Harshnath Ancient Temple - Sikar Rajasthan

Harshnath Ancient Temple - Sikar Rajasthan

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Harshnath Shiva Temple is located 21 Kms south from Sikar, built by Chauhan Rulers around 10th century, ancient carvings & statues are a treat to explore.

01/08/2023

Pleased to share my another Article, its written about Devgarh Fort & a beautiful trek to access it, which is near Harshnath, Sikar. It is Published today by Maruvedna Newspaper. Originally, it was written for an FB page created by me to Create Awareness about and to Promote Harshnath Ancient Temple - Sikar Rajasthan, as a tourist attraction. All of you are also requested to visit this page to know more about Devgarh & Harshnath Temple. Please also like & Share the page & posts thereon. Please also support newspaper, which, Mr. Devendra, is publishing from Jhunjhunu & circulating it all over India, as a voice of Rajasthan & Pravasi Rajasthanies. Thank you.

देवगढ़ किला एवम देवगढ़ ट्रेक:

देवगढ़ सीकर से लगभग 10 किमी दूर हर्षनाथ रोड के बांयी और स्थित, एक किला/ दुर्ग/ गढ़ है। यह किला अपने रणनीतिक दृष्टि से ऊंची पहाड़ी पर निर्मित होने के कारण लोकप्रिय है। इतिहासकारों के अनुसार सीकर के रावराजा देवीसिंह जी ने सन 1787, मे ऊंची पहाड़ी पर, इस सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण किले का निर्माण करवाया था, इसलिए इसका नाम देवगढ़ रखा गया। यह देखने लायक स्थान सीकर के इतिहास की धरोहर है और अतीत के भग्नावशेष होने के कारण अपने अनूठे तरीके से आकर्षक और जीवंत है। यही कारण है कि हर्षनाथ जैसे लोकप्रिय स्थान के समक्ष थोड़ा उपेक्षित होने के बाद भी यह पर्यटकों एवम ट्रेकर्स के बीच सबसे पसंदीदा स्थलों में से एक बनना शुरू हो गया है।

सीकर के नजदीक लगभग 14-15 किमी पर एक पहाड़ की चोटी पर स्थित प्रसिद्ध प्राचीन शिव मंदिर एवम रमणीक स्थान है हर्षनाथ, और वहां जाते हुए मुख्य सड़क पर सांवली पार करने के बाद, बांयी और पहाड़ी पर एक किला / दुर्ग दिखाई देना शुरू होता है, जो हर्ष के पहाड़ पर पहुंचने के बाद वहां से भी दिखाई देता है। इस किले का नाम है देवगढ़ का किला / दुर्ग, जिसे हमारे यहां की स्थानीय भाषा मे गढ़ भी कहते हैं। सीकर से लगभग 9-10 किमी पर एक छोटी सड़क हर्ष की मुख्य सड़क से बायीं और से देवगढ़ गांव के लिए निकलती है, जो हमे किले की पहाड़ी की तलहटी तक ले जाती है। वहां से शुरू होती देवगढ़ किले की ट्रेक। देवगढ़ की ट्रेक मध्यम कठिनाई वाली ट्रेक है और 45 मिनेट से एक घण्टे में चढ़ाई पूरी होती है। चढ़ाई समाप्ति पश्चात दिखाई देने वाले भूतकाल के ऐतिहासिक अवशेष, किले के भव्यता, आसपास की अरावली पहाड़ियां, नीला आसमान और सुदूर क्षितिज पर दृष्टिगोचर होते सीकर एवम आसपास के गांव के सुंदर दृश्य निश्चित रूप से मनमोहक एवम यादगार होते हैं।

हर्षनाथ अपने प्राचीन मंदिर के कलात्मक भग्नावशेष, शिव मन्दिर एवम प्राकृतिक अवलोकन स्थान के रूप में काफी प्रसिद्ध है। पर्यटक और सीकरवासी यहां घूमने और ट्रैकिंग के लिए जाते हैं, किन्तु सड़क के बांयी और ऊंची पहाड़ी से यह देवगढ़ किला अकेला बैठा मायूसी से ताकता रहता है। पर अब धीरे धीरे देवगढ़ की लोकप्रियता बढ़ रही है। तो आइए ले चलते हैं आप को भी, देवगढ़ की अनूठी ट्रेक पर।

पिछले जून में, सीकर से मैं और मेरा छोटा भाई और साथ मे हम दोनों के बच्चे, पहले दिन हर्ष का ट्रैक करने गए हुए थे, ताकि ट्रेक का आनंद लेने के साथ ही साथ हर्षनाथ के बारे में फेसबुक पेज पर कुछ नई तस्वीरें भी साझा कर सकूं। ऐसे में हर्ष के पहाड़ से देवगढ़ को निहारते हुए, और कुछ ट्रेकर्स से बात करते हुए अनायास ही अहसास हुआ कि इतनी बार हर्ष आये हैं, क्यों न इस बार देवगढ़ ट्रेक का भी तजुर्बा किया जाए। बच्चे तुरंत ही तैयार हो गए और मैंने और भाई ने अगले ही दिन सुबह देवगढ़ ट्रेक का प्रोग्राम बना लिया।

हमलोग सीकर से निकले और लगभग 9 किमी के बाद बांयी और देवगढ़ के लिए मुड़ने का बोर्ड दिखाई दिया, और मुख्य सड़क से अंदर लगभग 2-3 किमी पर पहाड़ की तलहटी में देवगढ़ गांव आया, फिर एक दो जगह बांए मुड़ते मुड़ते, ट्रेक यानी की चढ़ाई शुरू होने का स्थान आ गया। (यदि चाहें तो गूगल मैप में भी 'देवगढ़ फोर्ट सीकर' का डायरेक्शन लगा सकते हैं।) गांव में छोटी छोटी गलियों के बाद, एक बड़े से गोल पीपल के गट्टे के एक तरफ कार पार्क करके, वहीं बने एक छोटे मंदिर में दर्शन के बाद, बैकपैक्स में पानी और स्नैक्स रख कर चढ़ाई शुरू की हमने। आप भी जब जाएं तो अपने साथ पानी एवम स्नैक्स साथ ले जाना न भूलें, क्योंकि पर्यटन दृष्टि से विकसित न होने के कारण एक बार ट्रेक शुरू होने के बाद कुछ भी नही मिलेगा।

ट्रेक बहुत आसान तो नही किन्तु कठिनाई का स्तर मध्यम कह सकते हैं। हर्षनाथ का ट्रैक इससे काफी आसान है। लेकिन इस ट्रैक पर काफी समय से रख रखाव न होने एवम पर्यटकों की कम आवाजाही के कारण इस ट्रैक पर पत्थर उबड़ खाबड़ भी हैं, कुछ स्थानों पर उखड़ भी गए हैं, और कमजोर पत्थरों पर पॉंव रखने पर लुढ़कने फिसलने का खतरा तो है ही, खड़ी चढ़ाई एवम बीच बीच मे पगडंडियों पर अतिक्रमण करती हुई कंटीली झाड़ियां कठिनाई का स्तर एवम रोमांच दोनों को बढ़ा कर अगले स्तर पर पहुंचा देती हैं।

एक बार ट्रेक शुरू करने के बाद जैसे जैसे ऊपर चढ़ते हैं, और घुमावदार पगडंडियों को पार करने के बाद ज्यूँ ही किला दिखाई देना शुरू होता है तो रोमांच का स्तर बढ़ना शुरू होता है, और जब किले का झाड़ियों से आच्छादित और वक्त के हाथों धूल धूसरित मुख्यद्वार दिखाई देता है तो शायद वही अनुभूति होती है जो एडमंड हिलेरी को एवेरेस्ट पर पहुंच कर हुई होगी। इस दरवाजे में बनी तिबारी में कई वर्षों से जमी धुल की परतें, नमी, जाले, चमगादड़ों की गंध और भूतकाल की धरोहर को न संजो रख पाने की एक मिली जुली से अनुभूति महसूस होती है।....!!!

मुख्य द्वार एवम तिबारी से प्रवेश करते ही यह आभास होता है कि मंजिल पर पहुंच गए, लेकिन दरवाजों से किले के प्रांगण में घुसते ही पता लग जाता है कि अभी तो और सीढ़ियां और चढ़ाई दोनों बाकी है।

किले की विशाल दीवारें, जलाशय एवम बाहरी रिहायश के खंडहर इस किले की भव्यता की कहानियां सुनाते प्रतीत होते हैं। विशाल दीवारों और बुर्जों से चारों तरफ के गांव, खेत, हर्ष नाथ का पहाड़, अरावली पर्वतमाला और उत्तर दिशा में दिखाई देता सीकर शहर, कुल मिला कर बड़ा ही विहंगम दृश्य दिखाई देता है और ऊंचाई पर आती हुई हवा के झोंके जैसे पूरी थकान मिटा देते हैं।

किले के उत्तरी भाग में विशाल परकोटे की दीवारें और नीचे दुर्गम पहाड़ी ढलाने हैं, और दक्षिणी भाग में कुछ ऊंचाई पर सीढियां चढ़ने, पर एक बड़े दरवाजे के अंदर एक बड़ा दालान है जिसमे चारों तरफ कमरे बने हुए हैं, जिनमे शायद एक समय पर सैनिक, सेवक और अश्व रहा करते होंगे किन्तु अब जंगली घास और झाड़ियों का निवास है। दरवाजे के पास घोड़ों के चढ़ने उतरने का खुर्रा एवम सवारी में सहायता करने हेतु चबूतरा भी बना हुआ है।

और दालान के बाद आता है एक रंग बिरंगे और आलीशान महल के खंडहर। राजसी कमरे जिन में आज भी ताजा हवा आती रहती है, रंग बिरंगी दीवारों में स्थानीय भित्ति चित्र कला के अवशेष, झरोखे जिन से चारों तरफ के सुंदर नजारे दिखाई दें, छत पर जाने को सीढियां तथा राजसी / ठाकुर परिवार के लिए बने राजसी शौच एवम स्नान व्यवस्थाएं जैसे हम सब का इन खंडहरों के शाही भूतकाल से साक्षात्कार करवाती हैं। और हां, छतों पर उल्टे लटके चमगादड़ों से डरें नही, बस शोर मचा कर उनकी नींद में खलल नही डालें।

लेकिन देखते हुए बड़ा ही अफसोस हुआ यह देख कर कि इतने सुंदर महल की दीवारें, फर्श, छत और खंभे तक को, गड़े छुपे खजाने की तलाश करते लालची मनुष्यों ने जगह जगह से खोद डाला है, रौंद डाला है। किन्तु फिर भी इतना जख्मी होने पर भी इन का गौरवशाली अतीत मानो पर्यटकों के सामने मुस्करा देता है। ऐसा सुना है कि यह किला बिक चुका है और किसी की निजी संपत्ति है, किन्तु रखरखाव जैसी कोई चीज नजर नही आती है, परंतु इस किले का आकर्षण भी शायद यही है।

छत से किले की प्राचीर के ऊंचे दक्षिणी हिस्से में पहुंचते हैं। विशाल दीवारें, बुर्ज और मनमोहक दृश्य, किसी भी फोटोग्राफर के लिए नैसर्गिक एवम स्वर्गतुल्य स्थान है।

दिन चढ़ने के साथ बढ़ती धूप में राजस्थान की गर्मी का अहसास भी धीरे धीरे ज्वलंत होने लगता है, और ऐसे में वापिस लौटना भी पड़ता है। आपके साथ लौटेगा एक संस्मरण, अंचल के बाकी किलों से काफी अलग एवम कठिन ट्रेक का यह अनुभव शर्तिया जीवन भर एक याद बन कर रहेगा।

© Dr. CA. Sunil Sharma

Photos from Harshnath Ancient Temple - Sikar Rajasthan's post 10/07/2023

देवगढ किला एवम देवगढ़ ट्रेक:
(पार्ट -2 ट्रैकिंग / हाईकिंग)
देवगढ़ सीकर से लगभग 10 किमी दूर हर्षनाथ रोड के बांयी और स्थित एक किला/ दुर्ग/ गढ़ है। यह किला अपने रणनीतिक दृष्टि से ऊंची पहाड़ी पर निर्मित होने के कारण लोकप्रिय है। इतिहासकारों के अनुसार सीकर के राव राजा देवी सिंह जी ने सन 1787 में इसे बनवाया था। यह देखने लायक जगह है। यह स्थान सीकर के इतिहास की धरोहर और अतीत के भग्नावशेष होने के कारण अपने अनूठे तरीके से आकर्षक और जीवंत है। यही कारण है कि हर्षनाथ जैसे लोकप्रिय स्थान के समक्ष थोड़ा उपेक्षित होने के बाद भी यह पर्यटकों एवम ट्रेकर्स के बीच सबसे पसंदीदा स्थलों में से एक बनना शुरू हो गया है।
सीकर से मैं और मेरा छोटा भाई और साथ मे हम दोनों के बच्चे, पहले दिन हर्ष का ट्रैक करने गए हुए थे, ताकि ट्रेक का आनंद लेने के साथ ही साथ इस हर्षनाथ के इस फेसबुक पेज पर कुछ नई तस्वीरें भी साझा कर सकूं। ऐसे में हर्ष के पहाड़ से देवगढ़ को निहारते हुए, और कुछ ट्रेकर्स से बात करते हुए अनायास ही अहसास हुआ कि इतनी बार हर्ष आये हैं, क्यों न इस बार देवगढ़ ट्रेक का भी तजुर्बा किया जाए। बच्चे तुरंत ही तैयार हो गए और मैंने और भाई ने अगले ही दिन सुबह देवगढ़ ट्रेक का प्रोग्राम बना लिया।
देवगढ़ ट्रेक के लिए सीकर से हर्ष की सड़क पर लगभग 9-10 किमी के बाद बांयी और देवगढ़ के लिए मुड़ने का बोर्ड दिखाई देता है, और मुख्य सड़क से अंदर लगभग 2-3 किमी पर पहाड़ की तलहटी में देवगढ़ गांव आया, और फिर एक दो जगह बांए मुड़ते मुड़ते, ट्रेक या की चढ़ाई शुरू होने का स्थान आ गया। यदि चाहें तो गूगल मैप में भी 'देवगढ़ फोर्ट सीकर' का डायरेक्शन लगा सकते हैं। गांव में छोटी छोटी गलियों के बाद एक बड़े से गोल पीपल के गट्टे के एक तरफ कार पार्क करके, वहीं बने एक छोटे मंदिर में दर्शन के बाद बैकपैक्स पानी और स्नैक्स रख कर चढ़ाई शुरू की हमने। आप भी जब जाएं तो अपने साथ पानी एवम स्नैक्स साथ ले जाना न भूलें, क्योंकि एक बार ट्रेक शुरू होने के बाद कुछ भी नही मिलेगा।

ट्रेक बहुत आसान तो नही किन्तु कठिनाई का स्तर मध्यम कह सकते हैं। हर्षनाथ का ट्रैक इससे काफी आसान है। इस ट्रैक पर काफी समय से रख रखाव न होने एवम पर्यटकों की कम आवाजाही के कारण इस ट्रैक पर पत्थर उबड़ खाबड़ भी हैं, कुछ स्थानों पर उखड़ भी गए हैं, और कमजोर पत्थरों पर पॉंव रखने पर लुढ़कने फिसलने का खतरा तो है ही, खड़ी चढ़ाई एवम बीच बीच मे पगडंडियों पर अतिक्रमण करती हुई कंटीली झाड़ियां कठिनाई का स्तर एवम रोमांच दोनों को बढ़ा कर अगले स्तर पर पहुंचा देती हैं।

एक बार ट्रेक शुरू करने के बाद जैसे जैसे ऊपर चढ़ते हैं, और घुमावदार पगडंडियों को पार करने के बाद ज्यूँ ही किला दिखाई देना शुरू होता है तो रोमांच का स्तर बढ़ना शुरू होता है, और जब किले का झाड़ियों से आच्छादित और वक्त के हाथों धूल धूसरित मुख्यद्वार दिखाई देता है तो शायद वही अनुभूति होती है जो एडमंड हिलेरी को एवेरेस्ट पर पहुंच कर हुई होगी। इस दरवाजे में बनी तिबारी में कई वर्षों से जमी धुल की परतें, नमी, जाले, चमगादड़ों की गंध और भूतकाल की धरोहर को न संजो रख पाने की एक मिली जुली से अनुभूति महसूस होती है।....!!!
(शेष, अगले पार्ट-3 में)
© Dr. CA. Sunil Sharma

26/12/2021
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