Sukant Ranjan
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14/02/2024
वसंत में पूरी प्रकृति नवीन हो जाती है। ठीक वैसे ही शिक्षा से ही जीवन को नया रास्ता दिखता है। बहुत ही गहन संबंध है वसंत और माँ शारदा की पूजा का। जैसे वसंत में पेड़ों में नए पत्ते लगते हैं, जो उनके जीवन का आधार बनता है। वैसे ही शिक्षा ही मानव जीवन का आधार है।
वसंत पंचमी की सबको शुभकामनाएं।
पढ़ते रहिये... ज्ञान बढ़ाते रहिये... जीवन में नयापन लाते रहिये... माता का आशीर्वाद पाते रहिये... 🙏
शीर्षक: आहुति…
कब मिट्टी कुंदन हुआ बताना,
दुःसह अनल में जो जला नहीं।
सौंदर्य कहाँ कब निखरा है,
जो तन धूप-ताप में गला नहीं।
उस हीरे की कीमत ही क्या
जो धरणी के तपिश में पला नहीं।
समाज उन्हें नायक न बनाता,
जो विपत्ति में आगे-आगे चला नहीं।
सम्मान उसी का होता है
जो वचन, धर्म से डिगा नहीं।
मान क्या हो उस दुर्बल का,
जो कथनी-करनी पर टिका नहीं।
उस शिक्षा का महत्व ही क्या
जिसमें जीवन जीने की कला नहीं।
उस ज्ञान को लेकर कोई क्या ही करे
जिससे हुआ किसीका भला नहीं।
मित्रों में उसका मोल ही क्या,
जो संकट में संग कभी चला नहीं।
उस प्रेमी का भी नाम नहीं
जो प्रेयसी के रंग में ढला नहीं।
उस दया, उदारता से क्या है करना
जिसमें धन, शक्ति या ज्ञान नहीं
वो शुभचिंतक किस गिनती का हो,
जिसकी कोई पहचान नहीं।
बाजार भी जीत वही आते हैं,
जो पुरुषार्थ से अपना मोल बढ़ाते हैं।
जो पत्थर घीसे न जाते हैं,
दो कौड़ी में बिक जाते हैं।
उनकी आँसुओ की क्या कीमत
जिनके आँखों में भयानक रोष नहीं।
वो क्रोध नहीं स्वीकार्य जगत को,
जिसमें अधम के उद्ध्वंस का उद्घोष नहीं।
मुक्ति भी उसे कहाँ मिलती है
जिसने दर्प के सर्प का मर्दन किया नहीं।
कौन हुआ अमृत के लायक
गरल को जिसने पिया नहीं।
एक चिंगारी में जैसे राख छुपा है
सूखे पर्णों में प्रखर आग छुपा है,
कुछ वैसा ही दावानल ये दुनिया है,
कण-कण में रण का दुर्बोध राग छुपा है।
चुनातियों से भिड़ जाने की
रखो इच्छाशक्ति उत्कट
दारुण दहन में दग्ध हुए बिन,
न चमक निकले तलवार विकट।
आहुति कर्मों की यहाँ सन्मार्ग समझना,
जो आहूत हो जाये उसे भगवान-सा अरचना।
सुलभ, सरल-प्राप्य को कभी विजय न कहना,
काल पर चोट कर ख़ुद को गहरा गढ़ना।
क्योंकि काल ही उसे त्यज देता है
जो काल से सीधे भिड़ा नहीं।
कालोचित जिसने कीमत न दी हो,
इस भव सागर में तिरा नहीं।
अब अंतिम बात...
धरा पे कभी वो जिया नहीं,
जिसने मृत्यु का सामना किया नहीं।
उनका क्या आना, उनका क्या जाना,
जिसने आहूत स्वयं को किया नहीं।
एक कविता सबके साथ साझा करता हूँ जो मेरे हृदय के काफी करीब है। आशा है आप सबको भी पसंद आएगी। कुछ जटिल शब्दों के अर्थ नीचे दे दिये गए है।
शीर्षक: जिस राह जाना ज़रूरी है...
रुकना नहीं, चलते जाना।
जिस राह जाना जरूरी है,
उस राह पर कदम-ब-कदम पग बढ़ते जाना।
जो घोर निराशा हो,
मन टूट रहा हो,
तो, मन में उसका प्रकाश भरना,
और बिन मन भटकाये चलते जाना।
जो जफ़ा हजारों आयें,
हृदय बिलख जाये,
तो, हृदय में उसका प्रेम भरना
तुम बिना हृदय विदराये चलते जाना।
जो सघन अँधेरा हो,
आँखें निस्तेज हो रही हो,
तो, आँखों में उसकी सूरत भरना,
तुम यूँ पलक सिलाये चलते जाना।
जो लाख ठोकरें खायें,
पग बढ़ते हुए भी बढ़ न पाये,
तूफान में उसकी तुम भी हवा हो जाना,
तुम पग उड़ाये चलते जाना।
जो सौ दर्द हिस्से आये,
बदन टूट जाये,
बदन में उसकी अग्नि भरना,
और बे-शरीर उस क्षण भी चलते जाना।
बस रुकना नहीं, चलते जाना।
जिस राह जीवन अंकुरी है,
उस राह चलते जाना।
जिस राह प्रेम सुरूरी है,
उस राह चलते जाना।
जिस राह सौंदर्य नूरी है,
उस राह चलते जाना।
जिस राह दीवानगी फितूरी है,
उस राह चलते जाना।
जिस राह कुदरत दस्तूरी है,
उस राह चलते जाना।
जिस राह धर्म की धुरी है,
उस राह चलते जाना।
जिस राह कान्हा की मंजूरी है,
उस राह चलते जाना।
जिस राह सच्चाई पूरी की पूरी है,
उस राह चलते जाना।
जिस राह जाना जरुरी है,
उस राह पर कदम-ब-कदम पग बढ़ते जाना।
चलते जाना... चलते जाना...
शब्दार्थ:
जफ़ा - जुल्म, सितम, अत्याचार। फितूर - जुनून, पागलपन।
15/08/2023
स्वतंत्रता का भाव भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से ही सबसे अधिक महत्व की रही है। इसके ही उच्चतम स्थिति को मोक्ष कहा जाता है जब व्यक्ति अपने अंदर के सभी बुराइयों से मुक्त होकर अपनी उच्चतम संभावना को प्राप्त करता है।
लेकिन, ऐसा राष्ट्र भी जो स्वतंत्रता को इतनी गहराई से समझता है, परतंत्रता के घोर दंश को झेल चुका है। इसका कारण है कि स्वतंत्रता की अपनी कीमत होती है। एक मजबूत समाज ही इसकी कीमत चुका सकता है। अतः परतंत्रता का सबसे बड़ा कारण समाज का कमजोर होना है। व्यक्ति मजबूत हो, समाज मजबूत हो, राष्ट्र मजबूत हो... यही आज का चिंतन है।
स्वतंत्रता दिवस की सबको शुभकामनाएं... 🙏
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