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26/07/2024

गेहूं ने हमें इस तरह अपना गुलाम बनाया

दरअसल तमाम बैक्टीरिया और वायरस को छोड़ दें तो गेहूं जितना बड़ा साम्राज्य इस धरती पर किसी और का नहीं है। यहां तक कि दूसरे देशों पर छल-बल से कब्जा जमाकर उन्हें अपना उपनिवेश बनाने की हरकतों वाले दौर में भी किसी के पास इतना बड़ा इलाका नहीं था, जितना गेहूं का है। उस दौर का ब्रिटेन हो, फ्रांस हो या स्पेन…सबका राज फीका पड़ जाता है इसके सामने।

आमतौर पर लोग सोचते हैं कि गेहूं कभी जंगली पौधा था और इंसानों ने इसकी खेती कर इसे सभ्य दुनिया लायक बना दिया। लेकिन गेहूं के सफर पर नजर डालें तो माजरा कुछ और लगता है। साफ दिखता है कि दरअसल गेहूं ने आवारा और घुमंतू होमो सैपियंस को एक जगह ठहरना सिखाया और आगे चलकर उनकी जिंदगी का एक अहम आधार बन गया।

करीब 25 लाख साल तक हमारे पूर्वज जंगली फल-फूल और जानवरों के शिकार पर निर्भर रहे। तमाम अध्ययनों से यह पता चलता है कि आज से करीब 10 हजार साल पहले हालात तेजी से बदलने शुरू हुए। उस बदलाव को एक बड़ी कृषि क्रांति कहा जा सकता है। उन दौर में गेहूं तमाम जंगली चीजों में से एक था। मध्य पूर्व के कुछ इलाकों में यह खासतौर से पाया जाता था। हालांकि अगले दो हजार सालों में ही गेहूं उन तमाम जगहों पर पहुंच गया, जहां इंसानों की बसावट थी।

यह सब कैसे हुआ होगा? जानेमाने विद्वान युवाल नोवा हरारी इस पर रोशनी डालते हैं। अपनी किताब सैपियंस, अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ ह्यूमनकाइंड (Sapiens, A Brief History of Humankind) में हरारी ने लिखा है, 'यह सब आसान नहीं था। गेहूं को ढेरों इंसानों की जरूरत थी। उसे चट्टानें और कंकड़-पत्थर रास नहीं आते थे। लिहाजा सैपियंस ने गेहूं के लिए खेत बनाने की हाड़तोड़ मेहनत करनी शुरू कर दी। गेहूं ऐसा पौधा है कि यह दूसरे पौधों के साथ जगह, पानी और अपनी खुराक साझा करना पसंद नहीं करता। लिहाजा इंसान दिन-दिनभर लगे रहते थे गेहूं के खेतों से दूसरे पौधों को हटाने में।' हरारी लिखते हैं, 'गेहूं को बीमारी न लगे, इसके लिए सैपियंस इसे कीड़ों से बचाने के इंतजाम में भी जुटे रहे। चूहों और टिड्डियों से बचाने के लिए किसानों ने खेतों में बाड़ लगाई और पहरा भी दिया। गेहूं को प्यास भी खूब लगती है। लिहाजा इंसानों ने नहरों और कुओं का इंतजाम भी किया। गेहूं की भूख मिटाने के लिए सैपियंस ने जानवरों का मल-मूत्र खेतों में डाला ताकि गेहूं को पोषक तत्व मिल सकें।'

इंसान ने यह सब किया खुद अपनी फितरत के खिलाफ जाकर। इंसानों का जो विकास क्रम है, उसमें उस वक्त खेती-बाड़ी का कोई सीन ही नहीं बनता था। इंसानों को तो पेड़ों पर चढ़ना था और शिकार के लिए जानवरों को घेरना था। खेती और सिंचाई का इंतजाम, कम से कम उस वक्त तो इंसान के सिलेबस में नहीं था।

लेकिन गेहूं की संगत ने इंसान को बदल दिया। और अपने संग-साथ की बड़ी कीमत भी वसूली। पुराने नर कंकालों के अध्ययन से पता चलता है कि गेहूं के दबदबे वाली उस कृषि क्रांति के दौर में और उसके बाद इंसानों को आर्थराइटिस, हर्निया और स्लिप्ड डिस्क जैसी कई बीमारियां झेलनी पड़ीं। इंसानों की मेहनत के दम पर गेहूं फूलता-फलता रहा। उसके कई दूसरे जंगली साथियों का वजूद मिट गया और उनके इलाके पर भी गेहूं का कब्जा हो गया। अमेरिका के कृषि विभाग का कहना है कि आज दुनिया में साढ़े 22 लाख वर्ग किलोमीटर इलाके में गेहूं की खेती होती है। यूनाइटेड नेशंस फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेशन का कहना है कि विश्व के 35 फीसदी से ज्यादा लोगों के लिए मुख्य अनाज गेहूं ही है।

अब आते हैं उस संकट पर, जिसका दुनिया सामना कर रही है। दुनिया में सबसे ज्यादा गेहूं उत्पादन चीन में होता है और दूसरे नंबर पर भारत है। लेकिन खुद इनके यहां इतनी खपत है कि ये कुछ खास निर्यात नहीं कर पाते। चीन को तो बल्कि बाहर से गेहूं मंगाना पड़ जाता है। भारत का निर्यात भी दुनिया में सप्लाई के लिहाज से मामूली ही है। निर्यात बड़ा होता है रूस और यूक्रेन वाले इलाके से। ये दोनों देश दुनिया में गेहूं की सप्लाई में करीब एक तिहाई योगदान करते हैं। हालांकि 24 फरवरी को यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद से गेहूं की यह सप्लाई चेन अस्तव्यस्त है और एक तरह से टूट चुकी है।

अब एक तिहाई गेहूं की सप्लाई अगर अचानक रुक जाए तो अफरातफरी तो फैलनी ही थी। इधर भारत में गर्म मौसम की मार ने गेहूं की उपज पर बुरा असर डाला। गेहूं निर्यात करने वाले दूसरे देश भी सतर्कता बरत रहे हैं।

इसी के चलते गेहूं के दाम आसमान छू रहे हैं और G7 देशों के समूह ने निर्यात रोकने के भारत के फैसले पर चिंता जताई है। भारत ने अपने यहां कीमतों पर काबू पाने के लिए निर्यात रोकने का फैसला किया है। हालांकि बड़े निर्यातक देश गेहूं उत्पादन में गिरावट आने से परेशान हैं।

अभी जो गेहूं संकट दिख रहा है, उसका पहला इशारा मिला था मिस्र की एक कंपनी से। युद्ध शुरू होने से पहले वह कंपनी मुख्य रूप से रूस और यूक्रेन से गेहूं मंगाया करती थी। लेकिन उसने वॉशिंगटन की एक एक्सपोर्ट फर्म को 60 हजार टन गेहूं का ऑर्डर दिया। वह एक्सपोर्ट फर्म एक जापानी ट्रेडिंग कंपनी की है।

मिस्र की कंपनी के कदम से एक्सपोर्ट फर्म को हैरानी हुई क्योंकि उस कंपनी ने पिछले दो दशकों में उसे कोई ऑर्डर नहीं दिया था। मिस्र की कंपनी ने यह कदम मार्च में ही उठा लिया था, जब यूक्रेन युद्ध शुरू हुए कुछ हफ्ते ही हुए थे। यानी जब यूरोप के बड़े हिस्से की नींद भी नहीं खुली थी, तभी मिस्र की वह कंपनी गेहूं संकट उभरने का अंदाजा लगा चुकी थी।

दरअसल रूस और यूक्रेन के गेहूं निर्यात पर करीब 50 देश निर्भर रहे हैं। अब भी कुछ एक्सपोर्ट कंपनियां रूस से काम कर रही हैं, लेकिन रूस पर थोपे गए प्रतिबंधों के चलते उन्हें बहुत मुश्किल हो रही है।

इधर अमेरिका के कृषि विभाग से इस महीने जारी आंकड़े बता रहे हैं कि अधिकतर उत्पादक और निर्यातक देशों में गेहूं का उत्पादन घटा है। उसके अनुमान के मुताबिक, इस साल दुनियाभर में 77 करोड़ 50 लाख टन गेहूं उत्पादन का अनुमान है। यह पिछले साल से 40 लाख टन कम है। तेजी से बढ़ते दाम के चलते कम आमदनी वाले लोगों की थाली से गेहूं दूर जाने का भी खतरा पैदा हो सकता है। यह खतरा इसलिए भी है क्योंकि गेहूं की अगली फसल पर महंगाई की मार पड़ने वाली है। नैचुरल गैस की ऊंची कीमतों के चलते फर्टिलाइजर का दाम चढ़ेगा। इसका असर गेहूं की खेती पर पड़ेगा। पेट्रोल-डीजल के ऊंचे दाम के चलते गेहूं को स्टोर करने की लागत भी बढ़ेगी।

रूस-यूक्रेन युद्ध इंसान और गेहूं के रिश्ते के लिए भी चुनौती बन गया है। हो सकता है कि ऐसे में भारत जैसे देशों को खान-पान में विविधता की अपनी विरासत की याद आए और वे उसे सहेजने और मजबूत करने में जुट जाएं। बाकी दुनिया भी हो सकता है कि थाली में दूसरे अनाजों की जगह बढ़ाने का रास्ता पकड़ ले।

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