Naturovedic Foundation

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Naturovedic Foundation, dedicated to the revival and propagation of ancient wisdom and holistic well-being.

07/02/2026

सुबह की 5 ऐसी आदतें जो सभी के स्वास्थ्य के लिए जरुरी हैं।

"As a Neuroscientist, I Quit These 5 Morning Habits That Destroy Your Brain" नामक एक लेख में बताया गया है कि सुबह उठकर कुछ सामान्य मगर हानिकारक आदतें आपके दिमाग पर नकारात्मक असर डाल सकती हैं और इन्हें बदलने से आपका फोकस, मूड और दिमागी शक्ति बेहतर हो सकती है।

1- सबसे पहले फोन चेक करना।

सुबह उठते ही फोन खोलना दिमाग को तुरंत ही प्रतिक्रियाशील (reactive) बना देता है, जिससे ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो जाता है। दिमाग को शांत अवस्था में रखने के लिए थोड़ा इंतजार करें।

2- सुबह की रोशनी न लेना।

प्राकृतिक सुबह की रोशनी हमारे दिमाग के आंतरिक घड़ी (circadian rhythm) को सेट करती है। इससे मूड, फोकस और रात की नींद सभी बेहतर होते हैं।

3- कॉफी पहले, पानी बाद में पीना।

नींद के बाद हमारा शरीर थोड़ा डिहाइड्रेटेड होता है। सीधे कैफीन लेने से तनाव हार्मोन (cortisol) बढ़ सकता है। पहले एक गिलास पानी पिएँ, फिर कॉफी लें।

4- सुबह दिमाग को सक्रिय न करना (जैसे बिना सोचे-समझे न्यूज़/सोशल मीडिया स्क्रॉल करना।)

बिना उद्देश्य के फोन स्क्रॉल करना दिमागी तनाव और चिंता बढ़ा सकता है और फोकस को कमजोर कर सकता है। कुछ शांत गतिविधि पहले करें, जैसे गहरी साँसें या थोड़ी स्ट्रेचिंग।

5- सोचना/योजना न बनाना।

बिना दिन की योजना बनाए सीधे भागना दिमाग को अनियमित और प्रतिक्रियाशील बनाता है। कुछ समय निकालकर दिन की प्राथमिकताओं को सोचें और दिमाग को दिशा दें।

यह सलाह कई एक्सपर्ट भी देते हैं कि उद्देश्यपूर्ण शुरुआत से दिमागी क्षमता बढ़ती है।

01/01/2026

एक राजा को राज भोगते हुए काफी समय हो गया था। बाल भी सफ़ेद होने लगे थे। एक दिन उसने अपने दरबार में एक उत्सव रखा और अपने गुरुदेव एवं मित्र देश के राजाओं को भी सादर आमन्त्रित किया। उत्सव को रोचक बनाने के लिए राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी को भी बुलाया गया।

राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्रायें अपने गुरु जी को भी दीं, ताकि यदि वे चाहें तो नर्तकी के अच्छे गीत व नृत्य पर वे उसे पुरस्कृत कर सकें। सारी रात नृत्य चलता रहा। ब्रह्म मुहूर्त की बेला आई। नर्तकी ने देखा कि मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है, उसको जगाने के लिए नर्तकी ने एक दोहा पढ़ा-

"बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिताय।
एक पलक के कारने, क्यों कलंक लग जाय।"

अब इस दोहे का अलग-अलग व्यक्तियों ने अपने अनुरुप अलग-अलग अर्थ निकाला। तबले वाला सतर्क होकर बजाने लगा। जब यह बात गुरु जी ने सुनी तो उन्होंने सारी मोहरें उस नर्तकी के सामने फेंक दीं।

वही दोहा नर्तकी ने फिर पढ़ा तो राजा की लड़की ने अपना नवलखा हार नर्तकी को भेंट कर दिया।

उसने फिर वही दोहा दोहराया तो राजा के पुत्र युवराज ने अपना मुकट उतारकर नर्तकी को समर्पित कर दिया।

नर्तकी फिर वही दोहा दोहराने लगी तो राजा ने कहा-

"बस कर, एक दोहे से तुमने वैश्या होकर भी सबको लूट लिया है।"

जब यह बात राजा के गुरु ने सुनी तो गुरु के नेत्रों में आँसू आ गए और गुरु जी कहने लगे-

"राजा! इसको तू वेश्या मत कह, ये तो अब मेरी गुरु बन गयी है। इसने मेरी आँखें खोल दी हैं। यह कह रही है कि मैं सारी उम्र संयमपूर्वक भक्ति करता रहा और आखिरी समय में नर्तकी का मुज़रा देखकर अपनी साधना नष्ट करने यहाँ चला आया हूँ, भाई! मैं तो चला।"

यह कहकर गुरु जी तो अपना कमण्डल उठाकर जंगल की ओर चल पड़े।

राजा की लड़की ने कहा- "पिता जी! मैं जवान हो गई हूँ। आप आँखें बन्द किए बैठे हैं। मेरी शादी नहीं कर रहे थे और आज रात मैंने आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद कर लेना था। लेकिन इस नर्तकी ने मुझे सुमति दी है कि जल्दबाजी मत कर। कभी तो तेरी शादी होगी ही। क्यों अपने पिता को कलंकित करने पर तुली है?"

युवराज ने कहा - "पिता जी! आप वृद्ध हो चले हैं, फिर भी मुझे राज नहीं दे रहे थे। मैं आज रात ही आपके सिपाहियों से मिलकर आपका कत्ल करवा देता। लेकिन इस नर्तकी ने समझाया कि पगले! आज नहीं तो कल आखिर राज तो तुम्हें ही मिलना है, क्यों अपने पिता के खून का कलंक अपने सिर पर लेता है। धैर्य रख।"

जब ये सब बातें राजा ने सुनी तो राजा को भी आत्म ज्ञान हो गया। राजा के मन में वैराग्य आ गया। राजा ने तुरन्त फैसला लिया - "क्यों न मैं अभी युवराज का राजतिलक कर दूँ।"

फिर क्या था, उसी समय राजा ने युवराज का राजतिलक किया और अपनी पुत्री को कहा - "पुत्री! दरबार में एक से एक राजकुमार आये हुए हैं। तुम अपनी इच्छा से किसी भी राजकुमार के गले में वरमाला डालकर पति रुप में चुन सकती हो।"

राजकुमारी ने ऐसा ही किया और राजा सब त्याग कर जंगल में गुरु की शरण में चला गया।

यह सब देखकर नर्तकी ने सोचा - "मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए, लेकिन मैं क्यूँ नहीं सुधर पायी?" उसी समय नर्तकी में भी वैराग्य आ गया। उसने उसी समय निर्णय लिया कि आज से मैं अपना बुरा धंधा बन्द करती हूँ और कहा कि "हे प्रभु! मेरे पापों से मुझे क्षमा करना। बस, आज से मैं सिर्फ तेरा नाम सुमिरन करुँगी।"

समझ आने की बात है। दुनिया बदलते देर नहीं लगती। एक दोहे की दो लाईनों से भी हृदय परिवर्तन हो सकता है। बस, केवल थोड़ा धैर्य रखकर चिन्तन करने की आवश्यकता है।

प्रशंसा से पिघलना नहीं चाहिए, आलोचना से उबलना नहीं चाहिए। नि:स्वार्थ भाव से कर्म करते रहें। क्योंकि इस धरा का, इस धरा पर, सब धरा रह जाएगा।

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#नेचुरोवैदिकफाउंडेशन

28/12/2025

प्राणायाम -

"एकाक्षरं परं ब्रह्म, प्राणायामाः परं तपः।" – मनुस्मृति २.८३

एक अक्षर (ॐ) ही (ब्रह्म प्राप्ति का साधन होने से) सर्वश्रेष्ठ है, तीन प्राणायाम ही (चान्द्रायण आदि व्रतों से भी) श्रेष्ठ तप है।

प्राण + आयाम =

प्राण (प्र + अन् + अच्) = श्वास, जीवनशक्ति, जीवनदायी वायु अर्थात् वायु या प्राणवायु, अन्दर खींचा हुआ साँस, ऊर्जा, बल, शक्ति, सामर्थ्य, परमात्मा, ब्रह्म, ज्ञानेन्द्रिय, जीव या आत्मा आदि।

आयाम (आ+यम्) = प्रसार, विस्तार, फैलाना, विस्तार करना, निग्रह, नियंत्रण, रोकथाम आदि।

अतः प्राणायाम का अर्थ हुआ अन्दर खींचे हुए प्राणवायु को प्रसार या विस्तार देना अर्थात् प्राण (श्वास) का आयाम (नियंत्रण)।

ऐतरेयोपनिषद् १.४ में इंद्रिय और इंद्रिय अधिष्ठाता देवताओं की उत्पत्ति के संदर्भ में आया है: "नासिकाभ्यां प्राणः प्राणाद्वायुरक्षिणी।" अर्थात् नासिकारंध्र प्रकट हुए, नासिकारंध्रों से ‘प्राण’ हुआ और प्राण से वायु।

तदाहुर्यदयमेक इवैव पवतेऽथ कथमध्यर्ध इति यदस्मिन्निदं सर्वमध्यार्ध्नोत्तेनाध्यर्ध इति कतम एको देव इति प्राण इति स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते॥
– बृहदारण्यक उपनिषद् ३.९.९

शाकल्य ने प्रश्न किया – कहते हैं जो वायु है, एक सा ही बहता है, फिर अध्यर्ध (डेढ़) किस प्रकार है?

याज्ञवल्क्य: क्योंकि इसी में यह सब ऋद्धि (वृद्धि) को प्राप्त होता है।

शाकल्य ने पुनः प्रश्न किया – एक देव कौन है?

याज्ञवल्क्य : प्राण ही एक देवता है, वह ब्रह्म है, उसी को ‘तत्’ (वह) कहते हैं।

प्राणों की इन सभी विशिष्टताओं को ध्यान में रख कर ही ऋषि ने भाव विभोर हो कर यह प्रार्थना की है–

नसोर्मे प्राणोऽस्तु। – पारस्कर गृह्यसूत्र २.३.२५

हे ईश्वर! मेरी नासिका में सदा प्राणों की अवस्थिति रहे।

प्राणायाम के तीन भेद हैं – 1. पूरक (श्वास को भीतर ले जाकर फेफड़े को भरना) 2. कुम्भक (श्वास को भीतर रोकना) और 3. रेचक (श्वास को बाहर निकालना)।

यथा पर्वतधातुनां दोषान् हरति पावकः।
एवमन्तर्गतं पापं प्राणायामेन दह्यते ॥

जिस प्रकार पर्वत से निकले धातुओं का मल अग्नि से जल जाता है, उसी प्रकार प्राणायाम से आंतरिक पाप जल जाता है।

आधुनिक विज्ञान के अनुसार इसकी व्याख्या:

आधुनिक विज्ञान के अनुसार विशाल से विशालतम शरीर क्षुद्र से क्षुद्रतम कोशिकाओं से निर्मित है। यह ऐसा ही है जैसे मधुमक्खी का छत्ता। इन कोशिकाओं का आकार अत्यंत सूक्ष्म होता है। जैसे तर्कुरूपी पेशी-कोशिका 60 से 100 माइक्रॉन तक लंबी होती है।

इन कोशिकाओं को ऊर्जा प्राप्ति हेतु ग्लूकोज के विखण्डन के लिये प्रतिक्षण प्राण या प्राणवायु की आवश्यकता होती है। सोते समय स्थिर दिखने वाली पेशी कोशिकाएँ (muscular cells) भी भूख, प्यास से बेहाल होकर ऊष्मा ऊर्जा की प्राप्ति के लिए लगातार खाती, साँस लेती तथा मल उत्सर्जन करती हैं। इस प्रकार विश्व के प्रत्येक प्राणी की प्रत्येक कोशिका को जिस चीज की प्रतिक्षण समान रूप से आवश्यकता है, वह है– प्राण।

एक कोशकीय अमीबा (amoeba) जैसे प्राणी को इसे ग्रहण करने में बड़ी सुविधा है। वह अपने चारों ओर से कहीं से भी इसे परासरण (osmosis) क्रिया द्वारा इसे प्राप्त कर सकता है तथा विसरण (diffusion) द्वारा अपशिष्ट पदार्थ बाहर निकल सकता है।

किन्तु हमारे शरीर में कोशिकाओं का समूह किसी विशाल बस्ती के सदृश है जहाँ स्वच्छ वायु तथा जल के लिए अलग और अपशिष्ट पदार्थों के लिए अलग व्यवस्था होती है। जहाँ पोषक आहार ग्लूकोज आदि को ‘रक्तरस’ (plasma) के रूप में नालियों द्वारा भेजा जाता है। किन्तु प्राण वायु का इस रक्तरस में विलयन बहुत कम हो पता है। अतः इसके लिए उभयावतल डिस्क जैसी या चकती जैसी रक्त-कणिकाएँ (red blood corpuscles) रूपी छोटे-छोटे डिब्बों में बंद करके इसी रक्त में तैराकर धमनी (artery) धमनिका (arteriole) तथा केशिकाओं (capillary) रूपी बंद नालियों के द्वारा तैराकर अंतिम छोर की कोशिकाओं तक पहुँचाया जाता है।

इन नलिकाओं तथा कणिकाओं की लघुता अत्यंत विस्मयजनक है। धमनिका का व्यास लगभग 0.01 मिलीमीटर या 10 माइक्रॉन (एक मिलीमीटर का सौवाँ भाग) तक होता है। इसके अंदर लगभग 0.007 मिलीमीटर या 7-8 माइक्रॉन व्यास की रक्त-कणिकाएँ अपने डिब्बे में प्राणवायु को लेकर तैरती हैं।

इनकी लघुता का अनुमान आप ऐसे लगा सकते हैं कि एक घन मिलीमीटर रक्त में इन कोशिकाओं की संख्या लगभग 50 लाख होती है। अर्थात् यदि शरीर में 3 लीटर रक्त है तो इसमें 15 खरब कणिकाएँ समाती हैं जिन्हें प्राण फेफड़ों से मिलता है और इन्हें पूरे शरीर में पहुँचाने के लिए हृदय को जीवन भर निरन्तर प्रति मिनट औसतन 70 बार आकुंचन करते हुए प्रति आकुंचनों के बीच 0.4 सेकेण्ड का समय विश्राम के नाम पर मिलता है।

फेफड़े में सामान्यतः 300 से 400 करोड़ वायुकोष्ठक (alveoli) होते हैं। इनके चारों ओर रक्तकोशिकाओं का अत्यंत घना जाल बिछा रहता है। इन वायुकोष्ठकों से ऑक्सीजन का रुधिर में तथा रुधिर की कार्बन डाइ ऑक्साइड का वायुकोष्ठकों में विसरण होता रहता है।

सामान्य श्वास-प्रश्वास के समय बहुत कम वायुकोष्ठक ही वायु से भरते हैं जो सामान्य चर्या के लिए तो ठीक है किन्तु प्राणायाम के उपाय से रुधिर को अधिकतम ऑक्सीजन उपलब्ध होती है तथा इसकी अधिकतम मलिनता दूर होती है। इससे रुधिर का रंग अतिस्वच्छ लाल हो जाता है तथा यह शरीर की प्रत्येक कोशिका को अधिकतम ऊर्जा प्रदान करने में सक्षम हो जाता है।

निष्कर्ष:

शास्त्रों के अनुसार विचार करें अथवा आधुनिक विज्ञान के अनुसार, उपरोक्त तथ्यों से इस बात की पुष्टि होती है कि प्राणायाम करने से शरीर को ‘प्राण’ के रूप में अतिरिक्त ऊर्जा का लाभ मिलता है जिससे लंबी आयु भी मिलती है। शास्त्रों में तो यहाँ तक कहा गया है कि प्राणायाम करने से पाप-ताप तो जल ही जाते हैं, शारीरिक उन्नति भी अद्भुत ढंग से होती है। हजारों वर्ष की लंबी आयु भी इससे मिल सकती है। सुन्दरता और स्वास्थ्य के लिए तो यह मानो वरदान ही है।

गच्छंस्तिष्ठन् सदा कालं वायुस्वीकरणं परम् ।
सर्वकालप्रयोगेण सहस्रायुर्भवेन्नरः॥

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#नेचुरोवैदिकफाउंडेशन

04/12/2025

सुख-दुख किसे कहते है और उनसे निवृत्ति कैसे हो?

वास्तव में सुख-दुख हैं नहीं। सब इस बात पर निर्भर है कि हम कहाँ हैं, किस ओर और भावदशा में हैं। जो जैसा है उसे वैसा ही देख पाएँ तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों।

वैसे आम भाषा में सुख और दुःख है क्या? कुछ भी हमारे मन के अनुकूल हो जाए तो सुख हो गया और मन के विरुद्ध हो गया तो दुख हो गया। बाकी कुछ है नहीं सुख-दुख। यह सब हमारे बनाए हुए हैं।

चलिए इसे समझाने के लिए एक छोटी सी कहानी सुनाता हूँ। एक कुम्हार था उसकी दो लड़कियाँं थीं। उन दोनों का पास के ही गाँव में विवाह कर दिया था।

एक लड़की के यहाँ खेती का काम था और दूसरी के यहाँ मिट्टी के बर्तन बनाने का काम-धंधा था।

एक दिन कुम्हार लड़कियों से मिलने के लिए गया। पूछा, "बेटी क्या ढंग है? पिता जी खेती सूख रही है। अगर पाँच-दस दिनों में वर्षा नहीं हुई तो फिर कुछ नहीं होगा।

वहाँ से वह दूसरी लड़की के यहाँ गया और पूछा तो वह कहने लगी पिता जी बर्तन बनाकर सूखने के लिए रखे हैं अगर पाँच-दस दिनों में वर्षा हो गई तो सब मिट्टी हो जाएगा।

अब राम जी क्या करें तो क्या करें बताओ? एक के यहाँ वर्षा होने से सुख और दूसरे के यहाँ वर्षा होने से दुख है। जिसके यहाँ वर्षा होने से सुख है उसको वर्षा न होने से दुख है।

तो समझ आ गया होगा कि दरअसल, यह सुख-दुख क्या है। सब मन के भाव हैं। अपने बनाए हुए हैं। जबकि वर्षा हो जाए अथवा वर्षा न हो यह हमारे हाथ में तो है नहीं। फिर क्यों सुखी-दुखी होना। जो हो जाए उसमें प्रसन्न रहो। जो होना होगा वह होकर रहेगा।

लेकिन, इतनी सी बात समझने में भी या इस भाव दशा में आने में भी इंसान पूरा जीवन लगाकर भी नहीं आ पाता। महादेव 🙏🏻

#नेचुरोवैदिकफाउंडेशन

10/11/2025

NATURO VEDIC FOUNDATION

(ट्रस्ट: नेचुरोवैदिक फाउंडेशन- सनातन, संस्कृति, आध्यात्म और प्रकृति के संरक्षण और प्रसार का अखिल भारतीय संगठन)

नेचुरोवेदिक फाउंडेशन, प्राचीन ज्ञान और समग्र कल्याण के लिए समर्पित अखिल भारतीय संस्था है।

हम प्रकृति और मानव स्वास्थ्य के बीच गहन तालमेल में विश्वास करते हैं। हमारा मिशन एक ऐसी जीवनशैली को बढ़ावा देना है जो शरीर, मन और आत्मा में सामंजस्य स्थापित करे।

आप हमें QR कोड स्कैन कर या अकॉउंट के जरिए सहयोग कर सकते हैं।

(Naturovedic Foundation, dedicated to the revival and propagation of ancient wisdom and holistic well-being.

We believe in the profound synergy between nature and human health, our mission is to promote a lifestyle that harmonizes Body, Mind, and Soul.)

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07/11/2025

हमारे पूर्वजों ने भोजन के बारे में कुछ खास कहा था। जो अपने आप में स्वस्थ्य रहने की सम्पूर्ण कीमिया समेटे हुए था। जिस आज हम सबने भूला दिया, परिणाम स्वरूप लोग अनेकों स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहें हैं।

1. अजीर्ण भोजनं विष!

यदि पहले खाया गया भोजन पचता नहीं है, तो बाद में खाया गया भोजन विषैला होता है। जब तक बहुत भूख न लगे, तब तक कुछ न खाएँ।

2. अर्धरोघारि निद्रा!

अच्छी नींद आधी बीमारी दूर कर देती है।

3. मूधगधल्ली गढ़व्यालि!

सभी दालों में मूंग सर्वोत्तम है। इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत बढ़ती है। अन्य दालों में एक या एक से अधिक दोष होते हैं।

4. बागनास्थि संधानकरो रसोना!

लहसुन खाने से हड्डियाँ जुड़ जाती हैं।

5. अति सर्व वराजयेत्!

किसी भी चीज़ का अधिक मात्रा में सेवन करने से बचना चाहिए।

6. नष्टिमूलं अनौषधं!

ऐसी कोई भी सब्जी नहीं है जिसमें औषधीय गुण न हों। सभी सब्जियों में औषधीय गुण होते हैं।

7. नाम वैद्य: प्रभुरायुषा:!

कोई भी डॉक्टर आपकी आयु नहीं बढ़ा सकता। डॉक्टरों की अपनी सीमाएँ होती हैं।

8. चिंता व्याधि प्रकाश्य!

चिंता स्वास्थ्य की शत्रु है।

9. व्यायामाच्च शनैः शनैः!

व्यायाम करते समय, ज़ोर-ज़ोर से अभ्यास नहीं करना चाहिए, हृदय गति बहुत ज़्यादा नहीं बढ़नी चाहिए। उच्च तीव्रता वाला व्यायाम आयु को कम करता है।

10. अजवथ चर्वणं कुरयात्!

भोजन को बकरी की तरह चबाते हुए खाना चाहिए। इसे देर तक चबाएँ क्योंकि लार पाचन में सहायक होती है।

11. स्नानं नाम मनःप्रसाधनकरं धुस्वपनं विध्वसनम्!

स्नान करने के बाद अवसाद दूर होता है। मानसिक और शारीरिक थकान दूर होती है।

12. न स्नानं आचरेथ भुक्तव!

खाने के बाद कभी न नहाएँ। इसका पाचन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

13. नास्ति मेघसमं थोयम!

वर्षा जल जैसी पवित्रता किसी अन्य जल में नहीं है।

14. अजीर्णे भेषजं वारि!

अपच होने पर, केवल भरपूर पानी पीने से ही अच्छा लाभ होता है।

15. सर्वत्र पोषणं सस्थमा सेवकं पुरथनाम्!

केवल ताज़ा भोजन ही ग्रहण करना चाहिए। पुराने चावल और पुराने नौकरों को हमेशा बदलते रहना चाहिए। (नौकरों को काम से नहीं निकालना चाहिए। उनकी नौकरी बदल देनी चाहिए।)

16. नित्यं सर्व रसभ्यस!

भोजन में मधुर, तीक्ष्ण, कड़वे, खट्टे और कसैले पदार्थ होने चाहिए।

17. जटारं पुरयेधरधामं अन्नाहि!

आमाशय में आधा भोजन ठोस, आधा तरल और शेष खाली होना चाहिए।

आयुर्वेद अपनाएँ स्वस्थ जीवन पाएँ!

#अंतर्मन

27/08/2025

सर्वविघ्नविनाशाय सर्वकल्याणहेतवे।
पार्वतीप्रियपुत्राय गणेशाय नमो नमः॥

गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर आप सभी को ढेरों शुभकामनाएँ।

विघ्नहर्ता गणपति बप्पा! हम सभी के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सौभाग्य का परम संचार करें तथा हर कार्य में सफलता और उन्नति प्रदान करें।

गणपति बप्पा मोरया!

18/07/2025

मानव चेतना के तीन तल हैं और सबका उपयोग है। इनका विभाजन वर्टिकल नहीं, हॉरिजेंटल किया गया था।

शिखर अनुभव के लिए मानव के तल से ऊपर जाना होगा, देव योनि ग्रहण करनी होगी जो कि अति विरल है, या फिर मानव के तल से एक सीढ़ी उतरना होगा, अपने पशु को, अपनी प्राइमल इंस्टिंक्ट को उन्मुक्त करना होगा।

भारत में एक गलती हो गई। पढ़ाया, समझाया गया कि देव तल पर जाना है और साधारण व्यक्ति, सुख की तलाश में, हर बार पहुँचा पशु के तल पर।

हर पतन के बाद अधिकांश व्यक्तियों को कृत्य से भी वितृष्णा हुई और कर्ता से भी। इसीलिए पति, पत्नी में अधिकांशतः बनी नहीं, क्योंकि जो पशुवत आचरण में ले जाए, उसका सम्मान कैसे करें!

समझने की जरूरत यह थी और है कि पशु, मनुष्य और देव, तीनों एक ही व्यक्तित्व के भाग हैं। हेड सिक्के का एक चेहरा है तो टेल है दूसरा चेहरा।

जो सीढ़ियाँ नीचे ले जाती हैं, वही ऊपर भी ले जा सकती हैं।

आवश्यकता अपनी ऐन्द्रिकता से चिहुँकने या भयभीत होने की नहीं, उसे सहज भाव से स्वीकार करने की है। यही स्वास्थ्यकर होगा।

#नेचुरोवैदिक_फाउंडेशन

17/07/2025

"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे, सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥"

महामृत्युंजय मंत्र भगवान शिव को समर्पित है। इसका अर्थ है, "हम त्रिनेत्रधारी, सुगंधित और पुष्टि को बढ़ाने वाले भगवान की पूजा करते हैं। जैसे फल सरलता से बेल से अलग हो जाता है, वैसे ही हम भी मृत्यु और अमृतत्व से मुक्त हो जाएँ।"

महामृत्युंजय मंत्र को बहुत शक्तिशाली माना जाता है। इसका जाप मृत्यु के भय को दूर करने, आयु, स्वास्थ्य और मानसिक शक्ति में वृद्धि करने के लिए किया जाता है।

30/03/2025

आप सभी को हिन्दू नव वर्ष विक्रम संवत 2082 एवं चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएँ।

यह नव वर्ष आपके जीवन में सुख, समृद्धि, शांति और आरोग्य लेकर आए। माँ जगतजननी जगदम्बा की कृपा से आपके सभी कार्य सिद्ध हों और हर दिन खुशियों से भरा हो।

चैत्र नवरात्रि का यह पावन समय शक्ति, भक्ति और साधना का प्रतीक है। इन नौ दिनों में माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना कर हम अपने जीवन में सकारात्मकता, आत्मविश्वास और सफलता प्राप्त कर सकते हैं। यह पर्व हमें आत्मचिंतन और नए संकल्प लेने की प्रेरणा देता है।

इस नव वर्ष पर कुछ सकारात्मक संकल्प लें:

✅ *अपने स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखें* – योग, ध्यान और सात्त्विक आहार को अपनाएँ।

✅ *अपने कार्यों में निष्ठा और अनुशासन बनाए रखें* ताकि सफलता सुनिश्चित हो।

✅ *परिवार और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का पूर्ण रूप से निर्वहन करें।*

✅ *अपने विचारों में सकारात्मकता लाएँ और हर परिस्थिति में धैर्य बनाए रखें।*

नव वर्ष का यह शुभारंभ आपके जीवन में नई ऊर्जा, नई उम्मीदें और नए अवसर लेकर आए।

🙏 जय माता दी! 🙏

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