Alok Kumar Ranjan
I will write the truth with impunity till my last breath and even if my breath breaks, the sound of Alok kumar Ranjan
27/12/2024
वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल, दूर नहीं है;
थककर बैठ गये क्या भाई! मंजिल दूर नहीं है।
चिनगारी बन गई लहू की
बूँद गिरी जो पग से;
चमक रहे, पीछे मुड़ देखो,
चरण - चिह्न जगमग - से।
शुरू हुई आराध्य-भूमि यह,
क्लान्ति नहीं रे राही;
और नहीं तो पाँव लगे हैं,
क्यों पड़ने डगमग - से?
बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नहीं है;
थककर बैठ गये क्या भाई! मंजिल दूर नहीं है।
अपनी हड्डी की मशाल से
हॄदय चीरते तम का,
सारी रात चले तुम दुख
झेलते कुलिश निर्मम का।
एक खेय है शेष किसी विधि
पार उसे कर जाओ;
वह देखो, उस पार चमकता
है मन्दिर प्रियतम का।
आकर इतना पास फिरे, वह सच्चा शूर नहीं है,
थककर बैठ गये क्या भाई! मंजिल दूर नहीं है।
दिशा दीप्त हो उठी प्राप्तकर
पुण्य--प्रकाश तुम्हारा,
लिखा जा चुका अनल-अक्षरों
में इतिहास तुम्हारा।
जिस मिट्टी ने लहू पिया,
वह फूल खिलायेगी ही,
अम्बर पर घन बन छायेगा
ही उच्छवास तुम्हारा।
और अधिक ले जाँच, देवता इतना क्रूर नहीं है।
थककर बैठ गये क्या भाई! मंजिल दूर नहीं है।
12/05/2024
"प्राप्नोति वै वित्तमसद्बलेन नित्योत्त्थानात् प्रज्ञया पौरुषेण।
न त्वेव सम्यग् लभते प्रशंसां न वृत्तमाप्नोति महाकुलानाम्॥"
अर्थात - "धूर्तता/कपट, निरंतर प्रयास एवं चतुराई से कोई व्यक्ति धन तो प्राप्त कर सकता है, परंतु सदाचारी उत्तम पुरुष को प्राप्त होने वाले आदर-सम्मान को नहीं ।"
12/05/2024
*त्याग का दूसरा नाम है माँ*
परिवार का ख़्याल रखते-रखते अपनी पसंद-नापसंद बहुत पीछे छोड़ देती हैं माँ ।
बच्चों की ख़ुशियों में अपनी ख़ुशियाँ ढूँढ लेती है माँ।
Salute to the unending sacrifices, unconditional love and care by all the mothers in our lives 🫡🦋
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