Satyapath
सनातन वैदिक धर्म के ज्ञान के प्रचार व ?
1.१० धर्म से सम्बन्धित :
क्रमशः ......................
इसके पूर्व के लेख में हमने जाना कि सनातन वैदिक धर्म के अनुसार वेदों के ऋषियों की वाणी के माध्यम से मनुष्यों को ईश्वर का आदेश है कि धर्म पालन के साथ – साथ धर्म की स्थापना के लिए सभी आर्य (सज्जन व विनर्म अर्थात् श्रेष्ठ) मनुष्यों को बलवान‚ शक्तिवान‚ धनवान और ज्ञानवान बनने के लिए कहा गया है। लेकिन बल‚ शक्ति‚ ज्ञान व धन गुण की प्राप्ति कैसे हो यह भी जाना व जिन लक्षणों की आवश्यकता है वे कौन कौन से हैं।
यह समस्त लक्षण जिस पथ पर पूर्ण होते हैं उस पथ का नाम योग है‚ और इसके आठ चरण हैं‚ यहाँ तक हमने जाना था। अब योग क्या है उसके आठ चरण कौन कौन से हैं उनके क्या नियम हैं। यह जानेंगे।
"योग" अर्थात् जोड‚ महर्षि पातंजलि जी ने गहन शोध के बाद आठ चरणों को परिभाषित किया और उन आठों चरणों को जोडकर एक नाम दिया "योग"। क्योंकि इसके आठों चरण व्यक्ति को लौकिक व परलौकिक दोनो भागों से जोडते हैं। इस योग को आर्य मनुष्यों द्वारा अपनी प्रतिदिन व प्रतिक्षण की दिनचर्या में शामिल करना आवश्यक है तभी कोई मनुष्य वास्तविक मनुष्य बन पाएगा व इस संसार के अनेक अप्रकटीय रहस्यों से स्वयं के भीतर से ही परिचित हो सकेगा।
योग अर्थात् अष्टांग योग (आठ अंगों वाला योग) को आठ अलग-अलग चरणों वाला मार्ग नहीं समझना चाहिए बल्कि यह आठ आयामों वाला "योग" नाम से एक मार्ग है‚ जिसमें आठों आयामों का अभ्यास एक साथ किया जाता है।
योग के आठ अंग इस प्रकार हैं –
१) यम, २) नियम, ३) आसन, ४) प्राणायाम, ५) प्रत्याहार, ६) धारणा ७) ध्यान ८) समाधि
1. यम– यम अर्थात् नैतिकता‚ मतलब मनुष्यों को पूर्ण रूपेण नैतिक होना चाहिए अर्थात् हमें वैसा व्यवहार दूसरो के साथ नही करना चाहिए जो हमें स्वयं के साथ पसंद नही I इस यम अंग में ५ भाग हैं‚ जो इस प्रकार हैं –
1. अहिंसा – बिना किसी उचित कारण के मन से‚ वाणी से व शरीर से किसी के भी प्रति हिंसा न करना अर्थात् न गलत सोचना न बोलना न करना।
2. सत्य – विचारों में सत्यता, परम-सत्य में स्थित रहना
3. अस्तेय – चोर-प्रवृति का न होना अर्थात् ऐसे विचार का नाश करना।
4. ब्रह्मचर्य – इसके दो अर्थ हैं:
• चेतना को ब्रह्म के ज्ञान में स्थिर करना।
• सभी इन्द्रिय-जनित सुखों को शास्त्रों के नियमानुसार भोगना।
5. अपरिग्रह – जीवन जीने की आवश्यकता से अधिक का संचय नहीं करना।
2. नियम – पाँच प्रकार की व्यक्तिगत नैतिकता
1. शौच – अर्थात शरीर और मन की शुद्धि मतलब पवित्रता
2. संतोष – स्वं कर्मों से प्राप्त वाली स्थिति में सन्तुष्ट रहना
3. तप – शास्त्रों के अनुसार स्वयं को नियमों के अनुसार चलाने की दृढता तप कहलाती है।
4. स्वाध्याय – विद्वानों के लिखित ग्रथों का अध्ययन व स्वयं में मनन व चिंतन करना।
5. ईश्वर-प्रणिधान – ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करते हुए उसके प्रति पूर्ण श्रद्धा रखते हुए स्वयं के समर्पण का भाव रखना।
आगे के ६ अंगों का अर्थ जारी ............
1.९ धर्म से सम्बन्धित :
क्रमशः ......................
इसके पूर्व के लेख में हमने जाना कि सनातन वैदिक धर्म के अनुसार वेदों के ऋषियों की वाणी के माध्यम से मनुष्यों को ईश्वर का आदेश है कि धर्म पालन के साथ – साथ धर्म की स्थापना के लिए और इसके लिए मनुष्यों को कहा गया है कि तुम बलवान‚ शक्तिवान‚ धनवान और ज्ञानवान बनो‚ प्रमाण हेतु ऋग्वेद के कुछ प्रमाण भी हमने देखे।
आइए अब विचार करते हैं कि कैसे हम ईश्वरीय आदेश के अनुसार धर्म पालन के साथ साथ धर्म की स्थापना हेतु बल‚ शक्ति‚ ज्ञान व धन गुणों की प्राप्ति करें ........।
तो जानिए कि शारीरिक बल की प्राप्ति होती है शरीर के बाह्य व आन्तरिक अंगों के स्वस्थ व पुष्ट होने से‚ जिसके लिए एक पूण शुद्ध वातावरण में मनुष्य की दिनचर्या में नियमित रूप से शुद्ध सात्विक आहार व विभिन्न प्रकार की शारीरिक क्रियाओं का करना आवश्यक है जिसके लिए मनुष्य को कठिन परिश्रम की आवश्यकता होती है। इस प्रकार से सिद्ध होता है कि
आर्य (श्रेष्ठ) मनुष्यों को शुद्ध वातावरण का निर्माण करना भी मनुष्य के लिए अत्यावश्यक है।
शक्ति गुण अर्थात् कितने अन्य मनुष्य जन आपके सुख व दुःख में सहभागिता करने के लिए प्रत्येक क्षण तैयार हैं‚ मनुष्य इस शक्ति गुण की प्राप्ति प्रेम‚ परोपकार व न्याय सत् लक्षणों के द्वारा करता है।
ज्ञान गुण की प्राप्ति शुद्ध वातारवरण‚ सात्विक आहार‚ स्वाध्याय व चिंतन मनन एवं विद्वानों का संग व उनसे तर्कसंगत चर्चा के माध्यम से ज्ञान की प्राप्ति होती है।
धन की प्राप्ति के लिए उपर्युक्त तीनों प्रकार के नियमों का पालन करते हुए परिश्रम की आवश्यकता होती है। धन प्राप्त करना ही महत्वपूण नही है बल्कि उसकी सुरक्षा व उसका निर्भयता पूण भोग करते हुए उस धन का प्रयोग धर्म स्थापना में भी आवश्यक है ताकि वह धन आपको धन्य कर सके। जो धन आपको मानसिक रूप से संतुष्ट न कर सके‚ समाज में आपकी यश‚ कीर्ति व प्रतिष्ठा स्थापित न कर सके‚ समाज में लोगों द्वारा आपकाे सम्मान न दिला सके‚ सबसे महत्वपूर्ण कि धर्म पालन व धर्म स्थापना में प्रयोग न हो सके‚ इस प्रकार का धन कूडे के ढेर के अतिरिक्त अन्य कुछ नही‚ और ऐसा धन आन्तरिक व बाह्य रूप से आपका शत्रु साबित होता है।
अब हमने जाना कि बल‚ शक्ति‚ ज्ञान व धन गुणों की प्राप्ति कैसे होती है परंतु प्रश्न उठता है कि
आखिर किस पथ पर अग्रसर हुआ जाय जो इन चारों गुणों की प्राप्ति के लिए इनके समस्त नियमों का पूर्ण किया जा सके व धर्म पालन व धर्म स्थापना दोनों कार्य हो सके। तो इसके लिए हमारे एक महान विद्वान ऋषि महाराज पातंजलि जी ने आठ चरणों का एक नियमरूपी मार्ग प्रशस्त किया है जिसका प्रसिद्ध नाम "योग" है।
यह योग क्या है‚ इसके कौन कौन से आठ चरण है उनके क्या नियम है यह हम आगे जानेंगे .......।
07/07/2018
1.८ धर्म से सम्बन्धित (प्रथम) :
क्रमशः ......................
इसके पूर्व के लेख में हमने जाना कि सनातन वैदिक धर्म के अनुसार वेदों के ऋषियों की वाणी के माध्यम से मनुष्यों को ईश्वर का आदेश है कि धर्म पालन के साथ – साथ धर्म की स्थापना के लिए और इसके लिए मनुष्यों को कहा गया है कि तुम बलवान‚ शक्तिवान‚ धनवान और ज्ञानवान बनो‚ जिसमें ईश्वर आदेश के अनुसार आर्य (श्रेष्ठ) मनुष्यों के लिए तो यह परम आवश्यक है क्योंकि एक कमजोर व्यक्ति धर्म लक्षणों का पालन तो कर सकता है परंतु उन धर्म लक्षणों की स्थापना का कार्य कदापि नही कर सकता। पवित्र वेदों के अनुसार धर्म स्थापना के कार्य का परित्याग कर मात्र धर्म पालन का कार्य मनुष्य के जीवन के वास्तविक उद्देश्य का अपूण पथ है‚ इसलिए लिए वेदों में देवताओं से बल‚ शक्ति‚ धन व ज्ञान की प्राप्ति के कई श्लोक हैं और जिनका प्रारम्भ सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद के प्रथम मण्डल से ही हो जाता है। उदाहरणार्थ –
ऋग्वेद के मण्डल १‚ सूक्त ५ के श्लोक ३९ व ४३ जो इस लेख के साथ अर्थों सहित संलग्न है। पुष्टि हेतु पढें व स्वयं विचार करें।
1.5 धर्म से सम्बन्धितः
क्रमशः ......................
इसके पूर्व के लेख में हमने सनातन धर्म के सरवोच्च पवित्र ग्रथ वेदों के बारें में यह जाना कि उनके ज्ञान को यथायोग्य समझने के लिए किस प्रकार के ज्ञान की आवश्यकता है।
आइए अब हम जानते हैं कि वेदों की शिक्षाऍ क्या हैं।
वैसे तो ईश्वरीय वेद अनंत ज्ञान का भण्डार हैं जिन पर उनकी उत्पत्ति से ही शोध होते आए हैं जो आज भी जारी हैं। परंतु मनुष्यों को लेकर यदि देखा जाए तो भी वेद अनेक प्रकार की आज्ञाऍ देते हैं। आइए संक्षिप्त रूप से प्रारम्भ करते हैं।
वेद मनुष्यों को दो जातियों स्त्री व पुरूष व गुण‚ कर्म व ज्ञान के अनुसार चार भागों (वर्णों) ब्राह्मण‚ क्षत्रिय‚ वैश्य व शूद्र में विभाजित करते हैं।
जिसने बाल्यकाल से युवावस्था तक नियम व संयम से रहते हुए पवित्रता का पूण पालन करते हुए वेद व अन्य प्रकार के ज्ञान का अर्जन किया व तत्पश्चात समाज में उसके प्रचार प्रसार को उद्दत हुआ वह ब्राह्मण।
प्रतिदिन वेद पढना व पढाना‚ प्रतिदिन यज्ञ करना व कराना‚ दान लेना व दान देना ये ब्राह्मणों के मुख्य छः कर्तव्य हैं जिनसे वह किसी भी दशा में विमुख नही हो सकता।
जिसने बाल्यकाल से युवावस्था तक नियम व संयम से रहते हुए पवित्रता का पूण पालन करते हुए वेद व अन्य प्रकार के ज्ञान का अर्जन किया व तत्पश्चात अपने वीर स्वभाव के कारण राज्य व समाज की सुरक्षा का संकल्प लेकर दुर्जनों के हदय में भय व्याप्त करने अन्यथा उनके विनाश को उद्दत हुआ वह क्षत्रिय।
जिसने बाल्यकाल से युवावस्था तक नियम व संयम से रहते हुए पवित्रता का पूण पालन करते हुए वेद व अन्य प्रकार के ज्ञान का अर्जन किया व तत्पश्चात अपनी व्यवसायिक बुद्धि के कारण समाज व राज्य को नाना प्रकार की वस्तुओं से अवगत कराने के प्रण लिया और ईमानदारीपूर्वक इसको प्रारम्भ किया व कार्यान्यवयन किया व वैश्य।
जिसने बाल्यकाल से युवावस्था तक नियम व संयम से रहते हुए पवित्रता का पूण पालन करते हुए वेद व अन्य प्रकार के ज्ञान के अर्जन का प्रयास किया परंतु तीव्र बुद्धि न होने के कारण वह इसमें सफल न हो सका मात्र शारीरिक रूप से ही स्वयं को सबल बना सका और समाज को शारीरिक रूप से ही सेवा देने का प्रण लिया वह शूद्र (सेवा भाव वाला)।
और इन चारों वर्णों को अपना समस्त जीवन वेदों द्वारा निरधारित सोलह संस्कारों के नियमानुसार जीना होता है जो व्यक्ति की मृत्यु पर शरीर के नरमेध यज्ञ तक चलता है।
वेदों के अनुसार हमने चार वर्णों में विभक्त मनुष्यों के कार्यों के बारे में जाना व किस कार्य को करने वाले को क्या कहते हैं यह भी जाना। वेदों ने वर्णों के नियमानुसार अपना कार्य कर धर्मयुक्त जीवन जीने वालों को आर्य (श्रेष्ठ) कहा व वर्णों के नियमों के विपरीत जाकर अधर्मयुक्त कार्य कर जीवन जीने वालों को अनार्य कहा है।
क्रमश ...........
1.3 धर्म से सम्बन्धितः
क्रमशः ......................
चूॅकि भारत के समस्त पंथ वैदिक संस्कृति से निकले हैं परंतु बाद में किसी न किसी कारण से उन्होने अपनी विचारधारा का प्रचार प्रसार किया व वेदों की बहुत सी बातों का खण्डन किया विशेषतया चार्वाक‚ जैन व बौद्ध विचारधारा ने और खण्डन किया भी तो ईश्वर सत्ता व आत्मा की सत्ता को लेकर अन्यथा बहुत सी बातों में समानता है। वैसे जिसे नाद ओउम् को वेद सर्वशक्तिमान‚ सर्वव्यापक ब्रह्म के रूप में परिभाषित करता है तो वहीं ये अनीश्वरवादी विचारधाराऍ उस नाद आेउम् को सर्वशक्तिमान‚ सर्वव्यापक ब्रह्म तो नही मानती परंतु ध्यान लगाने में इसी नाद का प्रयोग करती हैं। कुल मिलाकर भारत की पूरी संस्कृति के एकीकरण इस एक नाद ओउम् की वजह से जाना जा सकता है जो किसी न किसी रूप में इस नाद से जुडी हैं।
खैर‚ अब आते हैं वैदिक संस्कृति पर चूॅकि मैं भी इधर उधर भटका और पूण शांति का अनुभव इस वेदाें की अल्पशिक्षा से प्राप्त हुआ सो अब मैं अपनी सामथ्यनुसार अध्ययन‚ मनन व श्रवण से प्राप्त ज्ञान के अनुसार इन्ही वेदों की शिक्षा को आगे बढाउंगा।
भारतीय मनीषियों द्वारा चार वेदों का नाम बताया जाता है –
ऋग्वेद‚ यर्जुवेद‚ सामवेद‚ अथर्ववेद।
इन प्रत्येक वेदों में अनेक ऋषियों ने अपने अपने ज्ञान को समाहित किया है।
जनमानस की मान्यता है कि वेद, उस एक परमेश्वर के कथन है जिसे विद्वान ब्रह्म कहते हैं और जिसका ज्ञान ऋषियों को उनके अर्न्तमन अर्थात् हदय में सुनाकर दिया गया। चूंकि वेद ईश्वर द्वारा ऋषियों को सुनाए गए ज्ञान पर आधारित है इसीलिए इसे श्रुति कहा गया है। सामान्य भाषा में वेद का अर्थ होता है ज्ञान। ऋषियों ने जब इस ज्ञान को सुनकर दूसरे ऋषियों और राजाओं को सुनाया और उन ऋषियों एवं राजाओं ने अपनी-अपनी समझ के अनुसार उसे लिपिबद्ध किया या लोगों को समझाया तो वह स्मृति ज्ञान हो गया। वेदों को छोड़कर सभी ज्ञान स्मृति के अंतर्गत आते हैं। इन वेदों के अंतिम भाग या तत्वज्ञान को उपनिषद‚ दर्शन और वेदांत कहते हैं। इसमें ईश्वर संबंधी बातों का उल्लेख मिलता है। उपनिषद या वेदांत को ही भगवान कृष्ण ने संक्षिप्त रूप में अर्जुन को कहा जिसे गीता कहते हैं। गीता वेदों का संक्षेप में सार है।
ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गंधर्ववेद और अथर्ववेद का स्थापत्यवेद ये क्रमशः चारों वेदों के उपवेद बतलाए गए हैं। > वेद के विभाग चार है: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ऋग-स्थिति, यजु-रूपांतरण, साम-गतिशील और अथर्व-जड़। ऋक को धर्म, यजुः को मोक्ष, साम को काम, अथर्व को अर्थ भी कहा जाता है। इन्ही के आधार पर धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र की रचना हुई।
विद्वानों के अनुसार मनुस्मृति व्यवस्था का ग्रंथ है जबकि वाल्मीकि रामायण, पुराण और स्मृति ग्रंथ। ये सभी भारतीय संस्कृति के इतिहास के ग्रंथ हैं। महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास जी ने कहा है कि जहां पुराणों की बातों में विरोधाभास या संशय नजर आता है या जो वेदसम्मत नहीं है, तो ऐसे में वेदों के कथन ही सर्वमान्य होंगे।
जारी .........
ओउम्।
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