Krishna Shringar
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22/10/2022
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16/06/2021
श्रीमस्तक के श्रृंगार उष्णकाल में प्रभु को धराने हेतु
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🌷अन्याश्रय समान और कोऊ अपराध नाहीं।'🌷
आश्रय का मतलब है-आधार, शरण,ठिकाना, घर।प्रभु के निजजनों को प्रभु का ही आश्रय करना चाहिए।प्रभु के घर मे रहना चाहिए।प्रभु का घर ही अपना घर है।अपना घर छोडकर किसी और के घर मे रहेंगे तो कैसे चलेगा?
एक बात ध्यान मे रखने जैसी है कि अपना मानकर अपने घर मे रहेंगे तो यह भी अन्याश्रय है।अहंकार का आश्रय है।लेकिन अपना घर न मानकर प्रभु का घर मानकर उसमें रहेंगे तो यह आश्रय है।प्रभु के घर मे रहना आश्रय है,अपने या दूसरे के घर मे रहना अन्याश्रय है।
अपने घर मे प्रभु की सेवा करने की बात कहने के बजाय प्रभु के घर मे रहकर प्रभु की सेवा करने के लिये कहना सही है।तब हर घर नंदालय है,हर घर हवेली है।घर के सभी लोग उस हवेली के सेवकगण हैं।
कितने वैष्णव यह भावना करते हैं कि वे अपने प्रभु के अपने घर मे रहते हैं?यह भावना की जाय तो अपने स्वामी,अपने प्रभु के घर मे हम उनके अपने सेवक की तरह होंगे।तब प्रभु की स्थिति,उनका स्थान,उनकी सेवा सर्वोच्च रुप मे होगी अन्यथा हम सेवक को अच्छी जगह रखेंगे और स्वामी को कहीं अल्मारी,कबाट या ऐसी जगह जो स्वामी के रहने योग्य न हो।थोडी कल्पना करें कैसा लगता है जब स्वामी,सेवक के कमरे मे तथा सेवक,स्वामी के कक्ष मे रहता हो।हो यही रहा है और यह आश्रय नहीं है।इसकी जगह स्वामी ने सेवक का आश्रय कर रखा हो ऐसा लगता है।
अहंकार माया है।अहंकार का आश्रय करना,अहंकार की सेवा करना,अहंकार को सुखी रखना माया के अधीन रहना है।माया अपने अधीनस्थ जीव को कभी सुख से नहीं रहने देती।
यह भ्रम है कि अहंकार की सेवा करने से सुख मिलेगा,दुख ही मिलताहै।यह कहना अनावश्यक है कि प्रभु की सेवा से सुख मिलता है या दुख?ये तो अभिमान छोडकर स्नेहपूर्वक भगवत्सेवा करने वाले से जाकर पूछना चाहिए।
महाप्रभुजी की आज्ञा है-अभिमान का भलीभांति परित्याग कर स्वामी के अधीन रहने की भावना करे या मै स्वामी के अधीन हूं यह विचार कर अहंकार, अभिमान त्याग दे।
संसार अहंकार को उत्तेजित करता रहताहै तब अहंकार की प्रतीति हो तब भी इसे प्रभु के अधीन ही समझना चाहिए।भले ही हमें ऐसा लगे कि हम अहंकारी हैं तब भी प्रभु के अधीन रहने से अहंकार नियंत्रण मे रहता है।
सेवक कितना ही अभिमानी हो फिर भी सेवक,सेवक ही रहता है और स्वामी, स्वामी ही रहता है।
एक खास बात है अहंकार अपने को स्वामी मानता है लेकिन उसे संसार की घटना,परिस्थिति की गुलामी करनी ही पडती है।यदि प्रभु को स्वामी मानकर चला जाय,विवेकधैर्याश्रय पूर्वक जीवन जीया जाय तो स्वतंत्रता घटित होने लगती है।
अपना घर मानकर उसमे रहें त़ो हम बंधन मे हैं।प्रभु का घर मानकर उसमें रहें तो हम मुक्त हैं।
नौकरी, व्यवसाय, रुपयापैसा,धन,कुटुंब, देहमन को अपना मानकर चलें तो बंधन है,प्रभु का है ऐसा स्वीकार कर चलें तो हृदय से बोझ हट जाता है।ये सब हृदय के बोझ क्यों लगते हैं क्योंकि ये हैं प्रभु के ही।और प्रभु की वस्तु को अपना मान लिया तो वह बोझ लगेगी ही।
कोई किसी को बेदखल करके उसके घर पर कब्जा भले जमाले मगर वह अपने खुद के घर की तरह चैन से उसमें नहीं रह पायेगा।संघर्ष की संभावना बनी रहेगी।
प्रभु के निजजन प्रभु के घर मे रहते हैं त़ो अपने ही घर मे रहते हैं।जैसे गृहस्वामी अकेला ह़ो फिर वह विवाह करले,उसकी संतानें हों तो वे सब उसके निजजन हैं और गृहस्वामी के आश्रित हैं।यह स्वाभाविक है।सभी वैष्णव ठाकुरजी के श्रीअंग से प्रकटे हैं,चिन्मयस्वरुप हैं।वे स्वामी का आश्रय करके स्वामी की सेवा करने के लिये ही हैं।ऐसे मे वे यदि स्वामी का आश्रय तथा सेवा का त्याग करके अन्य का आश्रय करते हैं तो यह अपराध ही कहा जायगा।अपराध वह जो जानबूझकर किया जाय।क्या वैष्णव को पता नहीं कि उसके स्वामी कौन हैं?
दरअसल अहंताममता के आवरण के कारण जो चिंताएं लगती हैं, पीडा सहन नहीं होती,तत्काल मुक्ति की चाह होती है ऐसे मे प्रभु के भरोसे बैठे रहना स्वीकार नहीं होता।उसकी तलाश शुरू हो जाती है जो तत्काल उसे राहत दिला दे।
यही कारण है जो पुष्टि मार्ग मे वल्लभ के विवेकधैर्याश्रय संबंधी उपदेश का इतना महत्व है क्योंकि उसीसे दृढता बढती है और अखंड आश्रय सदा बना रहताहै।
🌷 !! जै जै श्रीगोकुलेश !! 🌷
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