Ashish Singh Rajput

Ashish Singh Rajput

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संस्थापक एवं प्रमुख-भारत हिंदू परिषद-(बीएचपी)
"धर्म हिंसा तथैव च"

23/05/2026

ऊर्जावान नेतृत्व, कर्मठ कार्यशैली और संगठन के प्रति समर्पित भाव के लिए विख्यात भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद माननीय श्री Nitin Nabin जी को जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

21/05/2026

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

20/05/2026

मंदिर मुक्ति हेतु सर्वोच्च न्यायालय में पुनः शुरू होगी ऐतिहासिक सुनवाई!

भारत पर ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन काल में अंग्रेज अधिकारियों के द्वारा तमिलनाडु और बंगाल में हिन्दू मंदिरों का व्यापक सर्वेक्षण हुआ था। इस सर्वेक्षण से मालुम पड़ा कि लगभग सब हिन्दू मंदिरों में छोटा या बड़ा गुरुकुल और गौ-शाला थी। समाज अपने उत्सव जैसे नवरात्री और दीपावली इत्यादि मिलकर मंदिरों में मनाता था। परिवारों के शादी, मुंडन, शोकसभा जैसे सब कार्यक्रम भी मंदिरों में होते थे। समाज के झगड़े भी मंदिर में गर्भगृह की साक्षी में समाज के वरिष्ठ लोगों द्वारा निपटाएं जाते थे।

अंग्रेजों ने समझ लिया कि हिन्दू धर्म के प्राण मंदिरों में बसते हैं। अंग्रेज सरकारों ने मंदिरों का प्रबंधन सुशासन के नाम पर अपने हाथों में ले लिया। धीरे-धीरे अब मंदिर केवल व्यक्तिगत पूजा के स्थान बन रहे हैं। इससे हिन्दू धर्म कमजोर हो रहा है।

सरकार गुरुद्वारे, चर्च, मस्जिद, जैन-स्थानक और बौद्ध-विहार नहीं चलाती। भारत का शासन संविधान की मर्यादा में धर्मनिरपेक्ष है। फिर भी अनेक राज्यों में सरकारें हिन्दू मंदिरों को अपने मुट्ठी में क्यों दबाये हुए हैं। मंदिरों के चढ़ावे का एक बड़ा हिस्सा सरकारी खजाने में जाता है। मंदिरों में सरकार के ऑफिसर कार्यकारी अधिकारी के नाते लगा दिए जाते है और उनका वेतन और भत्ते मंदिर की आय में से लिए जाते है। मंदिरों और मठों का नियंत्रण मठाधिपति या धार्मिक संत इत्यादि के हाथों में न रहकर इन बाबुओं के हाथ में रहता है।

हिन्दू समाज ने निर्णय किया है कि वह अपने मंदिरों का नियंत्रण सरकार के हाथों से वापस लेगा। समाज ने यह भी निर्णय किया कि हिन्दू मंदिरों का पैसा हिन्दुओं के लिए ही खर्च होना चाहिए।

इस उद्देश्य से पूज्य स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सन 2012 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय में याचिका डाल कर कहा कि सरकार हिन्दू मंदिरों का सञ्चालन वापिस हिन्दू समाज को सौंपें। यह याचिका मुख्य रूप से तमिलनाडु, आंध्र, तेलंगाना और पुडुचेरी के सन्दर्भ में लगायी गयी थी। इसमें सरकारों को नोटिस हुआ और उनका जवाब रिकॉर्ड पर आया। कई बार इस याचिका में बहस के लिए तारीख निश्चित हुई पर किसी न किसी कारण से टलती गयी।

अंततः अप्रैल 2025 को यह मामला न्यायालय के समक्ष रखा गया। प्रतिपक्षी वकीलों ने कहा कि इस याचिका में कई राज्यों के कानूनों को चुनौती दी गयी है। यह सब कानून एक जैसे नहीं हैं। मांग की गयी कि सर्वोच्च न्यायालय इस याचिका को ख़ारिज करके याचिकाकर्ताओं को अपने-अपने राज्य में इन कानूनों को चुनौती देने की छूट दे दें। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करके 13 साल से लंबित यह याचिका ख़ारिज कर दी।

याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से याचिका को ख़ारिज करने के निर्णय पर पुनर्विचार याचिका करने का आग्रह किया। इस प्रक्रिया में समय लगा। याचिका पर सुनवाई के बाद कोर्ट ने सोमवार 18 मई 2026 के आदेश में यह स्वीकार किया कि इस याचिका को गुण-दोष के आधार पर सुना जाना आवश्यक है। कोर्ट ने अप्रैल 2025 के उस आदेश को वापस ले लिया जिसके द्वारा इस याचिका को ख़ारिज कर दिया गया था।

अब यह विषय जुलाई में सुनवाई के लिए नियत किया गया है। हिन्दू अपने मंदिरों का स्वयं सञ्चालन करें और मंदिरों पर सरकार का नियंत्रण पूरी तरह समाप्त हो। हिन्दुओं का पैसा हिन्दुओं के काम में आये। हिन्दू मंदिर स्वाधीन होने पर हिन्दू का संगठन, उसकी तेजस्विता और संस्कार युक्त जीवन पुनः अपने समाज को प्राप्त हो। मुकदमे में तथ्य और तर्क हमारे साथ हैं। श्री भगवान के आशीर्वाद से हम न्यायालय में सफल होंगे।

20/05/2026

प्रेस वक्तव्य:
सड़कों पर नमाज - नमाज़ नहीं फ़साद है; यह शक्ति प्रदर्शन बंद हो-बीएचपी

नई दिल्ली। मई 20, 2026। भारत हिंदू परिषद-(बीएचपी) के प्रमुख श्री आशीष सिंह ने आज कहा है कि सड़कों पर नमाज, नमाज नहीं फसाद है। यह केवल संविधान विरोधी ही नहीं है अपितु, मानवता और इस्लाम विरोधी भी है। इसके दुष्परिणामों को देखते हुए ही सात उच्च न्यायालयों ने सड़कों पर नमाज रोकने के आदेश दिए थे। माननीय सर्वोच्च न्यायालय भी ऐसे संकेत दे चुकी है। इसका अर्थ है सड़क पर नमाज पढ़ने की जिद न्यायपालिका की अवमानना भी है।

उन्होंने कहा कि यह केवल 5 मिनट का मामला नहीं है। दिल्ली के सभी महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशनों पर घंटे ट्रेन बाधित हो जाती थी, जब पटरियों पर बैठकर नमाज पढ़ी जाती थी। गुरुग्राम से गुजरने वाले जयपुर हाईवे पर 8-8 घंटे ट्रैफिक जाम होता था। स्कूल बसें जाम में फंस जाती थी। मासूम बच्चे बिलखते रहते थे। एंबुलेंस के फंसने के कारण मरीजों की जान पर भी बन जाती थी लेकिन, किसी नमाज़ी का दिल नहीं पिघलता था।

श्री आशीष सिंह राजपूत ने कहा कि कई हदीसों में भी सड़क पर नमाज पढ़ने के लिए मना किया है। इसलिए कई मुस्लिम देशों में भी इस पर प्रतिबंध है। किसी भी सभ्य समाज में इसको अनुमति नहीं दी जा सकती।

उन्होंने पूछा कि भारत में वे यह जिद क्यों करना चाहते हैं? वे कहते हैं कि हमें मस्जिदों में जगह नहीं मिलती तो हम सड़क पर उतरते हैं। जब गुरुग्राम में 38 जगह सड़के रोक कर नमाज पढ़ी जाती थी तब, समाज को गुस्सा आया और इसे रोकने के लिए आंदोलन हुए। उस समय पत्रकार बंधुओं ने दिखाया था कि गुरुग्राम से 40 किलोमीटर दूर से ट्रकों में चटाइयां लाई जा रही हैं, लोग लाए जा रहे हैं। रास्ते में पड़ने वाली बीसियों मस्जिदें खाली रहती थीं। इससे स्पष्ट है कि यह तर्क केवल धोखा देने की कोशिश के अलावा कुछ नहीं है। वास्तव में तो यह एक शक्ति प्रदर्शन है। वे प्रशासन और हिंदू समाज को अपना संख्या बल दिखाकर आतंकित करना चाहते हैं। यह आतंकवाद का ही एक प्रकार है।

भारत हिंदू परिषद-(बीएचपी) सभी राज्य सरकारों से अपील करती है कि वे सख्ती से सड़कों पर नमाज पढ़ने पर रोक लगा न्यायपालिका और संविधान का पालन करने के लिए सबको प्रेरित करें। किसी भी तरह से सड़क पर नमाज पढ़ने की अनुमति नहीं दी जा सकती। मुल्ला - मौलवियों को भी चाहिए कि वे मुस्लिम समाज को कानून का पालन करने की प्रेरणा दें, ना कि उन्हें आतंकवाद के एक और मार्ग पर धकेलें।
जारीकर्ता:
आशीष सिंह राजपूत
प्रमुख
भारत हिंदू परिषद-(बीएचपी)

18/05/2026
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