहे जिस विधि से हो ....!!"
"तो क्या तुम्हारे इन निर्णयों से गलत परम्पराएं नहीं प्रारम्भ होंगी केशव ....?
क्या भविष्य तुम्हारे इन छलों का अनुसरण नहीं करेगा ....?
और यदि करेगा तो क्या यह उचित होगा .....??"
*" भविष्य तो इससे भी अधिक नकारात्मक आ रहा है पितामह ....!*
*कलियुग में तो इतने से भी काम नहीं चलेगा ....!*
*वहाँ मनुष्य को कृष्ण से भी अधिक कठोर होना होगा .... नहीं तो धर्म समाप्त हो जाएगा ....!*
*जब क्रूर और अनैतिक शक्तियाँ सत्य एवं धर्म का समूल नाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता अर्थहीन हो जाती है पितामह* ....!
तब महत्वपूर्ण होती है विजय , केवल विजय ....!
*भविष्य को यह सीखना ही होगा पितामह* .....!!"
*"क्या धर्म का भी नाश हो सकता है केशव ....?*
*और यदि धर्म का नाश होना ही है , तो क्या मनुष्य इसे रोक सकता है .....?"*
*"सबकुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ कर बैठना मूर्खता होती है पितामह ....!*
*ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करता .....!*केवल मार्ग दर्शन करता है*
*सब मनुष्य को ही स्वयं करना पड़ता है ....!*
आप मुझे भी ईश्वर कहते हैं न ....!
तो बताइए न पितामह , मैंने स्वयं इस युद्घ में कुछ किया क्या .....?
सब पांडवों को ही करना पड़ा न ....?
यही प्रकृति का संविधान है ....!
युद्ध के प्रथम दिन यही तो कहा था मैंने अर्जुन से ....! यही परम सत्य है .....!"
भीष्म अब सन्तुष्ट लग रहे थे ....!
उनकी आँखें धीरे-धीरे बन्द होने लगीं थी ....!
उन्होंने कहा - चलो कृष्ण ! यह इस धरा पर अंतिम रात्रि है ....कल सम्भवतः चले जाना हो ... अपने इस अभागे भक्त पर कृपा करना कृष्ण ...."
*कृष्ण ने मन मे ही कुछ कहा और भीष्म को प्रणाम कर लौट चले , पर युद्धभूमि के उस डरावने अंधकार में भविष्य को जीवन का सबसे बड़ा सूत्र मिल चुका था* .... !
*जब अनैतिक और क्रूर शक्तियाँ सत्य और धर्म का विनाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता का पाठ आत्मघाती होता है ....।।*
Speak these five lines in the morning
*I am the best
*I can do it alone
*God is always with me
*Today is my day
*I am a winner
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