Narendra R Chaturvedi
This is the official account of Narendra R Chaturvedi
होनहार बिटिया के लिए सहयोग की करुण पुकार
कभी-कभी जीवन ऐसी परीक्षा लेता है, जहाँ एक पल में सब कुछ बदल जाता है।
मुरैना शहर के एक जरूरतमंद अग्रवाल परिवार की होनहार बिटिया के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
एक दर्दनाक दुर्घटना ने उसके दोनों हाथों को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया।
वह बिटिया, जिसके सपनों में पढ़ाई, आत्मनिर्भरता और परिवार का सहारा बनने की उम्मीदें थीं—आज अस्पताल के बिस्तर पर बैठी केवल एक ही सवाल पूछ रही है:
“क्या मैं फिर से अपने हाथों से जीवन को छू पाऊँगी?”
चिकित्सकों के अनुसार आधुनिक चिकित्सा पद्धति से उसके हाथ लगाए जा सकते हैं।
इस उपचार पर 8 लाख रुपये से अधिक का खर्च है।
परिवार ने अपनी सामर्थ्य से बढ़कर प्रयास किए, रिश्तेदारों-परिचितों से सहयोग लिया, और अधिकतम व्यवस्था कर ली है।
अब केवल ₹1,25,000 की राशि की आवश्यकता शेष है।
परिवार की आर्थिक स्थिति अत्यंत कमजोर है।
यह राशि उनके लिए पहाड़ के समान है—
लेकिन हमारे लिए, यदि हम सब मिलकर थोड़ा-थोड़ा सहयोग करें, तो यह असंभव नहीं।
आज यह केवल एक बिटिया की मदद नहीं,
बल्कि उसके भविष्य, आत्मसम्मान और आत्मनिर्भर जीवन को बचाने का अवसर है।
आइए, हम सब मिलकर मानवता का परिचय दें।
आपका छोटा-सा योगदान भी किसी की ज़िंदगी में बड़ा उजाला ला सकता है।
तेरा तुझको अर्पण—
जो हमें मिला है, उसी में से किसी ज़रूरतमंद को लौटाना ही सच्ची सेवा है।
🙏 मानवता टीम मुरैना
आपसे करबद्ध निवेदन करती है—
इस बिटिया के हाथ नहीं, उसका भविष्य थामने में सहयोग करें।
17/01/2026
लहजा ज़रा ठंडा रखे जनाब
गरम तो हमे सिर्फ चाय पसंद है
11/04/2025
1956 मे ज़ब मध्यप्रदेश एक राज्य बना तो पंडित नेहरू ग्वालियर आये। सिंधिया रियासत के वैभव से इतने प्रभावित हुए कि महाराज जीवाजी राव सिंधिया को कांग्रेस मे शामिल होने का न्योता दे दिया।
महाराज हिंदूवादी थे और उनका झुकाव हिन्दू महासभा की ओर था, इसलिए उन्होंने नेहरूजी का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। दिल्ली से पत्र आते रहे और महारानी विजया राजे सिंधिया नेहरूजी को समझाने दिल्ली चली गयी।
दिल्ली मे लाल बहादुर शास्त्री ने महारानी सिंधिया को राजनीति मे आने के लिये मना लिया। महारानी 1957 और 1962 मे कांग्रेस के टिकट पर सांसद बनी। इसी बीच महाराज की मृत्यु हो गयी और उनके बेटे माधवराव सिंधिया महाराज बने।
तब से महारानी सिंधिया राजमाता सिंधिया हो गयी और ये पदवी उनकी पहचान बन गयी। 1963 मे मध्यप्रदेश मे कांग्रेस की सरकार बनी और द्वारका प्रसाद मिश्र मुख्यमंत्री बने।
मिश्र कई मौको पर राजवाड़ो का मजाक बना चुके थे और राजमाता से उनकी बन भी नहीं रही थी। 1967 मे मतभेद इतने बढ़ गए कि राजमाता ने कई विधायको को तोड़कर ग्वालियर बुला लिया।
1971 से पहले राजा अपनी सेना रखते थे, कांग्रेस अल्पमत मे आ चुकी थी लेकिन उसे गिराने के लिये बागी विधायको की ग्वालियर से ले जाकर भोपाल मे परेड करवानी थी।
ग्वालियर से ब्यावरा तक तो सेना विधायको के साथ आयी मगर ब्यावरा से भोपाल तक ग्वालियर की सेना और मध्यप्रदेश पुलिस मे घमासान युद्ध होता रहा और बागी विधायक आधी रात भोपाल के राजभवन पहुँच गए।
उन्हें राजभवन के उद्यान मे ही रात भर सोना पड़ा और सुबह कांग्रेस की सरकार गिर गयी। आजाद भारत मे पहली बार इतनी सशक्त महिला दुनिया ने देखी। इसके बाद राजमाता ने जनसंघ (बीजेपी) की सदस्यता ले ली।
ये पहला मौका था ज़ब जनसंघ ने सत्ता का स्वाद चखा और उसे राजवाडो का साथ मिलने लगा। यही से बीजेपी को अमीरो की पार्टी कहा जाने लगा और राजवंशियों के लिये ये एक शरणस्थली बन गयी।
ज़ब 1980 मे जनसंघ का नाम बदलकर बीजेपी किया गया तो राजमाता बीजेपी की पहली उपाध्यक्ष बनी। मुंबई मे बीजेपी का अधिवेशन होना था और उसी दिन राजमाता का वाजपेयी से विरोध सामने आ गया।
राजमाता बीजेपी मे गैर हिन्दुओ के आने से चिंतित थी, इसके अलावा वाजपेयी गांधीवादी समाज़वाद की बात कर रहे थे। राजमाता का कहना था कि इससे बीजेपी कांग्रेस का ही सस्ता वर्जन लगेगी।
राजमाता उन दिनों वाजपेयी के विरोधी की तरह नजर आने लगी हालांकि वाजपेयी को पढ़ाई के लिये स्कॉलरशीप सिंधिया परिवार ने दी थी इसलिए वाजपेयी हमेशा कृतज्ञ थे।
1982 के बाद राजमाता का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा, राम मंदिर आंदोलन उनका आखिरी पड़ाव था ज़ब बाबरी ढांचा तोड़ा गया तो वाजपेयी पार्टी के बचाव मे लगे थे मगर राजमाता ने खुलकर कहा कि अब उनका लक्ष्य पूरा हो गया और वे सुकून से मर सकती है।
2001 मे राजमाता का स्वर्गवास हो गया, उनके पौते ज्योतिरादित्य सिंधिया आज भी बीजेपी के बड़े नेता है।
10/05/2024
दांव पर सब कुछ लगा है,
रुक नहीं सकते..
टूट सकते है मगर,
हम झुक नही सकते..!
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