The Root Store

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मानव जीवन को सरल एवं प्रभावी बनाने के ?

03/04/2026

प्रकृति ने दिया है असली, शुद्ध और सुरक्षित सिंदूर!
इसे सिंदूर का पौधा / कुमकुम ट्री कहते हैं।
इसका वैज्ञानिक नाम है Bixa orellana.
इसके लाल फल के अंदर मौजूद छोटे-छोटे बीजों से मिलता है —
✔️ 100% नेचुरल सिंदूर
✔️ नेचुरल लिपस्टिक
✔️ Ayurvedic रंग (Bixin)
🌱 कैसे लगाएँ सिंदूर का पौधा?
1️⃣ बीज से रोपण
✔️ पके फलों से बीज निकालें
✔️ भुरभुरी, नमीदार मिट्टी में 1 इंच गहराई पर बो दें
✔️ 10–20 दिन में अंकुर निकल आते हैं
2️⃣ कलम (Cutting) से
✔️ 6–8 इंच की स्वस्थ डंडी काटें
✔️ नीचे की पत्तियाँ हटाकर मिट्टी में लगा दें
✔️ 25–30 दिन में नई पत्तियाँ आने लगती हैं
📌 करीब 1 साल में पौधा लाल फलों से भर जाता है
और इससे प्राप्त बीज पीसकर शुद्ध सिंदूर बनाया जाता है।
👉 एक पौधा लगभग 1.5 किलो तक प्राकृतिक सिंदूर दे सकता है!

27/03/2026

Sinus Relief Ayurveda - पुराना नजला, साइनस और बार-बार छींक — समझिए असली वजह और आयुर्वेदिक समाधान - अगर आपको सुबह उठते ही लगातार छींक आती है, नाक हमेशा भरी रहती है,

सिर भारी लगता है या साइनस के कारण सिरदर्द रहता है — तो ये सिर्फ साधारण सर्दी नहीं है। ये एक क्रोनिक (पुरानी) समस्या बन चुकी होती है, जो धीरे-धीरे आपकी डेली लाइफ को भी डिस्टर्ब करने लगती है।

कई लोग दवाइयाँ, नेज़ल स्प्रे और टेबलेट्स बार-बार इस्तेमाल करते हैं, लेकिन राहत सिर्फ कुछ समय के लिए मिलती है। क्योंकि असली समस्या बाहर नहीं, अंदर के imbalance में होती है।

क्यों होता है बार-बार नजला और साइनस?
ये समस्या आमतौर पर तीन कारणों के कॉम्बिनेशन से बनती है:

1. शरीर में ज्यादा म्यूकस (बलगम) बनना
जब शरीर में कफ बढ़ता है, तो चिपचिपा म्यूकस जमा होने लगता है।

2. रेस्पिरेटरी सिस्टम की कमजोर इम्युनिटी
बार-बार इंफेक्शन होने लगते हैं और शरीर जल्दी रिकवर नहीं कर पाता।

3. साइनस में सूजन (Inflammation)
साइनस पैसेज में सूजन आ जाती है, जिससे ब्लॉकेज और प्रेशर बढ़ता है।

आयुर्वेद क्या कहता है इस बारे में?
आयुर्वेद के अनुसार, ये समस्या मुख्य रूप से कफ दोष के imbalance से जुड़ी होती है।

जब आप ये चीजें ज्यादा लेने लगते हैं:

ठंडी चीजें (कोल्ड ड्रिंक्स, आइसक्रीम)
रात में दही
ज्यादा तला-भुना खाना

तो शरीर में कफ बढ़ता है और धीरे-धीरे:

म्यूकस जमा होता है
नाक बंद रहती है
साइनस में प्रेशर बनने लगता है

यही आगे चलकर इंफेक्शन और क्रोनिक साइनस का कारण बनता है।

समाधान क्या है?
अगर शुरुआत में ही ऐसे उपाय अपनाए जाएं जो:

शरीर को हल्की गर्मी दें
म्यूकस को पतला करें
सर्कुलेशन बढ़ाएं

तो शरीर खुद ही इस समस्या से बाहर आने लगता है।

पावरफुल आयुर्वेदिक काढ़ा — 6 असरदार चीजों का कॉम्बिनेशन
इस नुस्खे में 6 ऐसी जड़ी-बूटियां हैं जो मिलकर जड़ से काम करती हैं:

1. सोंठ (Dry Ginger)
नेचुरल एंटी-इंफ्लेमेटरी
म्यूकस को पतला करती है और सूजन कम करती है

2. लौंग (Clove)
एंटी-बैक्टीरियल
सांस की नली को साफ और खुला महसूस कराती है

3. सूखा धनिया (Coriander Seeds)
डिटॉक्सिफायर
शरीर की गर्मी को बैलेंस करता है और टॉक्सिन्स बाहर निकालने में मदद करता है

4. दालचीनी (Cinnamon)
ब्लड सर्कुलेशन बढ़ाती है
साइनस एरिया में हीलिंग को तेज करती है

5. तुलसी के पत्ते
इम्युनिटी बूस्टर
वायरल और एलर्जी ट्रिगर्स से बचाव

6. नागकेसर
रेस्पिरेटरी सिस्टम के लिए खास
साइनस की सूजन और नाक की कंजेशन कम करता है

काढ़ा बनाने का सही तरीका
1 कप पानी लें

आधा चम्मच सोंठ
2 लौंग
आधा चम्मच कुचला हुआ धनिया
1 छोटा टुकड़ा दालचीनी
4–5 तुलसी के पत्ते
1 चुटकी नागकेसर

इन सबको धीमी आंच पर उबालें जब तक पानी आधा न रह जाए।
फिर छानकर धीरे-धीरे पीएं।

कब और कितने दिन लेना है?
सुबह खाली पेट या रात को सोने से पहले
कम से कम 10–14 दिन
पुराने केस में 3 हफ्ते (बीच में 1 हफ्ते का गैप)

कैसे काम करता है ये काढ़ा?
यह कोई इंस्टेंट स्प्रे जैसा काम नहीं करता।
बल्कि धीरे-धीरे:

म्यूकस बनना कम करता है
जमा बलगम को पतला करता है
साइनस की सूजन कम करता है
इम्युनिटी मजबूत करता है

और सबसे जरूरी — बार-बार होने वाली समस्या की जड़ पर काम करता है

रिजल्ट जल्दी पाने के लिए जरूरी टिप्स

रात में ठंडी चीजें बिल्कुल कम करें
AC की सीधी हवा से बचें
हफ्ते में 2–3 बार भाप जरूर लें
डेयरी लेने पर अगर बलगम बढ़े तो मात्रा कम करें
रोज 2.5–3 लीटर गुनगुना पानी पिएं

ये छोटी आदतें काढ़े के असर को कई गुना बढ़ा देती हैं।

किन लोगों को सावधानी रखनी चाहिए

प्रेग्नेंट महिलाएं
जिनको अल्सर की समस्या है
हाई फीवर या तेजी से वजन घट रहा हो

ऐसे मामलों में पहले डॉक्टर की सलाह जरूरी है।

एक जरूरी बात जो लोग समझ नहीं पाते
क्रोनिक नजला, साइनस या बार-बार जुकाम — ये एक दिन में नहीं बनते।
तो इनका इलाज भी धीरे-धीरे ही होता है।

अगर आप:

अपनी डाइट सुधारते हैं
ये काढ़ा नियमित लेते हैं
और लाइफस्टाइल ठीक रखते हैं

तो धीरे-धीरे शरीर खुद ठीक होने लगता है।

आपको ज्यादा परेशानी किससे होती है — छींक, नाक बंद या सिरदर्द?

24/03/2026

"शुद्ध शाकाहारी खानपान से स्वस्थ जीवन"...

लसोड़ा या गूंदा या लिसोड़ा की सब्जी या अचार खाया होगा लेकिन यह भी जान लें कि यह वनस्पति कफ जनित रोगों के लिए महाऔषधि है.

अब तो वैज्ञानिकों ने भी सिद्ध किया है कि मारवाड़ी गूंदे या लसोड़े हमारे शरीर के लिए एंटीऑक्सीडेंट यानी विषैले तत्वों को बाहर निकालने के लिए महत्वपूर्ण है और इससे हमारी त्वचा भी जवां रहती है.

लिसोड़ा का वृक्ष सारे भारत में पाया जाता है. यह दो प्रकार का होता है, छोटा और बड़ा लिसोडा. गुण धर्मं दोनों के एक समान है.

भाषा भेद की दृष्टि से यह भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है हिंदी और मारवाड़ी में लिसोड़ा, मराठी और गुजराती में इसे बरगुन्द, बंगाली में बहंवार, तेलगु में चित्रनक्केरू, तमिल में नारिविली, पंजाबी में लसूडा, फारसी में सपिस्तां व अंग्रेजी में इसे सेबेस्टन नाम से जाना जाता है.

वसंत ऋतू में इसमे फूल आते है और ग्रीष्म ऋतू के अंत में फल पक जाते है. यह मधुर-कसैला, शीतल, विषनाशक, कृमि नाशक, पाचक, मूत्रल, जठराग्नि प्रदीपक, अतिसार व सब प्रकार दर्द दूर करने वाला, कफ निकालने वाला होता है. सूखी खांसी ठीक करने के लिए यह बहुत ही उपयोगी होता है.

जुकाम खांसी ठीक करने के लिए इसकी छाल का काढ़ा उपयोगी होता है. इसके फल का काढ़ा बना कर पीने से छाती में जमा हुआ सुखा कफ पिघलकर खांसी के साथ बाहर निकल जाता है इसलिए इसे श्लेष्मान्तक (संस्कृत में) भी कहा जाता है. इसके कोमल पत्ते पीस कर खाने से पतले दस्त (अतिसार) लगना बंद होकर पाचन तंत्र में सुधार हो आता है.

उपरोक्त गुणों के साथ साथ इसकी छाल को पानी में घिस कर पीस कर लेप करने से खुजली नष्ट होती है. इसके फल के लुआव में एक चुटकी मिश्री मिलाकर एक कप पानी में घोल कर पीने से पेशाब की जलन आदि मूत्र रोग ठीक होते है.

बहुवार या लसोड़ा (Cordia myxa) एक वृक्ष है जो भारतीय उपमहाद्वीप, चीन एवं विश्व के अनेक भागों में पाया जाता है। इसे हिन्दी में 'गोंदी' और 'निसोरा' भी कहते हैं। संस्कृत में 'श्लेषमातक' कहते हैं। इसके फल सुपारी के बराबर होते हैं। कच्चा लसोड़ा का साग और आचार भी बनाया जाता है। पके हुए लसोड़े मीठे होते हैं तथा इसके अन्दर गोंद की तरह चिकना और मीठा रस होता है, जो शरीर को मोटा बनाता है।

लसोड़े के पेड़ बहुत बड़े होते हैं इसके पत्ते चिकने होते हैं। दक्षिण, गुजरात और राजपूताना में लोग पान की जगह लसोड़े का उपयोग कर लेते हैं। लसोड़ा में पान की तरह ही स्वाद होता है। इसके पेड़ की तीन से चार जातियां होती है पर मुख्य दो हैं जिन्हें लमेड़ा और लसोड़ा कहते हैं। छोटे और बड़े लसोडे़ के नाम से भी यह काफी प्रसिद्ध है। लसोड़ा की लकड़ी बड़ी चिकनी और मजबूत होती है। इमारती काम के लिए इसके तख्ते बनाये जाते हैं और बन्दूक के कुन्दे में भी इसका प्रयोग होता है। इसके साथ ही अन्य कई उपयोगी वस्तुएं बनायी जाती हैं।

लसोड़ा के आयुर्वेदिक गुण :
1) यह मधुर, कसैला, शीतल, ग्राही, कृमि नाशक, विषनाशक, केशों के लिए हितकारी, अग्निवर्द्धक, पाचक, मूत्रल, स्निग्धकारी, कफ निकालने वाला, अतिसार व जलन दूर करने वाला तथा शूल और सब प्रकार के विष को नष्ट करने वाला तथा शीतवीर्य होता है
2) इसका काढ़ा कफ और पतले दस्त को दूर करने में गुणकारी होता है ।
3) लसोड़ा पेट और सीने को नर्म करता है और गले की खरखराहट व सूजन में लाभदायक है।
4) लसोड़ा पित्त के दोषों को दस्तों के रास्ते बाहर निकाल देता है और बलगम व खून के दोषों को भी दूर करता है।
5) लसोड़ा पित्त और खून की तेजी को मिटाता है और प्यास को रोकता है।
6) लसोड़ा पेशाब की जलन, बुखार, दमा और सूखी खांसी तथा छाती के दर्द को दूर करता है। इसकी कोपलों को खाने से पेशाब की जलन और सूजाक रोग मिट जाता है।
7) लसोड़ा के कच्चे फल शीतल, कषैला, पाचक और मधुर होता है। इसके उपयोग से पेट के कीड़े, दर्द, कफ, चेचक, फोड़ा, विसर्प (छोटी-छोटी फुंसियों का दल) और सभी प्रकार के विष नष्ट हो जाते हैं। इसके फल शीतल, मधुर, और हल्के होते हैं।

इसके पके फल मधुर, शीतल और पुष्टिकारक हैं, यह रूखे, भारी और वात को खत्म करने वाले होते हैं।

लसोड़ा के फायदे व उपचार:
1) बार-बार आने वाले ज्वर में लसोड़ा के फायदे : लसोड़ा की छाल का काढ़ा बनाकर 20 से लेकर 40 मिलीलीटर को सुबह और शाम सेवन करने से लाभ होता है।
२) प्रदर रोग के उपचार में लसोड़ा के फायदे : लसोड़ा के कोमल पत्तों को पीसकर रस निकालकर पीने से प्रदर रोग और प्रमेह दोनों मिट जाते हैं।
3) दाद के उपचार में लसोड़ा के फायदे : लसोड़ा के बीजों की मज्जा को पीसकर दाद पर लगाने से दाद मिट जाता है।
4) फोड़े-फुंसियां के उपचार में लसोड़ा के फायदे : लसोड़े के पत्तों की पोटली बनाकर फुंसियों पर बांधने से फुंसिया जल्दी ही ठीक हो जाती हैं।
5) गले के रोग उपचार में लसोड़ा के फायदे : लिसोड़े की छाल के काढ़े से कुल्ला करने से गले के सारे रोग ठीक हो जाते हैं।
6) अतिसार के उपचार में लसोड़ा के फायदे : लसोड़े की छाल को पानी में घिसकर पिलाने से अतिसार ठीक होता है।
7) हैजा (कालरा) के उपचार में लसोड़ा के फायदे : लसोडे़ की छाल को चने की छाल में पीसकर हैजा के रोगी को पिलाने से हैजा रोग में लाभ होता है।
8)दांतों का दर्द दूर करने में लसोड़ा के फायदे : लसोड़े की छाल का काढ़ा बनाकर उस काढ़े से कुल्ला करने से दांतों का दर्द दूर होता है।
9) बल शक्तिवर्द्धक में लसोड़ा के फायदे : लसोड़े के फलों को सुखाकर उनका चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को चीनी की चाशनी में मिलाकर लड्डू बना लें। इसको खाने से शरीर मोटा होता है और कमर मजबूत जाती है।
10) शोथ (सूजन) दूर करने में में लसोड़ा के फायदे : लसौड़े की छाल को पीसकर उसका लेप आंखों पर लगाने से आंखों के शीतला के दर्द में आराम मिलता है।
सबर श्रीमूथा जी की वॉल से
#दुर्लभपौधा

#वनओषध

22/03/2026

चावल से डरना शुरू हो गया है , क्यों?- आजकल बहुत से लोग चावल का नाम सुनते ही डरने लगते हैं। कई लोग मानते हैं कि चावल खाने से वजन बढ़ता है, डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है या फिर पेट में गैस और भारीपन होने लगता है।

इसी वजह से कई लोगों ने अपनी थाली से चावल को पूरी तरह हटाना शुरू कर दिया है।

लेकिन अगर हम आयुर्वेद की बात करें तो वहां चावल को बहुत ही उत्तम और पवित्र भोजन माना गया है। आयुर्वेद के अनुसार चावल ऐसा आहार है जो शरीर को तुरंत ऊर्जा देता है, पचने में हल्का होता है और मन को भी शांत रखने में मदद करता है।

अब सवाल यह है कि अगर चावल इतना अच्छा है तो आज के समय में इसे कई समस्याओं की वजह क्यों माना जा रहा है। इसका कारण चावल नहीं बल्कि चावल पकाने और खाने का हमारा तरीका है।

समय की कमी और आधुनिक जीवनशैली की वजह से हमने वह पारंपरिक तरीका छोड़ दिया है जिससे हमारे पूर्वज चावल पकाया करते थे। अगर उसी सही तरीके को फिर से अपनाया जाए तो चावल एक बहुत ही हल्का और संतुलित भोजन बन सकता है।

चावल का सही चुनाव कैसे करें
सबसे पहला कदम है चावल का सही चुनाव करना। आज बाजार में कई तरह के चावल मिलते हैं लेकिन आयुर्वेद के अनुसार हमेशा पुराना चावल खाना बेहतर माना जाता है।

पुराना चावल वह होता है जिसे कटे हुए कम से कम एक साल हो चुके हों। नया चावल पकने पर ज्यादा चिपचिपा हो जाता है और पचने में थोड़ा भारी माना जाता है। इससे शरीर में कफ बढ़ सकता है, जिससे भारीपन, सुस्ती और वजन बढ़ने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

इसके विपरीत, पुराना चावल समय के साथ थोड़ा सूख जाता है और उसका स्वभाव हल्का हो जाता है। ऐसा चावल पचने में आसान होता है और शरीर को ज्यादा आराम देता है।

इसलिए जब भी चावल खरीदें तो कोशिश करें कि कम से कम एक साल पुराना चावल लें। इसके साथ ही बहुत ज्यादा पॉलिश किए हुए सफेद चावल की जगह अनपॉलिश्ड चावल जैसे सोना मसूरी या पारंपरिक बासमती चावल का चुनाव करना बेहतर रहता है क्योंकि इनमें प्राकृतिक पोषक तत्व ज्यादा सुरक्षित रहते हैं।

चावल को धोना और भिगोना क्यों जरूरी है
चावल पकाने से पहले उसे अच्छी तरह धोना और भिगोना बहुत जरूरी होता है। कई लोग चावल को बस एक बार पानी से धोकर सीधे पकाने रख देते हैं, लेकिन यह सही तरीका नहीं है।

चावल के ऊपर अतिरिक्त स्टार्च और कभी-कभी धूल या अन्य कण भी लगे होते हैं। इसलिए चावल को कम से कम तीन से चार बार साफ पानी से धोना चाहिए। धोते समय हल्के हाथों से दानों को रगड़ना चाहिए और तब तक धोना चाहिए जब तक पानी साफ न दिखने लगे।

इसके बाद धुले हुए चावल को लगभग आधे घंटे से एक घंटे तक पानी में भिगोकर रखना चाहिए। भिगोने से चावल के दाने पानी सोख लेते हैं और जल्दी पकते हैं। इससे चावल पचने में भी ज्यादा आसान हो जाता है और पेट में गैस या भारीपन की समस्या कम होती है।

चावल पकाने का सही तरीका
आजकल अधिकतर घरों में चावल प्रेशर कुकर में पकाया जाता है क्योंकि इससे समय की बचत होती है। लेकिन पारंपरिक तरीके में चावल खुले बर्तन में पकाया जाता था।

खुले बर्तन में चावल पकाने से भाप और अतिरिक्त गर्मी बाहर निकलती रहती है जिससे चावल हल्का और खिला-खिला बनता है।
इसके लिए आप मिट्टी की हांडी, पीतल के बर्तन या मोटे तले वाले स्टेनलेस स्टील के बर्तन का इस्तेमाल कर सकते हैं।

खुले बर्तन में चावल पकाने की विधि
सबसे पहले, जितना चावल लेना है, उसके लगभग चार से पांच गुना पानी बर्तन में डालकर उबालने रख दें।
जब पानी में अच्छा उबाल आ जाए तो उसमें भीगा हुआ चावल डाल दें। आंच मध्यम रखें और चावल को धीरे-धीरे पकने दें।
जैसे-जैसे चावल उबलता है, वैसे-वैसे ऊपर सफेद झाग जैसा पानी दिखाई देने लगता है। यह अतिरिक्त स्टार्च होता है जिसे मांड कहा जाता है।
जब चावल लगभग पक जाए और दाने नरम होने लगें तब गैस बंद कर दें और बर्तन को थोड़ा ढककर मांड को सावधानी से बाहर निकाल दें।

मांड निकालने के बाद जो चावल बचता है, वह हल्का, खिला-खिला और पचने में आसान हो जाता है।

चावल को और संतुलित बनाने का तरीका
पके हुए चावल को और संतुलित बनाने के लिए उसमें थोड़ा सा शुद्ध देसी गाय का घी मिलाया जा सकता है।
घी चावल के रूखेपन को कम करता है और इसे पचाने में आसान बनाता है। इससे शरीर में गैस बनने की संभावना भी कम होती है।
अगर किसी को कफ या सर्दी की समस्या ज्यादा रहती है तो चावल पकाते समय पानी में एक या दो लौंग, थोड़ा हल्दी या थोड़ी काली मिर्च भी डाली जा सकती है।
अगर पेट में गैस की समस्या रहती है तो पके हुए चावल में थोड़ा भुना हुआ जीरा मिलाना भी फायदेमंद माना जाता है।

इस तरीके से बने चावल के फायदे
इस तरह से पकाए गए चावल हल्के होते हैं और खाने के बाद भारीपन या सुस्ती महसूस नहीं होती।

जब चावल खुले बर्तन में पकाकर उसका मांड निकाल दिया जाता है तो उसका ग्लाइसेमिक प्रभाव भी कम हो सकता है। इसलिए सीमित मात्रा में इस तरह का चावल डायबिटीज वाले लोग भी अपने भोजन में शामिल कर सकते हैं।

चावल हमेशा ताजा ही खाएं
एक महत्वपूर्ण बात यह है कि चावल हमेशा ताजा और गर्म ही खाना चाहिए। पके हुए चावल को लंबे समय तक रखकर बाद में दोबारा गर्म करके खाना सही नहीं माना जाता।

बार-बार गर्म करने से चावल पचने में भारी हो सकता है और पेट से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए उतना ही चावल पकाएं जितना एक समय के भोजन के लिए जरूरी हो।

ताजा चावल को मूंग की दाल, सब्जियों या कढ़ी के साथ खाने से यह एक संतुलित और पोषक भोजन बन जाता है।

Conclusion
चावल अपने आप में कोई खराब भोजन नहीं है। असली फर्क इस बात से पड़ता है कि हम उसे किस तरह चुनते हैं, कैसे धोते हैं और किस तरीके से पकाते हैं।

अगर चावल को सही तरीके से पकाया जाए और संतुलित मात्रा में खाया जाए तो यह शरीर को ऊर्जा देने वाला, हल्का और संतुलित भोजन बन सकता है।

इसलिए चावल से डरने की बजाय उसके सही पारंपरिक तरीके को अपनाना ज्यादा समझदारी भरा कदम हो सकता है।

क्या आप भी चावल खाने के बाद भारीपन या नींद महसूस करते हैं?
#भारत बचाओ आंदोलन #

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