VEDIC Science

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20/04/2026

श्री सूर्यदेव एवम उनके सात दिव्य अश्वों की अद्भुत गाथा 🌞

कृपया पोस्ट पूरी पढ़े।

वेदों में सूर्य न केवल एक खगोलीय पिंड है किन्तु सर्वोच्च चेतना तथा ऊर्जा का प्रतीक है।

सात घोड़ों के नाम संस्कृत छंद के सात छंदों के नाम पर रखे गए हैं:
गायत्री,
बृहती,
उष्णी,
जगती,
त्रिष्टुभा,
अनुष्टुभा
तथा पंक्ति।

यदि आप आधुनिक वैज्ञानिक व्याख्या पर विचार करते हैं, तो आप कह सकते हैं कि सूर्य देव द्वारा उत्सर्जित श्वेत प्रकाश में श्वेत प्रकाश के घटक रंगों में से 7 (सात) घटक सम्मिलित हैं।

अर्थात्: बैंगनी, इंडिगो, नीला, हरा, पीला, नारंगी तथा लाल।

🌈 सात रंग और सात चक्रों का सुंदर सामंजस्य :
सूर्य का प्रकाश जब जल या प्रिज़्म के माध्यम से गुजरता है, तो वह सात रंगों में विभाजित हो जाता है, इन सात रंगों का केवल भौतिक या वैज्ञानिक महत्व नहीं है, किन्तु इनका आध्यात्मिक तथा योगशास्त्र में गहरा स्थान है।
योग दर्शन के अनुसार, शरीर में सात चक्र होते हैं जो ऊर्जा संतुलन का कार्य करते हैं।
ये सातों चक्र इंद्रधनुष के सात रंगों से जुड़े होते हैं, जैसे सूर्यप्रकाश के रंग।

🔴 मूलाधार चक्र (Root Chakra) — लाल रंग से जुड़ा होता है, जो पृथ्वी तत्व और अस्तित्व की जड़ से संबंधित है। यह हमारे जीवन की नींव और सुरक्षा का केंद्र है।

🟠 स्वाधिष्ठान चक्र (Sacral Chakra) — नारंगी रंग से जुड़ा है और यह रचनात्मकता, कामना और भावनाओं को नियंत्रित करता है।

🟡 मणिपुर चक्र (Solar Plexus Chakra) — पीले रंग से संबंधित है, जो आत्मबल, इच्छाशक्ति और आत्म-विश्वास का प्रतीक है।

🟢 अनाहत चक्र (Heart Chakra) — हरे रंग का होता है, यह प्रेम, करुणा और संतुलन का केंद्र है।

🔵 विशुद्ध चक्र (Throat Chakra) — नीले रंग से जुड़ा है, जो अभिव्यक्ति, संवाद और सच्चाई से संबंधित है।

🟣 आज्ञा चक्र (Third Eye Chakra) — इंडिगो रंग से जुड़ा होता है, यह अंतर्ज्ञान, दृष्टि और मानसिक स्पष्टता का केंद्र है।

⚪ सहस्रार चक्र (Crown Chakra) — बैंगनी या श्वेत रंग से जुड़ा है, जो ब्रह्मज्ञान, आत्मा और परमात्मा से जुड़ाव का प्रतीक है।
सूर्यदेव की गति और "108" का ब्रह्मांडीय रहस्य :

श्रीमद्भागवतम (5.21.19) में उल्लेख है कि सूर्यदेव भू-मंडल की परिक्रमा करते हुए अद्भुत गति से चलते हैं।

वे 2,000 योजन और दो कोस अर्थात् लगभग 16,004 मील प्रति क्षण की गति से चलकर, 95,100,000 योजन (लगभग 760,800,000 मील) की दूरी एक ही क्षण में तय कर लेते हैं।

🌌 वैदिक ग्रंथों और उपनिषदों में ब्रह्मांडीय गणनाओं में "108" का विशेष महत्त्व है। यह संख्या मात्र संयोग नहीं, बल्कि एक गूढ़ और वैज्ञानिक सत्य को दर्शाती है।

🔢 1 दर्शाता है "एकत्व" — सारा ब्रह्मांड एक ही मूल स्रोत (ब्रह्म) से उत्पन्न हुआ है।

🥚 0 दर्शाता है अंडाकार ब्रह्मांड — यह निरंतर विस्तारशील है, जैसे ब्रह्माण्ड का फैलाव (expansion of universe)।

🌀 8 प्रतीक है अनंतता और चक्रीयता का — यह उस चक्र को दर्शाता है जिसमें सृष्टि का विनाश होता है और वह पुनः एकत्व में विलीन हो जाती है।
"सप्त त्वा हरितो रथे वहन्ति देव सूर्य। (ऋग्वेद 1.50) "
भगवान शिव (रुद्र) ने 11 अमर देवताओं (रुद्रों) की रचना की: कपाली, पिंगला, भीम, विरुपाक्ष, विलोहिता, अजेश, शासन, शास्ता, शंभू, चंदा और ध्रुव।

📖 संस्कृत छंदों का महत्व: संस्कृत छंदों का क्रम और अक्षर गणना है:
गायत्री (24), उष्णी (28), अनुष्टुभा (32), बृहती (36), पंक्ति (40), त्रिष्टुभा (44), जगती (48)। ये छंद वैदिक मंत्रों की लय और दिव्य ऊर्जा के स्त्रोत हैं।

🌊 सूर्य को जल चढ़ाने का विज्ञान:
तांबे के बर्तन से सूर्य को जल चढ़ाने पर सूर्य की किरणें जल से होकर शरीर में प्रवेश करती हैं, जिससे शरीर के सात रंग संतुलित होते हैं।

🚿 स्नान और स्वच्छता का महत्त्व:
हमारे पूर्वजों ने सूर्य पूजा से पूर्व स्नान का नियम इसलिए बनाया ताकि शरीर नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त होकर स्वास्थ्य लाभ करे।

🔱 बारह आदित्य (सौर देवता): बारह आदित्य हैं: विष्णु, शक्र, आर्यमन, धाता, विधाता, त्वष्टा, पूषा, विवस्वान, सविता, मित्रावरुण, अंश और भग।

🌞 जब सूर्यदेव की बात होती है, तो वह केवल खगोलीय पिंड नहीं, बल्कि वह ‘चेतना के सजीव स्रोत’ हैं। सूर्य को वेदों में सर्वज्ञ और दृश्य ब्रह्म कहा गया है। सूर्य की किरणें केवल प्रकाश नहीं, बल्कि दिव्य ज्ञान और चेतना का प्रवाह हैं।

वेद तीन स्तरों पर परम सत्य की बात करते हैं:

1. ब्रह्म – निराकार, अनंत, अखंड सत्य जो सबका आधार है।

2. परमात्मा – सबमें व्याप्त साक्षी रूप।

3. भगवान – पूर्ण व्यक्तित्व, जिसमें ज्ञान, बल और आनंद पूर्ण रूप से विद्यमान हैं।

।।ॐ घृणि सूर्याय नमः।।
।।जय सूर्य देव।।

साभार-अवनि प्रकाश ✍️✍️
संकलन - राज सिंह 🙏🏼🙏🏼

18/04/2026

भारत के मंदिर अपने आर्किटेक्चर से हैरान तो करते ही हैं, कभी-कभी प्रकृति भी अपनी अठखेलियों से इसमें चार चांद लगा देती है।

गुजरात के छोटा उदयपुर जिले के कवांट तहसील में स्थित इस मंदिर का नाम हाफेश्वर मंदिर है। ऋषि मार्केंडेय ने यहां युधिष्ठिर को शिव की कथा सुनाई थी। नर्मदा के बढ़ते जलस्तर के कारण यह सम्पूर्ण मंदिर धीरे-धीरे जलमग्न हो चला था। पूरे 18 वर्षों तक पानी में जलमग्न रहने के बाद यह प्राचीन मंदिर पुनः दिखने लगा है ।

इसे महादेव की माया कहें या प्रकृति की क्रीड़ा लेकिन जो भी है, बहुत अद्भुत है।🙏🏼 साभार 🙏🏼

दिनांक : १९.०४.२०२१
--- #राज_सिंह---

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