Mainpura devi asthan
मनोकामना पुर्ति सिद्धपीठ शिव और देवी मंदिर मैनपुरा पटना ८००००१
06/03/2024
श्री रामचरितमानस
भक्त तुलसीदास जी मंगलाचरण के अंतर्गत लिखते हैं -
भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यंति सिद्धा: स्वान्त:स्थमीश्वरम्।।
सरलार्थ - मैं श्रद्धा - विश्वास रूपी श्री भवानी और श्री शंकर जी की वंदना करता हूं , जिनके बिना सिद्ध लोग भी अपने अंतःकरण में स्थित ईश्वर को नहीं देख पाते हैं।
निहितार्थ -
मानव व्यक्तित्व के दो द्वार होते हैं - हृदय तथा मस्तिष्क । हृदय के द्वार से मनुष्य भावना के स्तर पर किसी से रिश्ते स्थापित करता है , जिससे हृदय में उसके प्रति श्रद्धा प्रस्फुटित होती है । मस्तिष्क के द्वार से बुद्धि किसी व्यक्ति ,वस्तु अथवा विचार में विश्वास उत्पन्न करती है । वह मनुष्य धन्य है , जिसका हृदय एवं मस्तिष्क दोनों ही समान रूप से विकसित हुआ है।
वृक्ष दो तरह से जीवन - तत्व ग्रहण करता है - पत्तियों एवं जड़ों द्वारा । जड़े पृथ्वी से रस खींचती हैं और पत्तियां सूक्ष्म आकाश से प्राण - शक्ति का अवगाहन करती हैं इन दोनों क्रियाओं के साथ - साथ चलते रहने के कारण ही वृक्ष फूल - फल पैदा करने में सक्षम होते हैं । इसी प्रकार मनुष्य का जीवन भी पल्लवित - पुष्पित होता रहे , इसके लिए श्रद्धा एवं विश्वास दोनों का सम्मिश्रण होना जरूरी है।
ऋग्वेद के श्रद्धा - सूक्त में उल्लेख है -
श्रद्धा प्रातर्हवामहे श्रद्धां मध्यंदिनं परि।
श्रद्धां सूर्यस्य निम्रुचि श्रद्धे श्रद्धापयेह न:।।
अर्थ - हम प्रातः , मध्यान्ह एवं सूर्यास्त सभी समय श्रद्धा देवी का आह्वान करते हैं । हे श्रद्धा देवी ! हम सभी में श्रद्धा का आधान करो ।
स्कंद पुराण में लिखा है -
श्रद्धया भजत: पुंस: शिलाऽपि फलदायिनी ।
अर्थ - मनुष्य श्रद्धा से शिला (पत्थर) की भी पूजा करे , तो वह फलदायक होता है।
जिस स्त्री को अन्य लोग सामान्य स्त्री समझते हैं , वही स्त्री श्रद्धा के कारण अपने संतान की मां के रूप में ईश्वर के समान वंद्य एवं पूज्य होती है।इस उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि जब ज्ञान श्रद्धा के सांचे में ढाला जाता है , तब उसमें कितना अंतर आ जाता है।
विश्वास के बल पर ही हम सभी अपना जीवन - यापन करते हैं । जब चिकित्सक रोगी को सुई लगाता है अथवा दवा लिखता है , तो रोगी को यह विश्वास रहता है कि सुई और दवा से मेरा रोग दूर हो जाएगा। जब हम किसी होटल में भोजन करने जाते हैं , तो यह विश्वास रहता है कि भोजन पवित्र एवं ताजा होगा । वह खाद्य - पदार्थ विषमय नहीं होगा। बिना विश्वास के हम जी ही नहीं सकते।
महाकवि एवं संत तुलसीदास जी में काव्य चातुर्य है । वे वंदना तो भवानी - शंकर की करते हैं , पर श्रद्धा एवं विश्वास का महत्व दर्शाते हैं। भवानी को उन्होंने 'श्रद्धा ' कहा ।
मार्कंडेय पुराण में उल्लेख है -
या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धा रूपेणसंस्थिता।
श्री शंकर को ' विश्वास ' कहा क्योंकि राम नाम में विश्वास होने के कारण ही कालकूट गरल (विष) पीकर भी शंकर जीवित ही नहीं रहे वरन् " नीलकंठ " शब्द से विभूषित किए गए ।शंकर जी तो साक्षात् विश्वास के मूर्ति हैं।
श्रद्धा - विश्वास युक्त सिद्ध अपने अंतःकरण में स्थित ईश्वर का अनुभव करते हैं ।
श्रद्धा व विश्वास के कारण ही पत्थर की काली मूर्ति श्री रामकृष्ण परमहंस के लिए साक्षात " जगत - जननी " बन गई । गुरु द्रोणाचार्य की मिट्टी की मूर्ति से श्रद्धा - विश्वास के कारण ही अर्जुन से भी एकलव्य श्रेष्ठ धनुर्धर बना । एक छोटा - सा श्रीकृष्ण का खिलौना मीराबाई के लिए श्रद्धा - विश्वास के कारण ही उसका " सर्वस्व " बन गया था।
जो अपने अंतः करण में ईश्वरत्व की उपलब्धि कर पाता है , उसी के लिए सारा जगत ईश्वरमय हो जाता है ।
तभी तो भक्त तुलसीदास जी " सियाराम मय सब जग जानी " की घोषणा कर सके थे ।
"करउं प्रणाम जोरि जुग पानी।"
।। श्री राम जय राम जय जय राम ।।
प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी...
संत रैदास
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