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30/08/2022

: जांच एजेंसियों के 'एक्शन' पर 'रिएक्शन' देने में असहज होने लगे सुशासन बाबू
राजद का मंसूबा : बिहार में सीबीआई की 'नो इंट्री'
महागठबंधन की गांठ : 'मजबूत' या 'मजबूर'
सिपहसलारों कोे आगे कर सरकार पर दबाव बना रहे तेजस्वी

PATNA : कुर्सी के खेल में नीतीश कुमार के 'सुशासन बाबू' की छवि पर ही बन आयी है. Good governance...Good governance..
Good governance. सरकार की पहली , दूसरी और तीसरी प्राथमिकता पूछे जाने पर नीतीश कुमार का यह जवाब तब का है जब पूर्ण बहुमत के साथ 2005 में मुख्यमंत्री बने थे. 2010 में फिर से मुख्यमंत्री बनने के बाद भी प्राथमिकता वही थी. पहले कार्यकाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ ताबड़तोड़ एक्शन और बिहार के विकास के लिए किये कार्यों ने देश भर में नीतीश की छवि 'सुशासन बाबू ' की गढ़ दी. राजनीतिक विश्लेषक भी यह मानते रहे हैं कि कुछ भी हो जाए, नीतीश अपनी इस छवि से समझौता नहीं कर सकते. Image-conscious राजनेता के रूप में नीतीश उभरते चले गये. दूसरे कार्यकाल ( तकनीकी तौर पर तीसरा) में जब नरेंद्र मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किया तब नीतीश ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और एनडीए से अलग हो गये. तब भी यह माना गया था कि यह 'सैद्धांतिक स्टैंड' है. तब जीतन राम मांझी को सीएम बनाने से लेकर लालू प्रसाद के करीब आने तक का जो राजनीतिक घटनाक्रम हुआ उसे इस नीतीश के स्टैंड का एक हिस्सा माना गया. 2015 में महागठबंधन के साथ चुनाव लड़कर जब नीतीश ने बीच में ही एनडीए से गठजोड़ कर लिया, तबसे इनकी छवि को पलटीमार के रूप में स्थापित किया जाने लगा. तेजस्वी और तेजप्रताप समेत पूरा राजद खेमा
नीतीश को पलटू राम कहकर संबोधित करता रहा. फिर भी सुशासन और भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टालरेंस वाली छवि बचाये रखने का नीतीश का दावा बहुत हद तक मान्य होता रहा.
हालिया घटनाक्रम में पलटे नीतीश कुमार की वो छवि भी दांव पर है. 2020 में एनडीए के साथ चुनाव लड़कर बीच में ही महागठबंधन की सरकार बना राजद खेमे द्वारा दिए गए पलटू राम के इमेज को तो नीतीश ने खुद ही स्थापित कर लिया है. इधर नौकरी के बदले जमीन घोटाले में लालू-तेजस्वी के करीबी भोला यादव की गिरफ्तारी के बाद से ही राजद खेमे में बौखलाहट है. रही सही कसर विश्वास मत वाले दिन ही राजद नेताओं के यहां जांच एजेंसियों की रेड ने पूरी कर दी. राजद खेमे से सीबीआई के बिहार में प्रवेश पर ही रोक लगाने की आवाज उठने लगी है. शिवानंद तिवारी और उदय नारायण चौधरी सरीखे राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी जब ऐसी मांग कर रहे हों तो इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता. माना जा रहा है कि लालू प्रसाद और तेजस्वी यादव के इशारे के बगैर ऐसा संभव नहीं है. दूसरी ओर जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन 'ललन' ने तो मुकदमों की सुनवाई पूरी हुए बिना ही आईआरसीटीसी और रेलवे में नौकरी घोटाले में क्लीन चिट भी दे दिया.
क्या कहा ललन सिंह ने सुनिये :
https://fb.watch/fdfOFNHHf_/
जदयू कार्यालय में महागठबंधन के संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में राजद सांसद मनोज झा के निशाने पर भी जांच एजेंसियां ही रहीं. महागठबंधन के दूसरे दल भी हां में हां ही मिलाते रहे. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब तक बड़े ही सधे अंदाज में अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं. विश्वास मत वाले दिन हुए रेड पर जब उनसे इस संबंध में पूछा गया था तब उन्होंने बस इतना कहा था - देखते न रहिए क्या-क्या होता है.
क्या कहा था नीतीश ने सुनिये :
https://fb.watch/fdfS4UmmxQ/
सीबीआई के बिहार में प्रवेश पर रोक से संबंधित शिवानंद के बयान पर नीतीश ने कोई तवज्जो नहीं दी.
क्या कहा नीतीश ने सुनिये :
https://fb.watch/fdfLnsk-He/
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो नीतीश के सामने जब असहज परिस्थितियां पैदा होती है तब उनके बयान और बॉडी लैंग्वेज ऐसे ही हो जाते हैं. ऐसे में राजनीतिक गलियारे में यह स्वाभाविक सवाल उठना शुरू हो गया है - महागठबंधन की गांठ 'मजबूत' है या 'मजबूर'?

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