SHREE RADHA
INDIAN [HINDI ENGLISH AND SINHALESE] WRITER,
MUSIC COMPOSER,
FORMER TRAINED MUSIC TEACHER
[GRADUATED & BHATHKHANDE VISHARAD]
हद से गुज़र जाना है
💥भोर से हीरक तक-[9]
"उन्हें... किसी... ने मा...र डा...ला... है।"
बहुत मुश्किल से शब्द जोड़ते हुए चाची ने कहा। वह खौफनाक ख़बर सुनकर माँ के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
"क्या......? मार डाला? ओह नहीं, हे भगवान ! यह क्या हो गया?"
ऐसा कहती हुई माँ अपनी आँखों से गिरते आँसू पोंछने लगी। कुछ देर बाद माँ ने पूछा,
"किसने मार डाला है?"
"पता... नहीं।"
"अब मैं भी जा रही हूँ। तुम मेरी बच्चियों को ज़रा देख लो।"
ऐसा कहकर माँ चलने लगीं। तब मैं भी माँ के पीछे चली गईं। जब हम जा रहे थे, तब नीचे घर पर बहुत सारे लोग इकट्ठा हुए थे। पुलिस वाले भी आए थे। वह घर बहुत छोटा था। उस घर में केवल रसोईघर, कमरा, बैठक और एक बरामदा था। उस घर की छत खपड़ैल से बनी थी। मिट्टी के साथ गोबर मिलाकर ज़मीन को लीपा गया था। मैं उस घर की दहलीज तक पहुँची। वहीं से मैंने भीड़ के बीच से घर के अंदर झाँका। तब मुझे जो दिखाई दिया, वह दृश्य बहुत भयंकर था। क्योंकि दादाजी सो रहे थे और उनकी चादर पर ख़ून बिखरा हुआ था। तभी एक पुलिस निरीक्षक ने आदेश दिया,
"भीड़ हटाइए। हमें हमारा काम करने दीजिए।"
ऐसा कहते ही एक पुलिस वाले ने ज़ोर से सीटी बजाई और कहा,
"सभी यहाँ से हटिए। हमें जाँच करने दीजिए।"
पुलिस का हुक्म मानते हुए भीड़ पीछे तो हट गई, लेकिन लोग आसपास ही जमा होकर कानाफूसी करने लगे।
इसी बीच मेरे पापाजी बेहोश हो गए। कुछ लोग उन्हें उठाकर हमारे घर की तरफ़ लेकर दौड़ पड़े।
तभी फिर से पुलिस की कड़क आवाज़ सुनाई दी। माँ ने घबराकर मुझसे फुसफुसाते हुए कहा,
"आओ! अब हमें चलना चाहिए, वरना पुलिस हमें यहाँ से भगा देगी।"
ऐसा कहती हुई माँ मेरा हाथ खींचकर मुझे हमारे घर की ओर ले जाने लगीं।
जैसे ही माँ और मैं अपने घर पहुँचे, दादी के रोने-चिल्लाने की जो आवाज़ पहले नीचे वाले घर से आ रही थी, अब वह हमारे ही घर से सुनाई दे रही थी।
जैसे ही मैं माँ के साथ घर के अंदर दाखिल हुई, माँ ने रोते हुए दादी से सवाल किया,
"मामी, जब आप जा रही थीं, तब क्या वह दरवाज़ा खुला था?"
तभी सुबह जो कुछ भी हुआ था, दादी ने रोते हुए वह सब बताना शुरू किया,
"मैं चाय लेकर नीचे घर के पास गई और उनको आवाज़ लगाई। पर वहाँ बिल्कुल सन्नाटा था। मैंने उन्हें कई बार आवाज़ दी, लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आया। मुझे कुछ गड़बड़ लगी। ...मैंने चाय की थाली वहीं स्टूल पर टिका दी और पीछे का दरवाज़ा खोलकर देखने के लिए आवाज़ लगाती हुई पीछे की तरफ़ बढ़ी। फिर मैंने वह दरवाज़ा खोलने की कोशिश की। दरवाज़ा बंद नहीं था। मेरा दिल घबराने लगा और मैं अंदर चली गई। वे सिर से पांव तक चादर ओढ़कर बिस्तर पर सो रहे थे। मैंने फिर से उन्हें जगाने की कोशिश की। जब कोई फायदा नहीं हुआ, तो मैंने उनका हाथ छूकर देखा। उनका हाथ बिल्कुल ठंडा पड़ चुका था।... मेरे हाथ-पांव कांपने लगे। मैंने उनके चेहरे से चादर हटाने की कोशिश की, लेकिन मैं उसे हटा नहीं पाई। ऐसा लगा मानो वह चादर पत्थर जैसी कठोर हो चुकी थी।.... मैंने अपनी पूरी ताकत लगाकर चादर खींची।... क्या कहूँ! मेरे पूरे बदन का खून जम गया। वह चादर उनके सिर के गहरे ज़ख्म के अंदर तक धँस चुकी थी और बहते खून के साथ जमकर बिल्कुल पत्थर जैसी ठोस हो गई थी। यह देखकर जैसे मेरे शरीर की जान ही निकल रही थी। फिर भी मैं ज़ोर-ज़ोर से चीखने लगी, लेकिन बहुत देर तक किसी को मेरी आवाज़ सुनाई नहीं दी।... हे ऊपरवाले! तूने उस बेचारे के साथ ऐसा क्यों किया?..."
कहती हुई दादी फिर से ज़ोर-ज़ोर से रोने लगीं।
यह दुखद खबर सुनते ही गाँव के सभी लोग हमारे घर की तरफ़ दौड़कर आए। लेकिन हमारे चाचा जी कहीं भी दिखाई नहीं दे रहे थे। मुझे साफ़ सुनाई दे रहा था कि लोग दबी ज़ुबान में इस अनहोनी की वजह के बारे में फुसफुसा रहे थे।
लगभग दस बजे, पुलिस अपने साथ दो खोजी कुत्ते लेकर आई। उन बड़े-बड़े कुत्तों को देखकर मुझे बहुत डर लग रहा था। जिस पुलिसवाले ने कुत्तों की रस्सी पकड़ रखी थी, उसने अचानक एक कुत्ते को छोड़ दिया। छूटते ही वह बड़ा कुत्ता भागकर हमारे घर के अंदर दौड़ गया। यह देखकर वहाँ मौजूद पुलिस निरीक्षक ने कहा,
"हूँ! मुझे लगता है कि हत्यारा घर का ही कोई सदस्य है!"
पापा, बुआ और दादी सन्न होकर एक-दूसरे की ओर देखने लगे। उसके बाद पुलिस ने सबके बयान दर्ज किए। उस रात सुरक्षा के लिए दो पुलिसवाले हमारे घर पर ही रुके हुए थे। डर के मारे दादी, माँ और बुआ आपस में कुछ फुसफुसा रही थीं। मैं भी उनके पास ही दुबक कर बैठी थी, क्योंकि उस दिन पापा, दादी और माँ ने हमें अकेले कहीं भी जाने की इजाज़त नहीं दी थी।
पूरा माहौल गहरी खामोशी में डूबा हुआ था। उस सन्नाटे को चीरती हुई दादी ने बुआ के कान में फुसफुसाकर कहा,
"वैसे छोटी बेटी, सच तो यह है कि मुझे छोटे लड़के पर थोड़ा शक हो रहा है।"
"मैं भी वही बताने वाली थी माँ, मुझे भी छोटे लड़के पर ही शक है। आखिर अब कहाँ गायब है वह?"
"मैंने कुसुमा से भी पूछा, उसे भी कुछ नहीं पता।"
"माँ..., दो दिन पहले वह पापा से बुरी तरह बहस कर रहा था। उस बहस के आखिर में उसने गुस्से में कहा— 'ख़ुदा की क़सम, मैं तुझे मार डालूँगा!'
ऐसे ही तीन दिन बीत गए। दादी, बुआ और माँ हमेशा एक साथ रहा करती थीं। वे हमेशा डर के मारे फुसफुसाकर बातें करती थीं। चाची तो अपने कमरे से बाहर निकल ही नहीं रही थीं।
पापा डरे हुए नहीं थे, लेकिन उदास थे। वे हमेशा लंबी-लंबी साँसें ले रहे थे। बुआ के पति विशाल फूफा, बुआ से भी ज़्यादा डरपोक आदमी थे। वे अकेले घर से बाहर पैर रखने से भी डरते थे।
कभी-कभी गाँव वाले भी हमारे यहाँ आते थे, खासकर औरतें। वे भी दादी से फुसफुसाकर बातें करती थीं।
इसी बीच एक दिन चाचाजी भी घर आ गए। उस दिन तक दादाजी का अंतिम संस्कार नहीं किया गया था, क्योंकि जाँच के कारण पुलिस ने इसकी अनुमति नहीं दी थी।
चाचाजी दादाजी के मृत शरीर के पास गए और वे ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला-चिल्लाकर रोने लगे। उन्हें इस तरह रोते हुए देखकर, लोग फुसफुसाकर आपस में बात करने लगे,
"यह असल में दुखी नहीं है, बस सबके सामने घड़ियाली आँसू बहा रहा है।"
"हाँ, मैंने देखा कि वह आते वक्त रास्ते में बहुत खुश था।"
"मुझे तो इस आदमी पर ज़रा भी भरोसा नहीं है।"
"हाँ, मुझे भी। भले ही यह हमारे बड़े गुरु जी का छोटा भाई है, पर यह उनके जैसा बिल्कुल नहीं है।"
"अरे ओए, क्या तुम्हें पता नहीं है कि यह आदमी हमारे बड़े गुरु जी का सगा भाई नहीं है?"
"ओह! सच में?... यह बहुत बदचलन आदमी है। पराई औरतों के साथ संबंध है इसके। हमारे बड़े गुरु जी कितने अच्छे हैं, हैं ना?"
"हाँ। अगर इस आदमी का इस हत्या से कोई संबंध है, तो ज़रूर इसे सलाखों के पीछे जाना ही होगा।"
जैसे-तैसे करके दादाजी के अंतिम संस्कार का दिन भी आ गया। उस दिन दादाजी के सभी भाई-बहन हमारे घर आए थे। उनके सबसे छोटे भाई का नाम विलियम था, जो कि एक जिला सहायक सचिव थे।
मैंने देखा कि वे अपने हाथ में लिए हुए बड़े से रूमाल से अपने आँसू पोंछ रहे थे। वे दादाजी से बहुत प्यार करते थे, क्योंकि मेरे दादाजी उनके बड़े भाई थे। एक छोटा भाई होने के नाते, उन्होंने अपनी वह ज़मीन, जो सरकार द्वारा उन्हें दी गई थी, मेरे दादाजी के नाम कर दी थी।
पुलिस ने दादाजी के अंतिम संस्कार के लिए दाह-संस्कार की अनुमति नहीं दी थी, बल्कि उन्हें दफ़नाने की अनुमति दी थी, ताकि अगर कोई ज़रूरत पड़े, तो शव को दोबारा बाहर निकाला जा सके।
उस रात घर में जो मनहूसियत पसरी हुई थी, उसे मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती। सबसे अजीब बात यह थी कि चाचाजी ने यह तक नहीं पूछा कि दादाजी की मृत्यु कैसे हुई थी, किस तरह हुई थी, उन्हें पहली बार किसने देखा और यह कितने बजे हुई थी।
उस रात जब चाचाजी दादी के पास आए, तो पिताजी भी उनके पास बैठे थे। चाचा को देखते ही पापा ने उनसे पूछा,
"तू पिछले कई दिनों से कहाँ गया था?"
"............."
"क्या तुझे सुनाई नहीं दिया कि मैंने क्या पूछा?"
"म्... मैं... मैं..."
पापा को बहुत गुस्सा आया, क्योंकि चाचा की आवाज़ अटक रही थी।
तू मेरी नज़रों के सामने से दूर हो जा! जा यहाँ से!.. हूँ!! नाजायज़ कहीं का।"
जब पापा ने ऐसा कहा, तो चाचा वहाँ से चले गए।
अगली सुबह बुआ और उनके पति विशाल फूफा कहीं बाहर गए। जब वे वापस आए, तो बुआ ने दादी से कहा,
"माँ, हमने सुना है कि एक ज्योतिष, मेरा मतलब भविष्यवक्ता बाबा रहते हैं। वे जो कुछ भी कहते हैं, उनकी कही हर बात पत्थर की लकीर होती है। पर उनसे मिलने के लिए हमें बहुत दूर जाना होगा। वे तो 'मातारा' के रहने वाले हैं।"
वह बात सुनकर मेरे पिताजी ने कहा,
"झूठ बोलकर पैसे कमाते हैं वे लोग! उन लोगों पर भरोसा मत करो, छोटी बहन।"
लेकिन दादी ने कहा,
"अरे छोटे बेटे, हम वहाँ जाकर तो देखें। कौन जाने वे सच कह दें।"
पापा ने कुछ भी नहीं कहा, क्योंकि उन्होंने सोचा कि अगर वे बार-बार मना करेंगे, तो दादी का दिल टूट जाएगा।
अगले दिन भोर से ही दादी, बुआ, रमणी दीदी और विशाल फूफा मातारा जाने की तैयारी में लग गए थे। चलते वक्त दादी ने कहा,
"छोटे बेटे, जितनी जल्दी हो सके, हम उतनी ही जल्दी वापस आने की कोशिश करेंगे। तुम अपना तथा सभी का ध्यान रखना।"
[अगले भाग से संबंधित]
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